वियना कांग्रेस के कार्य - Works of the Congress of Vienna

वियना कांग्रेस के कार्य - Works of the Congress of Vienna


वियना कांग्रेस का मुख्य कार्य उन प्रदेशों का वितरण करना था, जिन्हें नेपोलियन के पतन के बाद फ्रांस को त्याग देना पड़ा था। कांग्रेस में संपन्न समझौते तीन सिद्धांतों पर आधारित थे


1. शक्ति-संतुलन का सिद्धांत जिसने यूरोप की शांति और व्यवस्था के लिए सुरक्षा का पर्याप्त प्रबंध किया। कांग्रेस में स्पष्ट रूप से घोषणा की गई कि इसका उद्देश्य नेपोलियन द्वारा गैर-फ्रांसीसी प्रदेशों का निपटारा करना तथा यूरोप में वास्तविक एवं स्थायी शक्ति-संतुलन की पुनर्स्थापना करना था।


2. वैधता का सिद्धांत, जिसके द्वारा क्रांति के पूर्व की स्थिति को पुनः बहाल किया जाना था। इसका उल्लेख पेरिस की प्रथम संधि में ही किया जा चुका था। इसके अनुसार फ्रांस की क्रांति के पहले की स्थिति को ध्यान में रखकर यूरोपीय देशों की प्रादेशिक सीमाएँ पुनर्गठित की गई तथा नेपोलियन द्वारा अपने राजसिंहासनों से वंचित शासी परिवारों को पुनर्स्थापित किया गया। इसके साथ ही नेपोलियन के द्वारा किए गए परिवर्तनों को अवैध घोषित कर दिया गया, तथा


3. विजयी देशों को पुरस्कार तथा पराजित देशों को दंड का सिद्धांता इन्हीं तीन सिद्धांतों ने वियना कांग्रेस का मार्ग निर्देशन किया।


वियना कांग्रेस के समक्ष तात्कालिक समस्या फ्रांस के विरुद्ध सुरक्षा का उचित प्रबंध करना था। इस विषय पर विजयी देशों के मत एक थे। इस संबंध में पहला निर्णय यह लिया गया कि फ्रांस के चारों ओर सशक्त देशों की एक दीवार खड़ी की जाए। मित्र राष्ट्रों ने उसकी पूर्वी सीमा पर तीन प्रहरी तैनात किए 1. उत्तर में नीदरलैण्ड, 2. मध्य में प्रशा एवं 3. दक्षिण में सडनिया। बेल्जियम ऑस्ट्रिया का एक प्रांत था। इसे हॉलैण्ड के साथ संयुक्त कर नीदरलैण्ड नामक एक नए साम्राज्य का गठन किया गया, ताकि फ्रांस के विरुद्ध एक मजबूत दीवार खड़ी की जा सके। इसी प्रकार फ्रांस की उत्तर-पूर्वी सीमा पर पवित्र रोमन साम्राज्य के छोटे-छोटे धार्मिक राज्य थे।

राइन नदी के तट पर अवस्थित इन राज्यों को प्रशा के साथ संयुक्त कर दिया गया ताकि फ्रांस की पूर्वी सीमा पर भी उसके विरुद्ध सशक्त प्रहरी को तैनात किया जा सके। फ्रांस की दक्षिण-पूर्वी सीमा पर जेनोआ का गणराज्य था। इसकी घाटियों से होकर फ्रांस की सेना कई बार इटली पहुँच गई थी। इसलिए इस दिशा में एक मजबूत अवरोध खड़ा करने के उद्देश्य से जेनोआ को सर्डीनिया के साथ संयुक्त कर नेपोलियन द्वारा अपदस्थ सर्डीनिया के राजा को पुनर्स्थापित किया गया। इस प्रकार, फ्रांस की पूर्वी सीमा पर अंतःस्थ राज्यों की एक दीवार खड़ी की गई ताकि भविष्य में फ्रांस के आक्रमणों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया जा सके।

इसके अतिरिक्त फ्रांस के विरुद्ध अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में स्विट्जरलैण्ड को कैण्टनों के स्वतंत्र संघ के रूप में पुनस्थापित किया गया।


वियना कांग्रेस के समक्ष एक बहुत बड़ी समस्या थी वारसा का ग्रैण्ड डची। इस राज्य का गठन नेपोलियन ने किया था। उसने प्रशा एवं ऑस्ट्रिया की पॉलिश आबादी वाले प्रदेशों को पृथक कर उन्हें एक स्वतंत्र राज्य के रूप में गठित किया था और इसका शासन सैक्सनी के राजा को सुपुर्द किया था। नेपोलियन के पतन के पश्चात् रूस संपूर्ण वारसा पर अपना अधिकार चाहता था। प्रशा वारसा में सम्मिलित अपने पॉलिश प्रदेशों को छोड़ देने के लिए तैयार था, यदि इसकी क्षतिपूर्ति उसे कहीं और कर दी जाती। उसकी दृष्टि सैक्सनी पर थी। वह अपने पॉलिश प्रदेशों के बदले सैक्सनी को पाना चाहता था ।


रूस और प्रशा एक-दूसरे की माँगों से सहमत थे। उन दोनों ने इस संबंध में एक संधि भी कर ली थी किंतु ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड एवं फ्रांस रूस एवं प्रशा की इन माँगों के विरुद्ध थे। पर मित्र राष्ट्रों के बीच आपस में जो भी ईर्ष्या तथा प्रतिस्पर्धा रही हो, वे सभी नेपोलियन से समानरूप से घृणा करते थे और उससे हर हालत में मुक्त होना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने आपसी मतभेदों को अविलंब मिटा दिया और रूस को वारसा का अधिकांश भाग देने का निर्णय लिया। इसके साथ ही प्रशा को पॉसेन नामक प्रांत देने का निर्णय लिया गया और क्रैकाउ को एक स्वतंत्र नगर के रूप में स्थापित किया गया। सैक्सनी के राजा को पुनः सिंहासनारूढ़ करने का निर्णय लिया गया।

ड्रेस्डेन एवं लिप्जिक नामक नगर उसके अधीन बने रहे, लेकिन उसे सैक्सनी का एक बड़ा भाग प्रशा को देना पड़ा। प्रशा को क्षतिपूर्ति स्वरूप राइन नदी के किनारे भी विस्तृत भू-भाग दिए गए। उसे स्वीडेन से पोमेरानिया भी मिला।


बाल्टिक प्रदेश में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। फिनलैण्ड को रूस के साथ मिला दिया गया और इस नुकसान के लिए स्वीडेन को क्षतिपूर्ति स्वरूप नार्वे दिया गया जो उस समय डेनमार्क के अधीन था। डेनमार्क को इस क्षति की पूर्ति उत्तरी जर्मनी में कुछ प्रदेशों को देकर की गई।


केंद्रीय यूरोप में सबसे प्रमुख समस्या जर्मनी के पुनर्गठन की थी। जर्मनी में एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना तत्काल संभव नहीं थी, क्योंकि फ्रांस के अतिरिक्त रूस भी एकीकृत जर्मनी के पक्ष में नहीं था। प्रशा और ऑस्ट्रिया की प्रतिद्वंदिता के कारण भी जर्मनी में एकीकृत राष्ट्रीय राज्य की स्थापना सहज संभव नहीं थी। इसलिए वियना कांग्रेस ने जर्मनी को 39 राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय लिया। इस संघ के लिए ऑस्ट्रिया की अध्यक्षता में एक संघीय डायट का प्रावधान किया गया जिसकी सदस्यता जर्मनी के विभिन्न शासकों द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों को प्रदान की गई।


वियना कांग्रेस द्वारा गठित जर्मन परिसंघ का कोई सदस्य संघ अथवा इसके किसी सदस्य के विरुद्ध किसी विदेशी शक्ति के साथ कोई संधि नहीं कर सकता था,

किंतु वस्तुस्थिति यह थी कि यह संघ अत्यंत शिथिल था, जिसका प्रत्येक सदस्य अपने आंतरिक मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र था। इसके साथ ही इस संघ के कई सदस्य राज्यों का शासन विदेशियों के हाथ में था। उदाहरणार्थ, श्लेसविग हॉलस्टीन तथा लक्जमबर्ग के ड्यूक क्रमशः डेनमार्क एवं नीदरलैण्ड के राजा थे। इसी प्रकार हैनोवर का राजा इंग्लैंड का राजा थे। संघीय डायट के ये गैर जर्मन सदस्य प्रारंभ से ही एक कमजोर एवं विभाजित जर्मनी के पक्ष में थे। इसके अतिरिक्त ऑस्ट्रिया भी हमेशा ही इस बात के लिए सचेत था कि किसी भी हालत में जर्मनी में एक मजबूत तथा एकीकृत राज्य की स्थापना नहीं हो।


दक्षिणी यूरोप के प्रादेशिक पुनर्गठन में भी कुछ कठिनाइयाँ उपस्थित हुई। बेल्जियम ऑस्ट्रिया के अधीन था, किंतु वियना कांग्रेस ने बेल्जियम को हॉलैण्ड के साथ संयुक्त कर दिया। ऑस्ट्रिया को इस क्षति की पूर्ति उत्तरी इटली में लोम्बार्डी एवं वेनेशिया के रूप में सर्वाधिक संपन्न प्रांतों को देकर की गई। मध्य इटली में अवस्थित मोडेना एवं टस्कनी को पुनर्जीवित किया गया और इन इचियों का शासन हैब्सबर्ग परिवार के एक सदस्य को दिया गया। इसी प्रकार, परमा का शासन नेपोलियन की पत्नी, जो हैब्सबर्ग घराने से संबद्ध थी, के अधीन कर दिया गया। पोप को मध्य इटली में अवस्थित उसके सारे प्रदेश वापस कर दिए गए तथा नेपल्स का राज्य इसके पुराने शासक फर्डिनेण्ड IV को सौंप दिया गया।