लोक-गीतों का वर्गीकरण: समस्या और समाधान - Classification of Folk Songs: Problem and Solution

लोक-गीतों का वर्गीकरण: समस्या और समाधान - Classification of Folk Songs: Problem and Solution


समस्या


लोक गीत लोक-मानस की स्वतः स्फूर्त निर्झरणी है। चूँकि मानव चिन्तन क्षेत्र अति व्यापक है जिसका कोई ओर-छोर पकड़ में नहीं आ सकता, ऐसे में लोकाभिव्यक्ति भी बहुत विस्तृत हो गई है जो कि लोक-गीतों के रूप में हमें कभी आह्लादित करती है तो कभी रुलाती है, कभी संस्कार हस्तान्तरण की परम्परा निभाती दिखती है।


तो कभी श्रम के क्षेत्र में घुमा ले आती है, कभी इनमें पर्वो का आनन्द मूर्तिमत हो उठता है तो कभी यहाँ बाल- सुलभ चेष्टाओं के दर्शन पाते हैं, तो कहीं ये पेशेवर कलाकारों के जीविकोपार्जन के साधन बने दीख पड़ते हैं।


लोक गीत रूपी इस विशाल राशि को पूर्णतः समेटते हुए तथा इसे कुछ ही वर्गों पर आधारित करते हुए इसका निर्विवादित विभाजन करना, सही मायनों में लोक-साहित्यविदों के समक्ष एक महत्त्वपूर्ण समस्या है।


लोक-गीतों का संकलन या अनुसन्धानपूर्ण अध्ययन करने वाले लगभग सभी विद्वानों ने इस दिशा में कार्य किया है परन्तु वर्गीकरण के आधार क्या रखे जाएँ ! इस पर विद्वानों में मतैक्य नहीं है। लगभग सभी के वर्गीकरण प्रयासों को आलोचनाओं से गुजरना पड़ा है।

कहीं वर्गीकरण की वैज्ञानिकता के अभाव का प्रश्न खड़ा हुआ तो किसी वर्गीकरण में एक प्रकार के गीतों के वर्ग में किसी अन्य प्रकार के वर्ग के गीतों के होने का दोष पाया गया या फिर वर्गीकरण हेतु वर्गों की अत्यधिक संख्या बढ़ाने का आरोप लगा ।


सारांशतः लोक-गीतों का वर्गीकरण अनेक विद्वानों ने किया है परन्तु सर्वसम्मति से वैज्ञानिक अथवा निर्दोष वर्गीकरण किसी को भी नहीं माना गया है। लोक-गीतों के वर्गीकरण की समस्या हेतु डॉ. चिन्तामणि उपाध्याय के विचार इस प्रकार हैं- "लोक-गीतों का वर्ण्य विषय इतना व्यापक है कि उनका वर्गीकरण कठिन हो जाता है।

" डॉ० मोहनलाल बाबुलकर के मतानुसार "लोक-गीतों का विभिन्न विद्वानों द्वारा क्षेत्र-विशेष के अध्ययन के आधार पर ही वर्गीकरण किया गया है। अध्ययन और स्थान विशेष के विश्लेषण के कारण ऐसा कोई भी वर्गीकरण उपलब्ध नहीं होता है जिसे पूर्ण वैज्ञानिक कहा जा सके। "


समाधान


लोक-गीतों के सम्यक वर्गीकरण हेतु एकपक्षीय दृष्टिकोण से ऊपर उठते हुए विविध आयामों, विविध पक्षों को दृष्टिगत रखते हुए, यदि इन्हें वर्गीकृत किया जाए तो इस समस्या का समाधान सम्भव है।

डॉ. रामकुमार शर्मा ने इस समस्या के समाधान हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए हैं-


1. गायक वर्ग जैसे, नारी, पुरुष, बाल, शिशु आदि के आधार पर।


2. गायन का वातावरण जैसे, व्यक्ति, समूह, टोल, व्यवसायी गायक या स्वतः आनन्द हेतु गाने वाले आदि


के आधार पर।


3. गायन पद्धति के आधार पर।


4. लोक-गीतों के रूपात्मक वैविध्य के आधार पर।


इसके अलावा उपयोगिता की दृष्टि से, जातीय दृष्टि से, अवस्था-भेद से, वस्तु-भेद से, रूप-भेद से ( प्रबन्ध एवं मुक्तक), प्रकृति-भेद से (शुद्ध नृत्यगीत, नाट्यगीत आदि) आदि आधारों पर भी लोक-गीतों के वर्गीकरण किए जाने के सुझाव आपने दिए हैं और माना है कि तभी वैज्ञानिक वर्गीकरण हो सकेंगे। वर्गीकरण के समय सभी जनपदों के लोक-गीतों को दृष्टिगत रखना चाहिए जिससे लोक-गीतों का कोई भी प्रकार छूटने से बच जाए।