क्रान्तिकारी आंदोलनों में महिलाएँ - women in revolutionary movements

क्रान्तिकारी आंदोलनों में महिलाएँ - women in revolutionary movements


गाँधीवादी / कांग्रेसी महिला कार्यकर्ताओं, संगठनों के अतिरिक्त इन्हीं के समानान्तर क्रान्तिकारी महिला कार्यकर्ताओं, संगठनों का सशक्त अस्तित्व लगातार मौजूद रहा आया है. दरअसल कांग्रेस की महिला नीति ही इनके अलग संगठन के लिए ज़िम्मेदार रही है 1928 में सुभाषचन्द्र बोस तथा बाद में कमलादेवी चट्टोपाध्याय और लतिका घोष ने यह प्रस्ताव रखा और इसके लिए बहुत कोशिश की कि कांग्रेस के अन्दर ही अलग से एक महिला संगठन बनाया जाए किंतु कांग्रेस नेतृत्व ने कभी इसकी इजाजत नहीं दी. इसका नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अलग से नारी सत्याग्रह समिति' बना ली तथा साथ ही कांग्रेस के साथ मिलकर बहिष्कार धरना, स्वदेशी प्रचार, चरखा चलाना, सभाओं तथा जुलूसों के आयोजन इत्यादि के काम करने के लिए एक महिला धरना बोर्ड' भी बनाया.


बंगाल में महिलाओं का क्रान्तिकारी आंदलनों बहुत मजबूत रहा है. असल में गाँधी से मोहभंग के उपरान्त महिलाएँ क्रान्तिकारी आंदलनों की धारा से जुड़ी थीं. ये अधिकांशतः युवा महिलाएँछात्राएँ थीं. इन छात्राओं ने 1928 में कलकत्ता में छात्री संघ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य क्रान्तिकारी तरीके से अंग्रेजों से संघर्ष करना चाहता था लड़कियों की स्टडी क्लास, उन्हें लाठी तलवार बन्दूक चलाना सिखाना, भूमिगत साहित्य, हथियार उग्रवादी सोसाइटी के सदस्यों को पहुँचाना आदि इसके कार्य थे. इस संगठन में बड़ी संख्या में लडकियाँ शामिल थीं ये सीधी कार्रवाई में विश्वास रखती थीं. इस संगठन की स्त्रियों के कार्यों को देखकर लोग पहली बार इस तथ्य से सहमत हुए कि स्त्रियाँ भी वह काम कर सकती हैं,

जो पुरुष करते हैं वे भी पुरुषों की भांति देश के ऊपर अपना जीवन न्यौछावर कर सकती हैं. (द्रष्टव्य: (शुक्ला, प्रो. आशा, कुसुम त्रिपाठी उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और जेंडर महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल, 2014; ISBN 978-81-905131-7-19; पृष्ठ-93-94). उक्त तथा अन्य संगठनों के क्रान्तिकारी आंदलनों से जुड़ी महिलाओं में अनुजा सेन, शांति घोष, सुनीति चौधरी, बीना दास, कल्याणीश्री मजूमदार, कमला दासगुप्ता, सुहासिनी देवी, प्रीतिलता वाडेकर, प्रकाशवती, सुशीलादेवी, रूपवती जैन, दुर्गा भाभी आदि के नाम सर्वप्रमुख हैं. इनमें प्रीतिलता वाडेकर पुरुष वेश में भी सक्रिय रहती थीं.


क्रान्तिकारी महिला आंदलनों की परंपरा में सुभाषचन्द्र बोस की रानी झाँसी रेजिमेंट एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में सामने आती है. कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में बनी रानी झाँसी रेजिमेंट का इतिहास में उल्लेखनीय स्थान है. इसमें स्त्रियाँ पुरुष सैनिकों के वेष में रहती थीं और उन्हें कठोर अनुशासन के साथ हर प्रकार का सैनिक प्रशिक्षण दिया जाता था. इस रेजिमेंट में 150 महिला सैनिक थीं.