लोक कथा के पुरातन परम्परा-स्रोत - ancient tradition-sources of folk tale

लोक कथा के पुरातन परम्परा-स्रोत - ancient tradition-sources of folk tale


लोक-कथाओं की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। इस परम्परा की प्राचीनता की पुष्टि करते हुए डॉ. शंकरलाल यादव ने इन्हें ऋग्वेद से भी पुरातन मानते हुए लिखा है, "कहानियों की उद्भावना की आदिभूमि भारत को माना गया है। यों तो कहानी का मौलिक रूप सृष्टि के समारम्भ से ही प्रत्येक देश में पाया जाता है। ये परम्परित कहानियाँ उस देश में घास की तरह अपने आप पैदा हुई हैं। सभी देशों की वृद्धाओं ने बाल-विनोद के लिए कहानियाँ कही हैं, किन्तु साहित्यिक कहानियाँ लिखने का श्रेय भारत को है। वहाँ इस साहित्य अभिव्यक्ति की परम्परा एक सुदूर अतीत से विद्यमान है।"


लोक कथा के बीज हमें सर्वप्रथम वैदिक संहिताओं में आख्यान रूप में उपलब्ध होते हैं इसलिए वेद कथा-परम्परा का आदिस्रोत है। इसी प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों में भी अनेक कथाओं के लघुरूप मिलते हैं। इसके उपरान्त उपनिषदों में भी अनेक कथाएँ प्राप्त होती हैं। उपनिषद् काल के बाद पौराणिक प्रथम सेमेस्टर पंचम पाठ्यचर्या (वैकल्पिक) विकल्प II लोकसाहित्य MAHD-06 - युग में कहानियों का विकास होने लगा और वेदों में बीज रूप में मिलने वाली कथाएँ पुराणों में विस्तृत आख्यानों का रूप लेने लगीं। अतः भारत को लोक कथा की उत्स भूमि माना जाता है। इस परम्परा को आगे बढ़ाने में विभिन्न ग्रन्थों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-


1. बृहत्कथा


लोक कथा का सबसे प्राचीन संग्रह गुणाढ्य की बृहत्कथा को माना जाता है। यह ग्रन्थ पैशाची भाषा में लिखा गया है, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है किन्तु इस पर अवलम्बित तीन ग्रन्थ संस्कृत साहित्य में प्राप्त होते हैं - बृहत्कथा श्लोक संग्रह, बृहत्कथामंजरी तथा कथासरित्सागर । उक्त तीनों ग्रन्थ संस्कृत श्लोकों में निबद्ध हैं। बृहत्कथा श्लोक संग्रह की रचना बुधस्वामी, बृहत्कथामंजरी की रचना आचार्य क्षेमेन्द्र और कथासरित्सागर की रचना महाकवि सोमदेव ने की। इनमें से कथासरित्सागर अधिक प्रसिद्ध और प्रचलित है।


2. पंचतंत्र


लोक कथा की प्राचीन परम्परा में संस्कृत के कथा-साहित्य पंचतंत्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके रचयिता आचार्य विष्णु शर्मा ने पाँच तंत्रों (भागों) में इसकी रचना की, इसलिए इसे पंचतंत्र कहा गया। इस ग्रन्थ के रचना करने के पीछे रचनाकार का उद्देश्य यह था कि कुछ रोचक कथाओं के माध्यम से नीतिविषयक उपदेश श्रोताओं तक पहुँचा दिए जाएँ। इस प्रकार इस ग्रन्थ में रोचकता के साथ जीवन का पथ-प्रदर्शन करने वाले अनेक अनुभवों का नीर-क्षीर संयोग देखने को मिलता है। इन नीति कथाओं का इतना व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है कि इसका अनुवाद यूरोप की अनेक भाषाओं में हो चुका है। इसकी कहानियाँ कई देशों में कुछ परिवर्तन- परिवर्द्धन के साथ कही सुनी जाती हैं। इस प्रकार 'पंचतंत्र यूरोपीय कथाओं का मूल उद्गम स्वीकार किया जा सकता है।


3. हितोपदेश


नारायण पण्डित द्वारा रचित हितोपदेश नीति सम्बन्धी कथाओं का ग्रन्थ है। इसकी रचना 14वीं शताब्दी के आस-पास हुई और इसकी अधिकांश कथाएँ 'पंचतंत्र से ली गई हैं। इस ग्रन्थ की भाषा पंचतंत्र की अपेक्षा सरल है और शैली इतनी बोधगम्य है कि सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।


4. वैताल पंचविंशतिका


इस ग्रन्थ में महाराजा विक्रम से सम्बन्धित 25 कहानियाँ संगृहीत हैं, जिनसे उनके व्यावहारिक ज्ञान का बोध होता है।

इसकी रचना आचार्य शिवदास ने की है। इन कहानियों की पद्धति विशिष्ट प्रकार की है, जिसे प्रहेलिका पद्धति कहा जाता है। जिज्ञासा उत्पादक गूढ़ रहस्य की पृष्ठभूमि पर रची गई ये कथाएँ औत्सुक्य उत्पन्न करने में अभूतपूर्व तथा मनोरंजन में बेजोड़ हैं। इसका हिन्दत अनुवाद 'बैताल पचीसी' के नाम से उपलब्ध है। 



इन ग्रन्थों के अतिरिक्त 'सिहांसन द्वात्रिंशिका, जिसमें बत्तीस कथाएँ संकलित हैं। जो विक्रमादित्य के सिंहासन में बैठी हुई 32 प्रतिमाओं के मुख से वर्णित कथाओं के रूप में सँजोयी गई हैं। '

शुक सप्तति' में तोते द्वारा कही गई 70 कथाएं हैं, जो नायक के प्रवास के दौरान नायिका को धैर्य बंधाने के लिए तोते द्वारा कही गयी हैं। इसके अतिरिक्त गौतम बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित 'जातक कथा संग्रह भी उपलब्ध होता है।


कहा जा सकता है कि लोक कथा का जन्म मानव सभ्यता के विकास के साथ ही हुआ और उसके विकास के साथ ही ये भी निरन्तर विकास के पथ पर अग्रसर होती रही हैं। इनमें देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार बदलाव आते रहे हैं किन्तु लोकमंगल और अनुरंजन के उदात्त भाव सदैव विद्यमान रहे हैं।