लोक-साहित्य का क्षेत्र - area of folklore

लोक-साहित्य का क्षेत्र - area of folklore


लोक-साहित्य का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक एवं विस्तृत है क्योंकि जहाँ भी लोक है, लोक की अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ हैं, वहीं पर लोक-साहित्य है। अतिसामान्य लोगों की सभी सामान्य क्रियाएँ उत्सव, पुत्र जन्म, विवाह, हँसना- रोना, गाना, खेलना-कूदना आदि के गीत मानव जाति की अमूल्य निधि है। इसका पालन-पोषण जनसामान्य की क्रोड़ में होता है अतः लोक-साहित्य के क्षेत्र के अन्तर्गत वे सभी रचनाएँ समाहित हो जाती हैं जो जनभाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, ये रचनाएँ लोक गीत हैं। जो लोक गीत बड़े होते हैं वे लोक गाथा अथवा लोक कथा कहलाते हैं। ये गीत विभिन्न व्यक्तियों, ऋतुओं, पर्वों और त्योहारों, सामाजिक आचार- व्यवहार और जीविका के लिए दूर देश में जाने से सम्बन्धित हैं।

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने ठीक ही कहा है "सभ्यता के प्रभाव से छू अपनी सहजावस्था में विद्यमान जो निरक्षर जनता है उसकी आशा-निराशा, हर्ष- विषाद, जीवन-मरण, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि की अभिव्यंजना जिस साहित्य में होती है वह लोक-साहित्य है।" यही बात दूसरे शब्दों में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने भी लोक-साहित्य की व्यापकता के विषय में कही है- "लोक-साहित्य का विस्तार अत्यन्त व्यापक है। साधारण जनता जिन शब्दों में गाती है, रोती है, हँसती है, खेलती है, उन सबको लोक-साहित्य के क्षेत्र के अन्तर्गत रखा जा सकता है।" इससे स्पष्ट है कि लोक-साहित्य का सम्बन्ध जनसाधारण के जीवन-मरण एवं आयु के सभी कालों से है। इसमें सम्पूर्ण लोक जीवन समाहित है।


समाज से जुड़ी सभी वस्तुओं, ऋतु-सम्बन्धी, कृषि कार्य से जुड़े सभी अवसरों पर, राजनीति एवं राष्ट्रीय चेतना से जुड़े गीत तक इसमें सम्मिलित हैं।