स्वतंत्रता उपरांत भारत में स्त्री - Women in India after independence
स्वतंत्रता उपरांत भारत में स्त्री - Women in India after independence
आजादी के तकरीबन ढाई दशक के बाद स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए बनाई गई समिति की रिपोर्ट 'समानता की ओर' (दुबईस इक्वलिटी, 1974) में कहा गया है कि आजादी के बाद अपनाई गई विकास की नीतियों ने स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं लाया है। उस समय से लेकर अब तक के अनुभव यह बताते हैं कि सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाएँ विकास की मुख्यधारा से पीछे छूट गई हैं। स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक हिंसा व लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव से आज भी प्रभावित है। 'समानता की ओर नामक रिपोर्ट ने इस बात की ओर भी इशारा किया कि स्वत्रता के लगभग तीन दशकों के बाद सियों की अधीनस्थ स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
संविधान में लैंगिक समानता के प्रावधान तथा राजनीति तथा रोजगार के क्षेत्र में समान अधिकारों के प्रावधान होने के बाद भी इन क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी कम हुई है। स्त्रियों तथा बच्चियों की मृत्यु दर बढ़ी, लिंगानुपात पहले की तुलना में और ज्यादा खराब हुआ तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक गरीब खियों की पहुंच पुरुषों के मुकाबले घटी।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति के बाद भारत ने जिस संविधान को अंगीकार किया, वह सार्वभौमिक मताधिकार के तहत लिंग, नस्ल, जाति, वर्ग से इतर सभी को मताधिकार का अधिकार देता है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों के लिए यह एक रैडिकल कदम था,
क्योंकि इससे पहले दुनिया के तमाम सारे देशों में स्त्रियों को मताधिकार के अधिकार के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। यूरोप के देशों में स्त्रियों का यह संघर्ष लगभग सवा सौ साल चला और तब कहीं जाकर उन्हें वोट का अधिकार प्राप्त हुआ था। वहीं भारत में आजादी के तुरंत बाद वोट का अधिकार मिलना एक कांतिकारी कदम था लेकिन इसके साथ-साथ हम यह भी देखते हैं कि आजाद भारत के सामाजिक ताने बाने पर पितृसत्तात्मक विचारधारा के प्रभुत्व की जड़ें काफी मजबूत थीं। पितृसत्तात्मक विचारों की जड़े अर्थव्यवस्था, राजनीति से जुड़ी तमाम सारी संस्थाओं में देखी जा सकती थीं। इन पितृसत्तात्मक मूल्यों से निपटने के लिए संविधान के अनुच्छेद पंद्रह के द्वारा किसी भी किस्म की असमानता को नकारा गया। इसी प्रकार किसी भी किस्म के शोषण के प्रति अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। गोपा जोशी लिखती हैं कि "भारतीय संविधान में समानता का अधिकार है।
संविधान की धारा 14, 15, 16 समानता के अधिकार की सीमाएँ निर्धारित करती है, परंतु समानता को परिभाषित नहीं किया गया है। सर्वमान्य परिभाषा के अभाव में इसका क्षेत्र का संकुचित एवं विस्तृत विवेचित हुआ है।"
भारतीय संविधान में छिपी पितृसत्तात्मक प्रवत्तियों का जिक्र करते हुए उपेन्द्र बक्षी लिखते हैं, “पूरे संविधान में स्त्रियों का संदर्भ केवल छह बार ही आया है। इसमें से पाँच बार यह संदर्भ पुरुषों तथा बच्चों के साथ है। धारा 15 (2) लिंग के आधार पर केवल सार्वजनिक स्थानों पर तथा सार्वजनिक सुविधाओं के उपभोग पर किसी प्रकार के भेदभाव को रोकती है। केवल धारा 42 ही राज्य को स्त्रियों को प्रसूति लाभ देने का निर्देश देती है।
संविधान में स्त्रियों को अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजातियों या पिछड़ी जातियों की तरह, सामाजिक उपेक्षा का शिकार नहीं माना जाता है। यहाँ तक की इन कमजोर जातियों की स्त्री को भी कमजोर की श्रेणी में नहीं रखा गया है। संविधान में पितृसत्ता को स्त्री समानता की राह में रोड़ा न मानकर एक नैसर्गिक संस्था के रूप में लिया गया है।"
आजादी के बाद भारतीय राज्य पर समाजवादी विचारों के प्रभाव को देखा जा सकता है। इस प्रभाव के चलते ही भारतीय राज्य के द्वारा कल्याणकारी अर्थव्यवस्था को प्रधानता दी गई।
जिसके तहत राज्य के नियंत्रण में होने वाले पूँजीवादी विकास के मॉडल को अपनाया गया। राज्य को मुख्यतः सामाजिक बदलाव के एक टूल के बतौर देखा गया, जिसके माध्यम से समतामूलक समाज की स्थापना संपन्न होनी थी। साधना आर्य लिखती हैं कि “अंततः विकास के मॉडल की प्राथमिकता उत्पादन वृद्धि रही न कि वितरण संबंधी न्याया पूरी विकास नीति और चिंतन इस सोच पर आधारित रहा कि विकास प्रक्रिया स्वमेव वितरण संबंधी न्याय के प्रश्न को हल कर लेगी। यानी कि उत्पादन वृद्धि के लाभ अपने आप लोगों के जीवन स्तर को उठाने में मदद करेंगे। असमानता और सामाजिक आर्थिक विषमताओं से ग्रस्त सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में उत्पादन वृद्धि के जरिए स्वमेव वितरण संबंधी न्याय करने के विचार में अंतर्निहित समस्याएँ थीं, जिन पर ध्यान नहीं दिया गया।"
इस मुनाफे पर आधारित पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया ने एक अभिजात्य तबके को जन्म दिया। समस्त राजनैतिक नीति निर्माण के कार्यक्रमों में इसी अभिजात्य तबके का दबदबा बढ़ता गया, जिसने सामाजिक न्याय व समाज के लोकतांत्रिकीकरण के सवालों को पीछे छोड़ दिया। विकास की इस प्रक्रिया ने समाज में पहले से मौजूद गैरबराबरी को और मजबूत किया व वंचित तबकों के हाशियाकरण को और मजबूत किया। इसी के चलते इस किस्म की विकास प्रक्रिया का स्त्रियों पर और ज्यादा नकारात्मक असर हुआ। पितृसत्तात्मक सत्तासंबंध कमजोरहोने की बजाय और मजबूत हुए।
साधना आर्य लिखती हैं कि विकास को वृहद रूप में समझना होगा। इसके लिए पहले से व्याप्त सामाजिक ढाँचों और संबंधों को समझना होगा जोकि वर्गीय,
जातीय तथा पुरुष प्रभुता और निम्न वर्गों, जातियों एवं स्त्रियों की हीन स्थिति पर टिके हैं, क्योंकि ये इन नकारात्मक प्रभावों को बढ़ाते हैं। वृहत अर्थों में विकास में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानव जीवन के अन्य पहलू शामिल किए जाने जरूरी हैं, जोकि समाज के प्रत्येक व्यक्ति और हित समूह को अधीनता और निर्भरता की स्थिति से मुक्त कराकर समानता और न्यायपूर्ण सामाजिक संबंधों पर आधारित जीवन व्यतीत करने के योग्य बनाएँ, लेकिन जैसा कि उपलब्ध आकड़ों से पता चलता है कि महिलाएँ विकास की प्रक्रिया में कहीं पीछे छूट गई हैं। अधिक-से-अधिक महिलाएँ कुशल कारीगरों की श्रेणी से निकलती जा रही हैं और अकुशल मजदूरों की श्रेणी में आती जा रही हैं। रोजगार के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। राज्य की नीतियों के फलस्वरूप जीवनयापन की पुरानी सुरक्षाएँ खत्म की जा रही हैं। इससे स्वायत्ता के दायरे सिकुड़ते जा रहे हैं।"
आजाद भारत में कानून के क्षेत्र में जो सुधार किए गए उनके संदर्भ में देखा जाए तो हम देखते हैं कि हिंदू कोड बिल को संसद और उसके बाहर तीखे विरोध का सामना करना पड़ा था। इस विरोध के पीछे जो मुख्य तर्क था कि इन कानूनों के लागू होने से परिवार नामक संस्था के टूटने का खतरा बढ़ जाएगा। हालांकि हिंदू कोड बिल के लागू हो जाने से हिंदू परिवारों में स्त्रियों की स्थिति कुछ बेहतर हुई, लेकिन मोटे तौर पर आजादी के ढाई दशक बाद तक पुरुष प्रधानता के सवाल या स्त्रियों की अधीनता के सवाल राजनैतिक परिदृश्य से लगभग गायब रहे। इसे हम ऐसे भी देख सकते हैं कि श्रम संबंधी कानून संगठित क्षेत्रों में काम करने वाली पाँच से दस फीसदी स्त्रियों पर लागू हो रहे थे, जबकि नब्बे फीसदी से भी अधिक स्त्रियाँ असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही थीं, जो इन कानूनों के दायरे से बाहर थीं।
साधना आर्य लिखती हैं कि "समान काम के लिए समान वेतन संबंधी कानून भी 1975 के बाद ही बनाया गया। सबसे अधिक महत्व की बात यह थी कि आर्थिक विकास के बारे में बहस समानता प्राप्ति पर न होकर उत्पादन वृद्धि पर ही केंद्रित थी।"
इसी तरह से दहेज की समस्या से निपटने के लिए 1961 में कानून बना। 1984 और 1986 में इस कानून में किए गए संशोधनों के उपरांत कानून को और सख्त बना दिया गया। लेकिन इन कानूनों के बन जाने के बाद भी स्त्रियों का उत्पीड़न नहीं रुका। इस कानून में जो भी सकारात्मक बदलाव हुए उसमें महिला आंदोलन की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन आज के समय में दहेज को समाज से मौन सहमति मिल चुकी है। दहेज ने नव उदारवाद के इस दौर में स्टेट्स सिंबल का रूप ले लिया है।
महिला आंदोलन के दबाव में 1980 के दशक में बलात्कार संबंधी कानूनों में भी कई सारे बदलाव किए गए। 1980 में महाराष्ट्र की आदिवासी लड़की मथुरा के साथ थाने में दो पुलिस वालों ने बलात्कार किया था। हाईकोर्ट ने उन्हें मुजरिम माना, लेकिन सर्वोच्च न्यायलय ने हाईकोर्ट के इस निर्णय को पलट दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कारी पुलिस वालों को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि मथुरा यह साबित नहीं कर पाई कि उसमें उसकी रजामंदी नहीं थी। इस घटना के बाद देश के कुछ जाने माने वकीलों ने सर्वोच्च न्यायलय को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज किया। इस पत्र की प्रतिक्रियास्वरूप सारे देश में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ विरोध व धरने प्रदर्शन हुए और अंततः बलात्कार कानून में कुछ संशोधन किए गए। मथुरा की घटना के लगभग तीन दशकों के बाद 16 दिसंबर, 2012 ई. को दिल्ली में निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना होती है। इस घटना के खिलाफ पूरे देश भर में विरोध प्रदर्शन होते हैं।
दबाव में आकर सरकार जस्टिस वर्मा आयोग का गठन करती है। जस्टिस वर्मा के द्वारा भी बलात्कार से संबंधित कानूनों को और सख्त कर दिया जाता है। लेकिन इन कानूनों के लागू हो जाने के बाद भी स्त्रियों के ऊपर बढ़ती यौन हिंसा की घटनाओं में और इजाफा ही हो रहा है। जनवरी 2018 में कश्मीर की एक आठ साल की लड़की आसिफा के बलात्कार की घटना ने एक बार फिर से पूरे मुल्क को शर्मसार कर दिया। इस घटना का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि पहली बार बलात्कार के आरोपियों को बचाने के लिए धरने प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं।
हाल ही में जारी सरकारी आँकड़ों के मुताबिक स्त्रियों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा के 94 फीसदी मामलों में आरोपी महिला के परिचित ही होते हैं।
इन घटनाओं की बढ़ती संख्या यह भी बताती है कि सिर्फ कानून के सहारे इस हिंसा को नहीं रोका जा सकता है। इस हिंसा के पीछे के सामाजिक,
आर्थिक व जातिगत कारकों को जब तक हल नहीं किया जाता, तब तक यह हिंसा नहीं थमेगी। 1990 के बाद भारत में शुरू हुई नव उदारवाद की नीतियों ने समाज के सभी तबकों को अलग- अलग तरह से प्रभावित किया है। स्त्रियों के बड़े तबके पर इस प्रक्रिया का नकारात्मक असर दिखाई पड़ता है। अगले अध्याय में विस्तार के साथ वैश्वीकरण के खियों पर पड़ने वाले प्रभाव पर बात की जाएगी।
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