नवजागरण काल में स्त्री शिक्षा- एक ऐतिहासिक पुनराकलन - Women's Education in the Age of Enlightenment - A Historical Recapitulation

नवजागरण काल में स्त्री शिक्षा- एक ऐतिहासिक पुनराकलन - Women's Education in the Age of Enlightenment - A Historical Recapitulation


नवजागरण काल में स्त्री-शिक्षा की स्थिति परिस्थितियों का आकलन इस बिंदु का उपलक्ष्य है. नवजागरण काल उन्नीसवीं शताब्दी तथा बीसवीं शताब्दी पूर्वार्द्ध का लगभग डेढ़ सौ साल की समयावधि का काल माना जाता है. इस लंबे समयांतराल में समाज-सुधार की एक लंबी परंपरा पूरे देश में रही है. स्त्रीशिक्षा का प्रसार, उसका विकास भी इस सुधार प्रक्रिया का एक आवश्यक एजेंडा रहा है. लेकिन पूरे देश में स्त्रीशिक्षा का स्वरूप और प्रकृति एक जैसी नहीं रही है. स्थान और सामाजिक समूहों / समुदायों वर्गों की प्रवृत्तियों, परंपराओं, स्वभाव और संस्कारों के तहत इसमें पर्याप्त अंतर रहा है. यहाँ इसे हम मोटे तौर पर भाषा क्षेत्रों के आधार पर निम्नलिखित दो प्ररूपों में समाकलित कर सकते हैं- 


1. हिंदी प्रदेश तथा 


2. हिंदी- इतर प्रदेश. 


हिंदी- प्रदेश


हिंदी- प्रदेश समाज-सुधार के अन्य क्षेत्रों की तरह स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में भी अपेक्षाकृत फिसड्डी, दकियानूस व लापरवाह रहा है. स्त्रीशिक्षा को अपने एजेंडे में उसने लिया तो था किंतु उसके प्रति वह ज्यादा उत्साही नहीं था. हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्त्रीशिक्षा के मामले में भी हिंदूवादी पुनरुत्थान की स्थितियाँ ज्यादातर दिखाई देती हैं.

लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की प्रक्रिया, स्त्रीशिक्षा का पाठ्यक्रम, सहशिक्षा, ड्राप आउट, स्त्रियों की उच्च शिक्षा; इत्यादि सभी मुद्दों पर हिंदी- प्रदेश के शिक्षा- उन्नायक और सुधारक स्पष्ट नीति के अभाव के चलते कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने में असमर्थ रहे ऐसा नहीं है कि हिंदी प्रदेश में स्त्रीशिक्षा की प्रगति हुई ही नहीं. प्रगति हुई, किंतु उसे नवजागरण के अंतर्गत नहीं माना जा सकता. जैसा कि कहा गया, वह हिंदूवादी पुनरुत्थान ही था.


हिंदी प्रदेश के शिक्षा- उन्नायक लड़कियों के स्कूल खोलने, उनके रखरखाव, उनके बजट इत्यादि के लिए उपनिवेशवादी अंग्रेज सरकार पर निर्भर रहने के हिमायती थे.

हिंदी - इतर प्रदेशों के शिक्षा- उन्नायकों की तरह स्वयं पहल करने की मानसिकता से कोसों टू थे, जैसे कि भारतेंदु हरिश्चन्द्र, जिन्हें नवजागरण काल का बड़ा युगपरिवर्तनकारी लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, पत्रकार, समाजसुधारक इत्यादि माना जाता है, की स्त्री-शिक्षा विषयक धारणाएँ अस्पष्ट, दकियानूसी, पुरुष वर्चस्ववादी तथा धर्मवादी रही हैं. एक तरफ तो भारतेंदु स्त्रीशिक्षा की जिम्मेदारी उपनिवेशवादी सरकार पर डालकर चलते हैं दूसरी तरफ उनका यह भी दुराग्रह रहा है कि मिशनरी महिलाएँ, जो घर-घर जाकर स्त्रियों को पढ़ाती हैं, वे अपने धार्मिक सिद्धान्तों और स्वतन्त्र विचारों को दिमाग में बैठाने की कोशिश करती हैं. इस क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि इससे देशी स्त्रियों में शिक्षा की चाह पैदा होने के बजाय इससे विरक्ति पैदा होती है.

(द्रष्टव्य: तलवार, वीरभारत रस्साकशी (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, दूसरा संशोधित संस्करण 2006: सारांश प्रकाशन, दिल्ली; ISBN: 81-7778-007-7: पृष्ठ-35).


स्त्रीशिक्षा के पाठ्यक्रम के मुद्दे पर हिंदी प्रदेश के शिक्षाविदों में भारी पिछड़ापन पाया जाता है. भारतेंदु हरिश्चन्द्र, मदनमोहन मालवीय, सैयद अहमद आदि के विचारों का आकलन करने पर स्पष्ट होता है कि ये सभी लड़कियों को लड़कों की तरह ज्ञान-विज्ञान, नवोन्मेषी विषयों, आधुनिक ज्ञान-धाराओं; इत्यादि को विषयों के रूप में पढ़ाने के पक्षधर नहीं थे. इनकी मान्यता थी कि लड़कियों के पाठ्यक्रम में गृहविज्ञान,

गृहशिक्षा- जिसमें मुख्यतः धार्मिक क़िस्म की शिक्षा होती है, चरित्र निर्माण, पत्नी-धर्म इत्यादि से जुड़े विषय होने चाहिए. उसमें लड़कों की तरह के ज्ञान-विज्ञान, पश्चिमी ज्ञान, विभिन्न ज्ञानानुशासन से जुड़े विषय नहीं होने चाहिए, जैसे कि उक्त सभी महानुभावों ने स्त्रीशिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर इसी प्रकार के विचार प्रस्तुत किए. भारतेंदु 'प्रेमसागर', 'विद्यांकुर 'इतिहासतिमिरनाशक' इत्यादि पुस्तकों को लड़कियों को पढ़ाये जाने का विरोध किया क्योकि उनका तर्क था कि ये उनके नैतिक चरित्र का विकास नहीं कर सकतीं. उनके अनुसार “चरित्र निर्माण (मोरालिटी) और घरेलू प्रबन्ध वगैरह के बारे में बताने वाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगानी चाहिए.”

(वही; पृष्ठ सं. 34). इसी तरह मदनमोहन मालवीय के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वेद-विभाग में बीसवीं सदी के अनेक वर्षों तक वेदाध्ययन की अनुमति नहीं थी. इसी तरह मुस्लिम भद्र-वर्ग के समाज-सुधारकों, स्त्रीशिक्षा के उन्नायकों का भी लड़कियों को पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम के बारे में लगभग यही रवैया था. वे भी आधुनिक ज्ञान- विज्ञान की जगह अपनी स्त्रियों को चरित्र-निर्माण, धार्मिक और घरेलू प्रबन्ध के बारे में बताने वाली किताबें ही पढ़वाना चाहते थे. देवबंद दारुल उलूम का रवैया भी ऐसा ही था. इस संबंध में उमा नेहरू ने तंज़ कसते हुए अपने एक लेख में लिखा था- “भारतीय पुरुष तो पश्चिम का पूरा अनुसरण करते हैं और उसी के आधार पर विकास का अपना मॉडल बनाते हैं, लेकिन चाहते हैं कि उनकी स्त्रियाँ पूर्वीय ही दिखें" (तलवार, वीरभारत रस्साकशी (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, दूसरा संशोधित संस्करण: 2006; सारांश प्रकाशन, दिल्ली; ISBN: 81-7778-007-7 पृष्ठ 38 पर उद्धृत).


सहशिक्षा के विषय में भी हिंदी प्रदेश के नवजागरणवादियों का यही सोचना था कि लड़के- लड़कियों के स्कूल अलग-अलग हों. भारतेंदु ने तो सहशिक्षा का विरोध किया ही, अन्य लोगों ने भी किया. लड़कियों के ड्रॉप आउट, स्त्रियों की उच्च शिक्षा के मामले में भी इन महानुभावों की लगभग ऐसी ही राय थी. वीरभारत तलवार ने अपनी पुस्तक 'रस्साकशी' में हंटर आयोग की रिपोर्ट का विस्तृत हवाला देते हुए स्पष्ट लिखा है कि "देश के कुछ दूसरे प्रांतों के मुकाबले यहाँ स्त्रीशिक्षा आगे बढ़ने के बजाय और पीछे जारही थी." (वही; पृष्ठ- 49).


हिंदी- प्रदेश में स्त्रीशिक्षा की इस दुर्गति के पीछे के कारणों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि स्त्री सम्बन्धी परंपरागत मान्यताएँ व धारणाएँ इसके मूल में थीं,

जो स्त्री को घर की चारदीवारी में क़ैद किए रखने की हिमायती थीं. इस संबंध में डॉ. वीरभारत तलवार का यह निष्कर्ष उचित जन पड़ता है कि वास्तव में 19वीं सदी के पश्चिमी शिक्षाप्राप्त सुधारकों का एक बड़ा हिस्सा स्त्रियों को अपने धर्म का वाहक और अपनी सभ्यता-संस्कृति का मूर्तिमान रूप समझता था जिसे पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में आकर भ्रष्ट होने से बचाना था. यही वजह है कि वे लड़कियों को आधुनिक शिक्षा देना नहीं चाहते थे या किसी हद तक देने का समर्थन करने के बावजूद उनकी धार्मिक और नैतिक शिक्षा को बहुत जरूरी मानते थे. उनका यह विचार परिवार और समाज में स्त्रियों की परंपरागत भूमिका के समर्थन पर टिका था. हिंदी- उर्दू प्रदेश के सुधारकों की स्थिति थोड़ी और पीछे थी." (वही, पृष्ठ- 39). 


हिंदी- इतर प्रदेश


नवजागरण काल में स्त्रीशिक्षा के वास्तविक गम्भीर प्रयत्न गैर हिंदी-उर्दू प्रदेश में हुए जहाँ उपनिवेशवादी सरकार के किसी भी प्रकार के सहयोग के बिना अनेक समाज सुधारकों, संगठनों, संस्थाओं इत्यादि ने लड़कियों के लिए स्कूल-कॉलेज स्थापित किये. इनमें वे समस्याएँ, दकियानूसी, जेंडरगत पूर्वाग्रह / दुराग्रह इत्यादि नहीं देखे जाते जो हिंदी-उर्दू प्रदेश के लोगों में दिखाई देते थे.


शिक्षा के काम की शुरुआत 19वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में बंगाल और बम्बई में ईसाई मिशनरियों की पत्नियों ने की थी. इन्होंने यह कार्य तीन स्तरों पर शुरू किया- 


1. भारतीय लड़कियों के स्कूल खोलकर, 


2. अनाथालय स्थापित कर और 


3. भद्रवर्गीय परिवारों के जनाना में जाकर.


भारत में स्त्रीशिक्षा के विकास के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नाम जे. ई. डी. बेथून का रहा है, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी की शिक्षा परिषद के अध्यक्ष थे. बेथून ने सरकार की मदद के बिना, अपने प्रयत्न और भारतीय लोगों के सहयोग से लड़कियों का एक निजी स्कूल खोला.

बेथून ने 1849 में कलकत्ता में हिंदू बालिका विद्यालय की स्थापना की. इस विद्यालय के संचालन और लगातार चलते रहने और विकास करने के मामले में बंगाल के भद्र वर्ग, जमींदारों इत्यादि ने बेथून की भरपूर मदद की. इस विद्यालय का माध्यम बंगला भाषा थी. अंग्रेज़ी की जगह बंगला को माध्यम बनाना एक क्रान्तिकारी कदम था, जिसका हर तरफ स्वागत हुआ, आगे चलकर यह स्कूल अपग्रेड हुआ और हिंदुस्तान के पहले महिला महाविद्यालय के रूप में जाना गया. इसी महाविद्यालय से कादम्बिनी और चन्द्रमुखी बोस नाम की हिंदुस्तन की पहली दो स्नातिकाएँ पैदा हुई. बेथून के नाम पर आगे बंगाल के शिक्षित वर्ग ने बेथून सोसाइटी बनाई, जिसने बंगाल में स्त्रीशिक्षा के आंदलनों को आगे बढ़ाया. हुगली के जमींदार बाबु जयकृष्ण मुखर्जी ने भी अपने प्रयासों से एक कन्या पाठशाला खोली.


बंगाल में स्त्रीशिक्षा के आंदलनों को आगे बढ़ाने का काम ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने किया. ईश्वरचंद्र विद्यासागर का बड़ा योगदान यह रहा है कि उन्होंने स्त्रीशिक्षा को धर्म की हदबंदियों से निकालकर धर्मनिरपेक्षतावादी स्वरूप प्रदान किया. उनका अभिमत था कि "हिंदुत्व और इस्लाम दोनों ही भारत में स्त्रियों की अवनति के लिए जिम्मेदार थे तथा इन्हें निरक्षरता एवं अज्ञानता के इस कुंड से निकलने के लिए इन्हें 'धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर शिक्षित करने की ज़रूरत है;" (द्रष्टव्य कुमार, राधा स्त्री संघर्ष का इतिहास; अनुवाद एवं सम्पादन रमा शंकर सिंह 'दिव्यदृष्टि'; वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2; पृष्ठ - 50).

स्त्रीशिक्षा में ईश्वरचंद्र विद्यासागर का एक और बड़ा योगदान यह भी रहा कि उन्होंने इस आंदलनों को बंगाल के ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाया- "बंगाल के स्त्रीशिक्षा आंदलनों में विद्यासागर की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका यह थी कि उन्होंने इसे कलकत्ता महानगर की सीमाओं से बाहर ले जाकर देहाती इलाकों में फैलाया जहाँ सदियों से खियाँ अज्ञान और जड़ता के अँधेरे में जी रही थीं.” (तलवार, वीरभारत; रस्साकशी (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, दूसरा संशोधित संस्करण: 2006: सारांश प्रकाशन, दिल्ली;

ISBN: 81-7778007-7 पृष्ठ 44 ) स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की अद्वितीय सक्रियता और कार्यक्षमता का प्रमाण देते हुए अरविन्द पोद्दार ने अपनी पुस्तक 'रेनेसाँ इन बंगाल : क्वेस्ट एंड कन्फ्रेटेशन में लिखा है-“सरकारी सहायता मिलेगी या नहीं, इसकी परवाह किये बिना उन्होंने नवम्बर 1857 से मई 1858 के बीच लड़कियों के लिए कुल 35 स्कूल खोले- सबके सब गाँव में- जिनमें 1300 लड़कियों ने दाखिला लिया, जो उस जमाने के बंगाल में एक नामुमकिन कल्पना थी." (पोद्दार, अरविन्द, रेनेसाँ इन बंगाल : क्वेस्ट एंड कन्फ्रटेशन+ 1800-1860; इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी 1970; शिमला; पृष्ठ 88-89).


बंगाल के अलावा स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में युगान्तरकारी कार्य महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले ने किया. ज्योतिबा फुले ने जे. ई. डी. बेथून से एक साल पहले 1848 में पुणे में स्त्रीशिक्षा की मुहिम शुरू की थी. ज्योतिबा फुले का मौलिक और ऐतिहासिक योगदान यह रहा है कि शिक्षा को उन्होंने “भद्रवर्ग के कब्जे से निकालकर, धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त कर, गरीब मेहनतकश जनता तक पहुँचाया.” (तलवार, वीरभारत; रस्साकशी (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, दूसरा संशोधित संस्करण: 2006; सारांश प्रकाशन, दिल्ली; ISBN: 81-77780077: पृष्ठ 45 ) शिक्षा के वर्गीय / जातिवादी स्वरूप को जानने वाले वे पहले शिक्षाविद थे.

वीरभारत तलवार ने उनके विषय में यह उचित ही लिखा है- “नवजागरण के दौर में फुले अकेले ऐसे सुधारक थे जिन्होंने सरकारी शिक्षा के वर्गीय चरित्र को समझा और शिक्षा पर ऊँची जातियों के वर्चस्व को तोड़ने का बीड़ा उठाया. xxx वे भारत की गरीब जनता के बीच स्त्रीशिक्षा के प्रवर्तक थे." (वही, पृष्ठ- 45-46). फुले ने ब्राह्मणों के गढ़ पुणे में पहली बार कन्या पाठशाला खोली, जिसमें माँग और महार जैसी दलित जातियों की लड़कियों को भी दाखिला दिया गया. यह पहली बार था कि दलित लड़कियाँ कहीं पढ़ रहीं थीं. इन दलित लड़कियों के दाखिले वाले स्कूल में कोई हिंदू महिला अध्यापिका बनने को तैयार नहीं थी.

तब फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ाया और फिर उन्हें शिक्षिका बनाया. सावित्रीबाई- एक शूद्र स्त्री- भारतवर्ष की पहली अध्यापिका बनी. यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि फुले के स्कूल में आधुनिक शिक्षा के विषय पढ़ाये जाते थे (द्रष्टव्य: वही; पृष्ठ 46).


गैर-हिंदी क्षेत्रों में आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती स्त्रीशिक्षा के बहुत बड़े उन्नायक माने जाते हैं. पंजाब क्षेत्र में आर्यसमाज ने स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया. पंजाब में आर्यसमाज ने कन्या गुरुकुल योजना की शुरुआत की ये बिना सरकारी सहायता के चलते थे. इसके अलावा आर्यसमाज ने पुत्री पाठशाला' और 'कन्या विद्यालय' जैसी संस्थाएँ भी खड़ी कीं.

पंजाब में आर्यसमाज का स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में सबसे उलेखनीय कार्य जालन्धर में 1889 में लाला देवराज द्वारा स्थापित कन्या पाठशाला थी, जो अतिशीघ्र कन्या महाविद्यालय में अपग्रेड हो गई. आगे यह संस्था आवासीय बनी. यहाँ उत्तर भारत का पहला लड़कियों का छात्रावास बना, इस संस्था की उन्नति में लाला देवराज के समूचे परिवार के साथ अनगिनत लोग शामिल थे. सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बड़ी संख्या में स्त्रियाँ भी इनमें शामिल थीं. यह आगे चलकर स्त्रीशिक्षा की एक आदर्श संस्था बनकर उभरी गई. इसमें कन्याओं (अविवाहित लड़कियों) के साथ-साथ विधवाओं को भी प्रवेश की अनुमति थी. आगे चलकर पंजाब के अन्य अनेक भागों में आर्यसमाज ने लड़कियों के स्कूल खोले आर्यसमाज की प्रसिद्ध डीएवी कालेजों की श्रृंखला पंजाब से ही शुरू हुई थी, जो आगे चलकर देशव्यापी रूप लेती चली गई.