लोकोक्ति के लक्षण - Characteristics of proverb

लोकोक्ति के लक्षण - Characteristics of proverb


लोकोक्ति लोकसमाज के वाक् चातुर्य का सशक्त प्रमाण है। इसके माध्यम से हमें लोक के अभिव्यंजना- कौशल, उक्ति- वैचित्र्य और सूत्र- शैली का सहज ही ज्ञान हो जाता है। लोकोक्तियाँ जीवन के अनुभव से उत्पन्न वह ज्ञान है जो जनसाधारण को पथ-दर्शन कराती हैं। इससे स्पष्ट है कि लोकोक्तियों का स्वरूप अत्यन्त विशद् और व्यापक है। इसके लक्षणों को विद्वज्जनों ने अपने-अपने विवेकानुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है-


डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने 'हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास : षोडश भाग' की प्रस्तावना में समास शैली, अनुभूति और निरीक्षण तथा सरलता को लोकोक्ति की प्रमुख विशेषताओं के रूप में स्वीकार किया है।


डॉ. शंकरलाल यादव ने हरियाणा प्रदेश की लोकोक्तियों के सन्दर्भ में निम्नलिखित लक्षणों का उल्लेख किया है - लाघव, सच्चाई एवं अनुभव का सत्य घरेलू भाषा, अनाम रचयिता, लोकप्रियता एवं लोक प्रचलन ।




डॉ. कृष्ण लाल हंस ने तीन लक्षणों पर प्रकाश डाला है संक्षिप्तता, सारगर्भिता, सप्राणता ।


डॉ. दक्षिणामूर्ति ने लोकोक्तियों के निम्नलिखित लक्षणों का विवेचन किया है लघुत्व, लय या गति, - तुक या अनुप्रास, निरीक्षण और अनुभूति की व्यंजना, प्रभावशीलता और लोक-रंजकता, सरल शैली। डॉ. दक्षिणामूर्ति द्वारा प्रस्तुत लक्षणों के आधार पर लोकोक्तियों के लक्षणों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा


सकता है-


1. लघुत्व:


आकारगत लघुता लोकोक्ति का प्रमुख गुण है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने इसके लिए 'समास शैली' शब्द का प्रयोग किया है। लोकोक्ति लघु आकार होने पर भी विशाल अर्थ को समाहित किये हुए होती है। लघुता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोकोक्तियाँ लघु आकार ही होती हैं। वस्तुतः इसका तात्पर्य यह है कि लोकोक्ति में कम-से-कम शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। उसमें कोई अनावश्यक शब्द नहीं होना चाहिए। इस प्रकार व्यर्थ शब्दों की अनुपस्थिति ही उनकी संक्षिप्तता का सूचक है। लोकोक्ति अपने लघुत्व के कारण ही सहज स्मरणीय बन जाती है और लोक कण्ठ पर विराजित होती है। उदाहरणार्थ-


ऊँट के मुँह में जीरा ।


करैगौ सो भरैगौ ।


पहिले पेट पूजा, फिर काम दूजा।


2. लय या गति:


लोकाक्ति में प्रायः लयात्मक अभिव्यक्ति को महत्त्व दिया जाता है। अपनी लय और गति के कारण ही इन्हें काव्य रूप में गठित लघु आकारीय विधा माना जाता है। लय के प्रभाव से इनमें सरसता आती है और यह सहज स्मरणीय बन जाती है। लयात्मकता से युक्त लोकोक्तियों के उदाहरण इस प्रकार हैं-


आलस नींद किसानये खोबे, चोरये खोबै खाँसी । टका ब्याज वैरागीयै खोबे, रॉडयै खोबै हाँसी ॥



प्रेम न जाने जाति कुजाति, भूख न जाने खट्टी भात । नींद न जानै टूटी खाट प्यास न जानै धोबी कौ घाट |


3. तुक या अनुप्रास :


लोकोक्ति में लय या गति का ध्यान रखने के लिए तुक और अनुप्रास का विशेष ध्यान रखा जाता है। इससे लोकोक्ति में मात्र गेयता का गुण ही नहीं आता वरन् उसकी प्रभाव क्षमता की भी वृद्धि होती है। लोकोक्ति में प्रयुक्त तुक और अनुप्रास को प्रस्तुत उदाहरणों में देखा जा सकता है-


साँच कू आँच न


काने ते कानो कहे, कानो जायगी रूठि । धीरे-धीरे पूछिले, तेरी कैसे गई है फूटि ॥


4. निरीक्षण और अनुभूति की अभिव्यंजना :


लोकोक्ति मानव जीवन के गहन निरीक्षण और सूक्ष्म अनुभूति पर आधारित होती है। जनसाधारण ने जीवन के अनुभवों से जो ज्ञान प्राप्त किया उसे सूत्र रूप में अभिव्यक्त किया। ये ज्ञान सूत्र ही लोकोक्ति हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में पूर्व अनुभवों के आधार पर मनुष्य का मार्गदर्शन कर उसे पथ पर अग्रसर होने में सहायक होती है। गहन निरीक्षण और अनुभव पर आधारित लोकोक्तियाँ इस प्रकार हैं-


खेती, पाती, बीनती और घोड़े का संग अपने हाथ संभारिए, चाहे लाख लोग हो संग ॥


रॉड, साँड, सीढ़ी, संन्यासी । इनसे बचे तो सेबै कासी ॥


5. प्रभावशीलता और लोक-रंजकता :


अधिकांश लोकोक्तियाँ लोकरंजकता के साथ प्रभावशीलता से परिपूर्ण होती है। रंजकता से युक्त होने मात्र से वे लोकप्रिय नहीं बनती वरन् उसमें निहित अर्थ प्रभावपूर्ण होने पर ही जनमानस उसे स्वीकार करता है। इन लोकोक्तियों के उदाहरण इस प्रकार हैं-


धोबी का कुत्ता घर को न घाट कौ।



परदेस गए की आस नई, पत्थर ऊपर घास नई।


6. सरल शैली :


लोकोक्ति अत्यन्त सरल भाषा में निबद्ध होती है। इनमें जटिल तथ्यों और गूढ़ रहस्यों को सरलता और सहजता से प्रस्तुत करने की विशेष क्षमता होती है जिससे ये श्रोता के मन पर सहज ही अपना प्रभाव छोड़ती हैं। जनसाधारण की कृति होने के कारण सरलता इसकी अनूठी विशेषता होती है। यह शीघ्र ही बोधगम्य होती है। कतिपय लोकोक्तियाँ उदाहरणस्वरूप द्रष्टव्य हैं-


अरहर की टटिया गुजराती तारौ ।


बारह ब्राह्मण बारह राय, बारह खाती एक ई राय


डॉ. दक्षिणामूर्ति द्वारा विवेचित उक्त लक्षणों के अतिरिक्त भी लोकोक्तियों के निम्नलिखित लक्षण महत्त्वपूर्ण हैं - अनाम रचयिता, सार्वकालिक सत्य का होना, घरेलू भाषा, उपयोगिता, सर्वव्यापकता आदि । समग्रतः कहा जा सकता है कि लोकोक्तियाँ विविध लक्षणों से परिपूर्ण लोक-विरासत हैं जो जन-जन की प्रिय हैं और इसी कारण जन-जीवन में इनका प्रयोग सहज भाव से किया जाता है। इनमें ज्ञान, दर्शन और नीति की त्रिवेणी प्रवाहित होती है अतः इन्हें लोक समाज का ज्ञानकोश कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी।