द्विवेदीयुगीन कविता की ऐतिहासिक भूमिका (2) - Historical role of Dwivedi era poetry

द्विवेदीयुगीन कविता की ऐतिहासिक भूमिका (2) - Historical role of Dwivedi era poetry

 राष्ट्रीयता की भावना


राष्ट्रीयता की भावना द्विवेदीयुगीन कविता की मूल प्रवृति है। इस युग के सबसे महत्वपूर्ण कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं जिन्हें राष्ट्रकवि के रूप में भी जाना जाता है। इनकी कविता में राष्ट्रीय चेतना पराधीनता के दुःख और प्रतिरोध से पैदा होती है। इसीलिए वे अपनी काव्यपुस्तक 'भारत-भारती' में देश की स्थिति पर विचार करते हुए कहते हैं -


हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी; आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी ।


कवि वर्तमान के बिन्दु से अतीत और भविष्य दोनों को देखता है। काल के तीनों आयामों में देखने पर उसे भारतदेश की हतदर्प स्थिति का भान होता है।

वर्तमान की विकट स्थिति के प्रति उद्विग्न होकर ही वह गौरवशाली अतीत की खोज करता है और भविष्य के प्रति चिन्ता भी जाहिर करता है। वह साफ़-साफ़ देख पाता है कि अतीत की समृद्धि और वैभव आज नहीं है तो इसका सबसे बड़ा कारण भारत का पराधीन होना है। उस पराधीनता ने ही भारत के वैभव और कला कौशल का अपहरण कर लिया था। ठाकुर गोपाल शरण सिंह इस पराधीनता का हाल बयान करते हुए ठीक ही कहते हैं-


वह धीरता कहाँ है गंभीरता कहाँ है? वह वीरता हमारी है वह कहाँ बड़ाई ? क्या हो गई कलाएँ कौशल सभी हमारे ? किसने शताब्दियों की ली छीन सब कमाई ?


इस पराधीनता ने सिर्फ़ कमाई ही छीनी होती तो गनीमत थी लेकिन उसने तो भारतीयों की उद्यमशीलता और कौशल को भी नष्ट करके उन्हें परजीवी, स्वार्थी, द्वेषी, ईर्ष्यालु, आलसी और मिथ्याचारी बना दिया। इन सब बुराइयों ने भारतीयों की हीनता को बढ़ाया। भारतवासियों की जबदी मनोवृति को छू करने और उनके सोये हुए स्वाभिमान को जगाने के लिए आवश्यक था कि उनकी इन बुराइयों को छू किया जाए। इन बुराइयों के प्रति सचेत करना और कर्मठता, उद्यमशीलता, समाजहित तथा राष्ट्रहित की ओर भारतभूमि के सपूतों को प्रेरित करना इस युग का प्रमुख नवजागरणवादी स्वर है और इस दौर की राष्ट्रीय चेतना का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है।


भरतखण्ड का हाल ज़रा देखो है कैसा । आलस का जंजाल ज़रा देखो है कैसा ॥ ज़रा फूट की दशा खोल कर आँखें देखो। खुदगर्जी का नशा खोल कर आँखें देखो ॥


है शेखी दौलत की कहीं, बल का कहीं गुमान है। है खानदान का मद कहीं, कहीं नाम का ध्यान है ।


राय देवी प्रसाद 'पूर्ण' की ये पंक्तियाँ आलस, स्वार्थ, अकर्मण्यता और आडम्बर में पड़े भारतवासियों की कमजोरी का बिल्कुल ठीक विवरण दिया है। कवि की यह शिकायत भी सही है कि उन्हें आडम्बर और कुरीतियों का तो खूब ध्यान है लेकिन देशहित और समाजहित का ध्यान बिलकुल भी नहीं है।


भारतभूमि के वीरों की इस अकर्मण्यता, आडम्बरप्रियता, खुदगर्जी और हीनताबोध से लड़ने के लिए इस युग के कवि प्राचीन गौरव को अपना हथियार बनाते हैं। राम और कृष्ण जैसे पौराणिक देवता और बुद्ध जैसे इतिहासपुरुष इस युग की कविता के नायक बन गए। सीता, ऊर्मिला और यशोधरा जैसी त्यागमयी चरित्र की नारियाँ इस दौर की कविता के लिए आदर्श हो गई और 'राधा कन्हाई का प्रेम' अब बीते जमाने की बात हो गया। लोकचेतना में पैठी हुई पौराणिक कहानियाँ अब कविता की मुख्य विषय-वस्तु बन गई। इस युग के कवियों ने भारतीयों को जगाने,

उन्हें पराधीनता का बोध कराने तथा पराधीनता की बेड़ियों को काट फेंकने हेतु उद्धत करने के लिए अतीत की पौराणिक कथाओं व कहानियों का उपयोग किया। इस क्रम में पाठ्यक्रम में संकलित रामनरेश त्रिपाठी के खण्डकाव्य 'पथिक' के दूसरे सर्ग को देखा जा सकता है। इस सर्ग में कवि प्रेम और प्रकृति के मनोहर आलिंगन को त्याग कर मातृभूमि के ऋण को चुकाने को परम कर्तव्य के रूप में देखता है । कवि अकर्मण्यता को त्याग कर उद्यमशीलता का वरण करने का आह्वान करता है। इस तरह द्विवेदीयुगीन कविता की राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका अतीत प्रेम और पुराणोन्मुखता है। इसे ही कई बार द्विवेदी युग का पुनरुत्थानवाद भी कहा जाता है।


द्विवेदी युग की कविता की राष्ट्रीय चेतना का अगला पक्ष है, 'भारत देश की प्रकृति और उसकी प्राकृतिक चौहद्दी का भावपूर्ण यशोगान करना।' रामनरेश त्रिपाठी, सियारामशरण गुप्त और श्रीधर पाठक की कविताओं में इसके अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। यद्यपि ये कविताएँ स्थूल और इतिवृत्तात्मक हैं लेकिन स्वदेश-प्रेम की आरम्भिक अवस्था को बहुत सफलतापूर्वक संचरित करती हैं। उदाहरण के लिए रामनरेश त्रिपाठी की एक कविता को देखा जा सकता है-


जिसका चरण निरन्तर रत्नेश धो रहा है। जिसका मुकुट हिमालय वह देश कौन-सा है ?


नदियाँ जहाँ सुधा की धारा बहा रही हैं। सींचा हुआ सलोना वह देश कौन-सा है ?


ऐसा नहीं है कि ये कवि सिर्फ़ भारत देश की प्राकृतिक सुषमा और सौन्दर्य का ही वर्णन करते हैं, वे देश की पराधीनता और अवनति के अनेकानेक कारणों का विश्लेषण भी करते हैं और उन बुराइयों को दूर करने का आह्वान भी करते हैं-


उठो त्याग दें द्वेष, एक ही सबके मत हों। सीख ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल उन्नत हों । भारत की उन्नति सिद्धि से हम सबका कल्याण है। दृढ समझो इस सिद्धान्त को, हम शरीर यह प्राण है।


ये पंक्तियाँ सिर्फ़ एकता और प्रगति का सन्देश ही नहीं देती हैं बल्कि इसमें गहरा राजनैतिक सन्देश भी छुपा है।

इस युग के कवि भारत की परतन्त्रता की बेड़ियों को हिंसा और पाशविक बल से नहीं काटना चाहते हैं । वे परतन्त्रता की बेड़ियों को काटने के लिए भारतवासियों को ज्ञान-विज्ञान और कला-कौशल के माध्यम से उन्नत, उद्यमशील और सबल बनाना चाहते है। कवि इस सिद्धान्त पर दृढ़ता से विश्वास करने का आह्वान करता है क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान-विज्ञान से विमुखता और अकर्मण्यता ही भारतीयों की परतन्त्रता का असली कारण है। कहना न होगा कि सबलीकरण का यह सिद्धान्त गाँधीवादी दर्शन से निकला है। मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त और रामनरेश त्रिपाठी आदि कवियों की कविता राजनैतिक और दार्शनिक रूप से गाँधीवाद से प्रभावित है।

इनकी कविताओं में गाँधीवादी नैतिकता, सत्य और अहिंसा की अभिव्यक्ति हुई है। परतन्त्रता के खिलाफ गाँधी के नेतृत्व में चलने वाली स्वतन्त्रता की लड़ाई में उस दौर की हिन्दी कविता अपना स्वर मिला रही थी। इसके प्रमाण के लिए सियाराम शरण गुप्त की 'बापू' और 'नोआखली' जैसी कविताओं को याद किया जा सकता है।


सामाजिकता


काव्य को लेकर द्विवेदीजी की दृष्टि उपयोगितावादी थी। वे काव्य को सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं समझते थे । वे चाहते थे कि कविता मनोरंजन के अतिरिक्त अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह भी करे।

उनकी नज़र में मनुष्य, समाज और देश को बनाने तथा बदलने का काम भी साहित्य का ही था। द्विवेदीजी के इस विचार का प्रभाव सरस्वती के लेखकों पर भी पड़ा। मैथिलीशरण गुप्त ने इस युग की साहित्यिक धारणा को व्यक्त करते हुए कहा-


केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए। उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए। क्यों आज रामचरितमानस सब कहीं सम्मान्य है ? सत्काव्य युत उसमें परम आदर्श का प्राधान्य है।


इस काव्यादर्श के परिणामस्वरूप द्विवेदीयुगीन कवि रीतिकालीन और भारतेन्दुकालीन नायिका भेद,

प्रेम और शृंगार को छोड़कर इस देश और समाज को बदलने वाली और कर्म में रत रहने की चेतना जगाने वाली कविताओं की ओर ध्यान देने लगे। इसके परिणामस्वरूप खड़ीबोली हिन्दी कविता की विषय-वस्तु में परिवर्तन आया । अब कविता के लिए सामाजिक सरोकार महत्त्वपूर्ण हो गया। ऊपर के अनुच्छेद में 'भारत भारती' से उद्धृत पंक्तियों में आपने देखा कि वर्तमान के प्रति सजगता का भाव ही कवि को अपने अतीत की खोज और भविष्य की चिन्ता की ओर ले जा रहा है। 'भारत भारती' कविता की धारणा में बुनियादी बदलाव का प्रमाण है ।

अब कविता की अन्तर्वस्तु में राजनैतिक और सामाजिक चेतना का प्रवेश हो गया। केवल मनोरंजन नहीं बल्कि राष्ट्र और सामाजिक हित कविता के लिए सर्वोपरि हो गया। इस काव्यदृष्टि का परिणाम यह हुआ कि देश की व्यथा और दुर्दशा से सम्बन्धित कविताओं का लिखा जाना शुरू हो गया। जागरण और समाज-सुधार कविता के लक्ष्य हो गए। मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' इसका प्रमाण है। 'साकेत' जैसे काव्य में भी, यदि ध्यान से देखें तो, सीता वन में आदिवासी महिलाओं को सिलाई, बुनाई और कढ़ाई करना सिखाती हैं।

'साकेत' में ही ऊर्मिला जैसे त्याग करने वाले चरित्र को आदर्श के रूप में पेश किया जाता है। इसी युग में यशोधरा के त्याग और स्वाभिमान को भी महिमामण्डित किया गया तथा लोक-कल्याण के लिए बुद्ध के गृह त्याग को उचित माना गया। त्याग, स्वाभिमान और आदर्श का यही स्वर 'जयद्रथ वध', 'मिलन' और 'रंग में भंग' आदि रचनाओं में भी देखा जा सकता है। हरिऔध के 'प्रियप्रवास' की राधा भी अन्ततः समस्त विश्व की सेविका बन जाती है। इस युग के कवियों के ये प्रयास समाज को नये सिरे से पुनर्गठित करने, उसकी कुरीतियों को दूर करने और उसमें नयी चेतना का संचार करने के संकल्प का ही परिणाम है।


ऐसा नहीं है कि इस युग के कवियों का सारा ध्यान उपदेश देने और आदर्श निर्माण में ही लगा रहा. उनका ध्यान समाज के निर्धन और शोषित पीड़ित लोगों की ओर भी गया। किसानों के शोषण व दुःख का विवरण देना भी इस युग के कवियों की एक विशेषता है। मैथिलीशरण गुप्त की 'किसान' शीर्षक कविता का एक उदाहरण देखा जा सकता है-


हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ। खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ । आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अन्त में। अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमन्त में ॥


इस युग के कवि सिर्फ़ किसानों के शोषण का वर्णन ही नहीं करते बल्कि उनकी आलोचनात्मक चेतना इस शोषण के कारणों की पड़ताल भी करती है। गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की 'किसान' शीर्षक कविता किसानों के दुःख और पीड़ा के कारणों की पड़ताल करती है। वे उनके दुःख के लिए भाग्य या ईश्वर को जिम्मेदार नहीं मानते । वे राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के शोषणमूलक प्रकृति की पहचान करते हैं और उसके लिए औपनिवेशिक शासन उसके द्वारा पैदा किये गए ज़मींदारों और सूदखोरों के तन्त्र को जिम्मेदार ठहराते हैं।


नज़राना देते पेट काट, कारिंदे लेते लहू चाद


दरबार बीच कह चुके लाट, पर ठोंक ठोंक अपना लिलाट, रोते दुखड़ा अब भी किसान ।

कितने ही बेढब सूदखोर, लेते हैं हड्डी तक चिन्चोर,


है मंत्रसिद्ध मानो अघोर, निर्दय, निर्गुण, निर्मम, कठोर है जिनके हाथों में किसान ।


किसानों के साथ ही समाज के हाशिए के लोगों के कष्ट की ओर भी इस युग के कवियों और सम्पादकों का ध्यान गया। विधवा स्त्रियों की करुण व्यथा भी हिन्दी कविता के पाठकों के सामने आयी। इसी दौर में हीरा डोम की कविता 'अछूत की शिकायत' शीर्षक से सरस्वती में छपी जिसमें उन्होंने अपने सामाजिक शोषण और दुःख की चर्चा बेबाकी से की है। इस तरह द्विवेदी युग की कविता अपने समय के राजनैतिक-सामाजिक प्रश्नों से मुठभेड़ करती है ।

वे समाज को आदर्श और नीति के आधार पर चलने की प्रेरणा देते हैं। वे भारतवासियों में त्याग, स्वाभिमान और शौर्य की भावना भर देना चाहते हैं। इसके साथ ही वे समाज के दुखी, पीड़ित और शोषित लोगों के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाते हैं। वे इस शोषण के कारणों की पड़ताल भी करते हैं। ऐसा करते हुए ये कवि आधुनिक हिन्दी कविता की काव्यभूमि का विस्तार करते हैं। हिन्दी कविता के भूगोल का विस्तार करते हैं। उसे नये मुद्दों और नये सरोकारों से सम्पृक्त करते हैं। जाहिर है कि ऐसा करने के लिए उन्हें हिन्दी कविता की नयी शब्दावली का निर्माण करना पड़ा। अन्य अनुशासनों के शब्दों को काव्यात्मक बनाना पड़ा।