लोक कथाओं की विशेषताएँ - characteristics of folk tales

लोक कथाओं की विशेषताएँ - characteristics of folk tales


भारतीय लोक कथाओं में लोक मानस की सब प्रकार की भावनाएँ और जीवन-दर्शन समाहित है। इनकी विशेषताओं को प्रकट करते हुए डॉ० नन्दलाल कल्ला ने लिखा है "बाल्यावस्था में ये लोक-कथाएँ मनोरंजन, - युवावस्था में मादकता की अनुभूति, वृद्धावस्था में अनुभूत तथ्य एवं सत्य का बोध कराती हैं।" बाल्यकाल में अपनी दादी-नानी से जो कथाएँ हमने सुनी हैं, वे भी लोक कथाएँ ही हैं। इनकी विशेषताओं को दर्शाता एक श्लोक द्रष्टव्य है-


यथा नव मृदघटे लग्नः संस्कारो नान्यथा भवते । कथाच्छलेन बालानां नीति स्तदिह कथ्यते ॥


अर्थात् जिस प्रकार नए मिट्टी के घड़े को दिया गया संस्कार कभी नहीं मिटता, उसी प्रकार कथा के माध्यम से दिये गए उपदेश का अमिट प्रभाव बालकों पर पड़ता है।


लोक कथा की विशेषताओं को समेटना शब्दों में जीवन को समेटने के भाँति है तथापि इन विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-


1. वक्ता और श्रोता का तादात्म्य :


लोक कथाएँ श्रुति और स्मृति के आधार पर युगों-युगों से चली आ रही हैं। इनकी प्रमुख विशेषता श्रोता और वक्ता के मध्य अभिन्न तादात्म्य है।

इस तादात्म्य में कमी होने पर कथा में नीरसता का समावेश हो जाता है, अतः कथा-वक्ता की श्रोतागण से यह अनिवार्य शर्त होती है कि वे कथा के मध्य अपनी सजगता का परिचय दें। राजस्थान में इसके लिए 'फौज में नगारो अर बात में हुंकारों की कहावत प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है जिस प्रकार नगाड़े की ध्वनि फौज में जोश का संचार करती है, उसी प्रकार कथा वाचन के दौरान श्रोता का हुंकारा वक्ता को जोश से भर देता है। हुंकारे के अतिरिक्त श्रोता जिज्ञासा और प्रशंसासूचक वाक्यांशों का भी प्रयोग करता है, जैसे- अच्छा !, आगे क्या हुआ ? वाह-वाह । कभी-कभी वक्ता के अधूरे वाक्य को पूरा करके भी श्रोता अपनी जागरूकता का परिचय देता है और इस तालमेल से कथा का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है।


2. मानव की मूल वृत्तियों का अंकन


लोक-कथाओं में मनुष्य की मूल वृत्तियों का सुन्व, सरल और प्रभावी वर्णन पाया जाता है। ये कथाएँ मनुष्य के जीवन के सभी पहलुओं को अपने विराट् फलक पर सहेजती हैं और मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों शृंगार, भय, काम, क्रोध, आशा, निराशा, लोभ, मोह आदि का हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं में दाम्पत्य जीवन की रमणीयता, पति-पत्नी के हास-परिहास के चित्रण में प्रेम का संयमित रूप मिलता है, किन्तु उच्छृंखल वासना के चित्रण का सर्वथा अभाव है। इन कथाओं में कहीं विमाता की ईर्ष्या तो कहीं पुत्रवत्सला माता का वात्सल्य अपने निर्मल स्वरूप में प्रवाहित होता मिलता है। समग्र जनजीवन इन्हीं मनोवृत्तियों से संचालित होता है।

अतः ये कथाएँ शाश्वत सत्य का प्रतीक बन जाती है और श्रोता के हृदय पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ने में सफल होती हैं।


3. अलौकिक घटनाओं का संयोजन :


लोक-कथाओं में रोमांच वृद्धि के लिए अलौकिक घटनाओं का भी संयोजन किया जाता है। इन कथाओं में सब कुछ सम्भव होता है, असम्भव कुछ भी नहीं। अभिमंत्रित फल से पुत्र-प्राप्ति, जादुई वस्त्र धारण कर अदृश्य होना, उड़ने वाला घोड़ा, मृतक का ईश्वरीय कृपा से जीवित होना, पशु-पक्षियों का मानवीय वाणी में बोलना आदि काल्पनिक घटनाएँ इन कथाओं को रोचक और अलौकिक बना देती हैं।

इन चमत्कारपूर्ण अलौकिक घटनाओं को परम्पराजीवी और सनातन आस्था से पूर्ण लोक मानस बिना किसी तर्क-वितर्क के सहज स्वीकार कर लेता है।


4. सुख एवं संयोग में कथाओं का अन्तः


भारतीय लोक कथाओं का अन्त दुखान्त न होकर प्रायः सुखान्त होता है। यद्यपि इन कथाओं में दुःख और निराशा के प्रसंग भी आते हैं। किन्तु विविध प्रयासों तपस्या या वरदान से दुःख अन्ततः सुख में परिणत हो जाता है। इन कथाओं का यही उद्देश्य होता है कि ये मानव समाज को दुःख का सामना करने के लिए प्रेरित करे तथा निराशा में आशा का संचार करे।

इसी भावना से युक्त होकर कथावाचक यह कह कर अपनी कथा समाप्त करता है कि "हे रामजी ! जैसे इनके दिन फिरे, वैसे ही सबके भी फिरें। " -


5. लोकमंगल की कामना


लोक-कथाओं का चरम लक्ष्य लोकमंगल की कामना को माना जाता है। भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को स्वीकारती है। इसी भाव से युक्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में बसने वाले ग्रामीण कथाकार अपनी कथाओं में संसार के समस्त लोगों के कल्याण की कामना प्रकट करते हैं। कथा में विविध घटनाओं का ताना-बाना मानवता के कल्याण को ध्यान में रखकर बुना जाता है।

विभिन्न पात्रों के माध्यम से असत् पर सत् की विजय को दर्शाते हुए आदर्श मानव समाज और उसके मंगल की कामना प्रकट की जाती है।


6. कथा की स्वाभाविकता :


लोक-कथाएँ जनसाधारण के अनुरंजन का साधन हैं। इनका कथाकार भी उन्हीं की तरह साधारण होता है। अर्थात् उसमें पाण्डित्य का भाव या ज्ञान का अहंकार नहीं होता वरन् वह परम्पराजीवी होने के कारण परम्परा से प्राप्त कथानक को आत्मसात् कर जनमानस के आनन्द के लिए कथा का वाचन करता है परिणामस्वरूप लोक कथा में सरलता और स्वाभाविकता का सहज समावेश हो जाता है जो उसे विलक्षण सौन्दर्य प्रदान करता है।