मॉरीशस में भारतीय श्रमिकों का आगमन - Arrival of Indian workers in Mauritius
मॉरीशस में भारतीय श्रमिकों का आगमन - Arrival of Indian workers in Mauritius
1833 ई. में ब्रिटिश संसद ने प्रस्ताव पास कर उपनिवेशों में दास प्रथा का अंत कर दिया। इसके 1 वर्ष पश्चात् सन् 1834 ई. में मॉरीशस के गुलामों को मुक्त कर दिया गया। इस समय यहाँ अफ्रीकी तथा मालागाशी गुलाम हजारों की संख्या में थे। मुक्त होते ही इन्होनें गन्ने के खेतों में काम करने से इनकार कर दिया। इस इनकार ने चीनी उद्योग के लिए संकट पैदा कर दिया। मजदूरों की कमी होने के बाद उनकी निगाह स्थापित उपनिवेशों पर गई। भारत भी अंग्रेजों का उपनिवेश था और अंग्रेजों की निगाहें भारतीय मजदूरों पर पड़ी। ये मजदूर काफी सस्ते दामों पर उपलब्ध थे तथा अन्य की अपेक्षा मेहनती भी थे।
उन्हें विधिवत एक योजनानुसार अनुबंध के तहत अर्काटियों के माध्यम से मॉरीशस भेजने के लिए भर्ती किया गया। इसी तरह चीन व मलाया से भी मजदूरों को लाया गया। यहाँ पहले से अफ्रीकी तथा फ्रांसीसी नागरिक थे।
सन् 1834 से 1920 ई. तक मॉरीशस में सांढ़े चार लाख भारतीय लाए गए। गुलामी युग की मनःस्थिति के चलते इन लोगों पर गोरे जमींदार अमानुषिक अत्याचार करते थे। कार्य की कठिन परिस्थिति एवं अत्याचारों से तंग आकर डेढ़ लाख से अधिक लोग इस अवधि में भारत वापस लौट गए।
सन् 1839 से 1856 ई. की अवधि में दो बार भारतीय इंडेंचर श्रमिकों की भर्ती अस्थायी तौर पर बंद कर दी गई। मॉरीशस में उस समय चीनी कारखानों की संख्या 250 थी। मॉरीशस में गन्ने की खेती और चीनी उद्योग के विस्तार के लिए प्रवासी भारतीय श्रमिकों की निरंतर भर्ती एवं आपूर्ति आवश्यक थी इसीलिए पूंजीपति बागान मालिकों द्वारा ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता पर निरंतर दबाव बनाया गया। 31 जुलाई, 1917 ई. को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत से इंडेंचर श्रमिक भर्ती प्रथा समाप्त की गई।
मॉरीशस की एथनिक संरचना
लगभग 12 लाख की जनसंख्या वाले मॉरीशस में 33 प्रतिशत ईसाई हैं, जिनमें चीनी, क्रियोल, फ्रैंका-मारिशसी सम्मिलित किए जाते हैं।
शेष 67 प्रतिशत भारतीय मूल के हैं। भारत-वंशी समुदायों में 50 प्रतिशत हिंदू और 17 प्रतिशत मुसलमान हैं। स्वतंत्रता के 50 वर्षों बाद भी मॉरीशस एक जटिल समाज का संश्लिष्ट उदाहरण है, जहाँ रंग, नस्ल, संप्रदाय और अप्रवासन की पृष्ठभूमि आदि से जुड़े सूक्ष्म घटक विभेदकारी कारकों के रूप में बने हुए हैं।
भारतीय मॉरिशसी समुदाय एक समांग समूह न होकर क्षेत्रीय जातिगत और धार्मिक आधारों पर बँटा हुआ है। सबसे बड़ा समूह उत्तर भारतीय हिंदुओं (मुख्यतः बिहारी) का है, जो मराज, बाबूजी,
वैश और रविवेद आदि जातियों में विभक्त हैं। साथ ही हिंदुओं में तमिल, तेलुगू और मराठी अल्पसंख्यक भी हैं। संख्या की दृष्टि से अधिक होने के कारण बिहारी हिंदुओं का वर्चस्व बना हुआ है और स्वतंत्रता के बाद फ्रँका मारिशसी पाल बेरजे को छोड़कर सभी प्रधानमंत्री वैश्व हिंदू रहे हैं।
भारतीय मॉरिशसी मुसलमान कलकतिया और अन्य छोटे समूहों सूरती, बोहरा, खोजा, कोंक्कनी, अंजोवन आदि में बँटे हुए हैं।
कोंकण के नाविक कोक्कनी समूह को छोड़कर अधिकांश समूह अफगानिस्तान और मध्य-पूर्व से प्रवासित गुजराती मूल के हैं। अंजोवन समूह कोमोरोस से बहिष्कृत सुल्तान सईद अली के वंशज और अनुयायी हैं। ये सारे समूह पुनः शिया अल्पसंख्यक और सुन्नी बहुसंख्यक में विभक्त हैं।
मॉरीशस के सभी लोगों की बोल-चाल की भाषा (लिंगुआ फ्रैंका) क्रियोल है, जबकि अंग्रेजी और फ्रेंच मध्य वर्ग की भाषा है। गुजराती समूह द्वारा घरों में मातृभाषा के रूप में गुजराती आज भी प्रचलित है।
कलकतिया मुसलमानों की पूर्वज भाषा उत्तर भारतीय हिंदुओं की तरह भोजपुरी है, जो पुराने लोगों द्वारा आज भी बोली जाती है। मॉरीशस में एशियाई मूल की पूर्वज भाषाएँ (चीनी लोगों में मंदारिन, भारतीय मारिशसी लोगों में उर्दू, हिंदी, तमिल, तेलुगू और मराठी ) पुनः प्रचलित की जा रही हैं और स्कूली शिक्षा एवं मीडिया में स्थान प्राप्त हो रहा है। शिक्षा एवं राजकाज का लिखित माध्यम अंग्रेजी है, जबकि आपसी संप्रेषण की भाषा क्रियोल या फ्रेंच है एवं मीडिया की भाषा के रूप में फ्रेंच प्रभावी है।
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