लोक-कलाओं का वर्गीकरण - classification of folk arts

लोक-कलाओं का वर्गीकरण - classification of folk arts


कला का उद्गम प्रागैतिहासिक काल से स्वीकार किया जाता है जो समय के साथ निरन्तर विकास की ओर अग्रसर होती रही है। मानव समाज के विकास के साथ ही कला के भी विविध रूप विकसित होते गए। भारतीय परम्परा के अनुसार वे समस्त क्रियाएँ जिन्हें करने में कौशल की आवश्यकता होती है, उन्हें कला कहा जाता है। भारतीय विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में कलाओं का वर्णन किया है। इनमें 'कामसूत्र' में वर्णित 64 कलाओं की सूची इस प्रकार है-


01. गीतम्


गाना


02. वाद्यम्


बाजा बजाना


03. नृत्यम्


नाचना


04. आलेख्यम्


05. विशेषकच्छेद्यम्


06. विकाराः


चित्रकारी


भोजन के पत्तों को तिलक के आकार में काटना। पूजन के लिए चावल तथा रंग-बिरंगे फूलों को


सजाना।


07. पुष्पास्तरणम्


08. दशनवसनाङ्गरागः


09. मणिभूमिका कर्म


घर अथवा कमरों को फूलों से सजाना।


दाँतों, कपड़ों और शरीर पर रंग चढ़ाना। फर्श पर मणियों को बिछाना ।


10. शयनकचनम्


11. उदकावाद्यम्


शैया की रचना ।


पानी को इस प्रकार बजाना कि उससे मुरजनाग के बाजे की ध्वनि निकले।


जल क्रीड़ा करते समय कलात्मक ढंग से छींटे मारना।


12. उदकाघात


13. चित्रयोगा


14. माल्यग्रथनविकल्पा


15. शेखर कापीड योजनम्


अनेक औषधियों, तंत्रों तथा मंत्रोंका प्रयोग करना


विभिन्न प्रकार से मालाएँ गूँथना ।


आपीठक तथा शेखरक नाम के सिर के आभूषणों को शरीर के सही अंगों पर धारण करना।


स्वयं को या दूसरे को सुन्दर कपड़े पहनाना ।


शंख तथा हाथीदाँत से विभिन्न आभूषणों को बनाना।


16. नेपथ्यप्रयोगाः


17. कर्णपत्रभंग


18. गन्धयुक्ति:


19. भूषणयोजनम्


20. ऐन्द्रजालायोगः


21. कौचुमार योग


विभिन्न द्रव्यों को मिलाकर सुगन्ध तैयार करना ।


आभूषणों में मणियाँ जड़ना ।


इन्द्रजाल की क्रीड़ाएँ करना ।


कुचुमार तंत्र में बताये गए बाजीकरण प्रयोग,


सौन्दर्य वृद्धि के प्रयोग |


हाथ की सफाई । विभिन्न प्रकार की साग-सब्जियाँ तथा भोजन


22. हस्तलाघवम्


23. विचित्रशाकयूषक्ष्यविकारक्रिया


बनाने की कला ।



24. पानकरसरागासवयोजनम्


25. सूचीवानकर्माणि


26. सूत्रक्रीड़ा


:


जाली बुनना, पिरोना और सीना।


मकानों, पशु-पक्षियों तथा मन्दिरों के चित्र हाथ के


सूत से बनाना ।


वीणा, डमरू तथा अन्य बाजे बजाना ।


पहेलियों को बूझना ।


27. वीणाडमरूवाद्यानि


28. प्रहेलिका


29. प्रतिमाला


30. दुर्वाच योग


अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता का कौशल ।


ऐसे श्लोक कहना जिनके उच्चारण तथा अर्थ दोनों


कठिन हो।


31. पुस्तकवाचनम्


32. नाटकाख्यायिकादर्शनम्


किताब पढ़ने की कला।


नाटकों तथा ऐतिहासिक कथाओं के बारे में


: कविताओं के द्वारा समस्यापूर्ति ।


33. काव्यसमस्यापूरणम् 34. पट्टिकावाननेत्रविकल्पाः


35. तक्षकर्माणि


जानकारी।


बैत और सरकंडे आदि की वस्तुएँ बनाना । सोने-चाँदी के गहनों तथा बर्तनों पर विभिन्न प्रकार


:


की नक्काशी ।


36. तक्षणम्


बढ़ईगीरी ।


37. वास्तुविद्या


38. रूप्यपरीक्षा


39. धातुवाद


: धातुओं को मिलाना तथा उनका शोधन करना ।


40. मणिरागाकरज्ञानम्


41. वृक्षायुर्वेदयोगा


42. मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि


43. सुकसारिकाप्रलापनम्


44. उत्सादने संवाहने केशमर्दने च कौशलम्


45. अक्षरमुष्टिकाकथनम्


घर का निर्माण करना।


मणियों तथा रत्नों की परीक्षा ।


मणियों को रंगना तथा उन्हें खानों से निकालना।


पेड़ों तथा लताओं की चिकित्सा, उन्हें छोटा और


बड़ा बनाने की कला।


भेड़, मुर्गा तथा लावकों को लड़ाना।


तोता-मैना को पढ़ाना।


शरीर तथा सिर की मालिश करने की कला।


सांकेतिक अक्षरों के अर्थ की जानकारी प्राप्त कर 1


लेना । गुप्तभाषा विज्ञान।


विभिन्न देशों की भाषाओं की जानकारी। फूलों से रथ, गाड़ी आदि बनवाना । :


शकुन विचार ।


46. म्लेच्छितविकल्पा


47. देशभाषाविज्ञानम्


48. पुष्प शकटिका


49. निमित्तज्ञानम्


50. यंत्रमातृका


:


स्वचालित यंत्रों को बनाना ।



51. धारणमातृका


52. सम्पाठ्यम्


53. मानसी काव्यक्रिया


54. अधिधानकोश


55. उन्दोज्ञानम्


56. क्रियाकल्प


57. छलितकयोगा 58. वस्त्रगोपनानि


59. द्यूतविशेष:


60. आकर्षक्रीड़ा


61. बालक्रीडनकानि


62. वैनयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्


63. वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्


64. व्यायामिकीना विद्यानां ज्ञानम्


स्मरण शक्ति बढ़ाने की कला।


किसी सुने हुए अथवा पढ़े हुए श्लोक को ज्यों का


त्यों दोहराना ।


विक्षिप्त अक्षरों से श्लोक बनाना ।


शब्द-कोषों की जानकारी।


छन्दों के बारे में जानकारी।


काव्यालंकार की जानकारी ।


बहुरूपियापन।


छोटे कपड़े इस प्रकार पहने कि वह बड़ा दिखाई दे तथा बड़े कपड़े इस प्रकार पहने कि वह छोटा


दिखाई दे।


विभिन्न प्रकार की द्यूत क्रियाओं की कला।


पासा खेलना।


बच्चों के विभिन्न खेलों की जानकारी।


विनयपूर्वक शिष्टाचार सिखाने वाली विद्याएँ तथा आचार-शास्त्र ।


विजय दिलाने वाली विद्याएँ तथा शस्त्र-विद्या । व्यायाम के बारे में जानकारी ।


उपर्युक्त 64 कलाएँ आचार्य वात्स्यायन के कला के प्रति विस्तृत दृष्टिकोण से अवगत कराती हैं। यह वर्णन कला की गणना है जो मनुष्य के प्रत्येक क्रिया-कलाप में कला के दर्शन कराता है।


लोक कला जीवन का अविच्छिन्न अंग है जो मानव के सरल हृदय से उत्पन्न होती है। मनुष्य जब सौन्दर्य के प्रति आकृष्ट होकर भावविभोर होता है तब बिना शास्त्रीय बन्धन के निश्छल भाव से अपने आन्तरिक उल्लास को प्रकट करता है। यह सरलता, सहजता और निश्छलता का भाव ही लोक कला का प्रमुख गुण स्वीकार किया जाता है।


लोक कला का सृजन जिन उद्देश्यों को लक्ष्य कर किया जाता है, उसके आधार पर लोक कला का चार भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है- (i) धर्मानुप्राणित, (ii) उपयोगितावादी, (iii) व्यक्तिवादी तथा (iv) मनोविनोदार्थ ।



1. धर्मानुप्राणित लोक कला


लोक कला धर्मप्रधान होती है। कला के विविध रूपों में हमें लोक प्रचलित धार्मिक मान्यताएँ और विश्वास उपलब्ध होते हैं जो लोक मानस की धर्मनिष्ठा को उद्धृत करते हैं। लोक कला के विविध रूपों में हमें इस धार्मिक भावना के उदाहरण मिलते हैं। जैसे मांडणा, अल्पना में विविध दैवीय प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है।

वहीं पट चित्र और लोक गाथाओं में ईश्वरीय गुणों से युक्त पात्रों की कथा का चित्रांकन उन्हें धार्मिक भावना से परिपूर्ण बना देता है। वर्ष पर्यन्त आयोजित अनेक त्योहारों पर बनायी जाने वाली मूर्तियाँ भी लोक मानस की श्रद्धा को आश्रय प्रदान करती हैं। इस प्रकार अधिकांश लोक-कलाएँ इस वर्ग में सम्मिलित की जा सकती हैं जिनका उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं को उद्धृत करना होता है।


2. उपयोगितावादी लोक कला :


मनुष्य ने आदिकाल से वर्तमान वैज्ञानिक युग तक निरन्तर प्रगति की है। उसने अपनी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं का प्रयोग कर अपने जीवन को सुगम बनाया है।

उसने पत्थर के हथियारों के निर्माण से शुरुआत की और आज अत्याधुनिक उपकरणों के निर्माण के बाद भी निरन्तर नयी सुविधाएँ जुटाने के लिए प्रयासरत है । उसके द्वारा किया गया विविध वस्तुओं का निर्माण भी कला की श्रेणी में ही आता है। वास्तु, वस्त्र, बर्तन, हथियार आदि उपयोगी वस्तुओं के निर्माण की कला को इस वर्ग के अन्तर्गत रखा जा सकता है।


3. मनोविनोदार्थ लोक कला :


कला का एक उद्देश्य जनमानस का मनोरंजन करना भी है। श्रमसाध्य जन-समुदाय के जीवन में मनोविनोद नए उत्साह और स्फूर्ति का संचार करता है। लोक नृत्य,

लोक गीत आदि के माध्यम से लोक मानस इसी आनन्द को प्राप्त करता है। इन कलाओं के माध्यम से किसी अन्य उद्देश्य को लक्षित नहीं किया जाता है वरन् इनका एक मात्र उद्देश्य जनमानस को सहज आनन्द की अनुभूति प्रदान करना होता है।


4. व्यक्तिवादी लोक कला


जो मनुष्य लोक कला को समग्र समाज की कृति माना जाता है। वह सम्पूर्ण समाज की भावनाओं को समाहित कर चलती है किन्तु इनमें व्यक्तिवादी भावनाओं को सर्वथा नकारा नहीं गया है।

अतः कला का वह रूप, की व्यक्तिगत भावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करता है तथा जिससे उसकी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, इस वर्ग के अन्तर्गत स्वीकार किया जा सकता है।


लोक कला विविध उद्देश्यों को लक्ष्य कर मानव जीवन को सौन्दर्य और कल्याण की भावना से परिपूर्ण करती है। यह मनुष्य के जीवन को आनन्द और उल्लास से परिपूर्ण कर जीवन को नया लक्ष्य और दृष्टिकोण प्रदान करती है। अतः कहा जा सकता है कि लोक कला मनुष्य जीवन का अविभाज्य अंग है।