लोक गाथाओं का श्रेणी विभाजन - Classification of folk tales
लोक गाथाओं का श्रेणी विभाजन - Classification of folk tales
भारत के विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित लोक गाथाओं की व्यापक और सुदीर्घ परम्परा है। लोक-गाथाओं को प्रमुख रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है (1) आकार के आधार पर तथा (2) वर्ण्य- - विषयवस्तु के आधार पर।
आकार के आधार पर विचार करने पर सम्पूर्ण लोक-गाथाओं को पुनः दो वर्गों में बाँट सकते हैं - (i) लघु (ii) दीर्घ-गावाएं।
लघु-गाथाएँ आकार में छोटी होती हैं। इनमें कथा को संक्षेप में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। गोपीचन्द, सरवर नीर, कुसुमादेवी आदि गाथाओं को लघु आकारीय गाथाओं में गिना जाता है।
वहीं दीर्घ-गाथाएँ प्रबन्धात्मक काव्य के समान दीर्घ कलेवर को लिये होती हैं। इनमें मूलकथा के साथ जीवनोपयोगी अन्य प्रसंग जोड़ दिये जाते हैं तथा वस्तु घटनाओं का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार वस्तु घटना के विस्तृत वर्णनों की प्रवृत्ति के कारण कथानक दीर्घ स्वरूप प्राप्त कर लेता है। हीर राँझा, ढोला-मारू, बगड़ावत को दीर्घ गाथाओं की श्रेणी में रखा जाता है।
आकार के आधार पर किया गया वर्गीकरण मोटे तौर पर लघु दीर्घ गाथाओं के मध्य विभाजन रेखा तो अंकित करता है किन्तु इस विभाजन को वैज्ञानिक नहीं माना जा सकता।
अतः वर्ण्य विषय के आधार पर वर्गीकरण करना अधिक उचित प्रतीत होता है। कई भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों ने वर्ण्य विषय के आधार पर लोक गाथाओं का वर्गीकरण किया है। जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं-
डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय द्वारा किया गया वर्गीकरण-
1. प्रेम कथात्मक गाथाएँ :
प्रेमकथात्मक गाथाओं में प्रेम विषम परिस्थितियों में उत्पन्न होता है और विभिन्न संघर्षों के बाद नायक- नायिका को अपने अभीष्ट की प्राप्ति होती है। इनमें प्रणय की गाथाएँ भी है,
जिनमें पति-पत्नी के प्रेम के दोनों पक्षों (संयोग-वियोग ) का रोचक चित्रण होता है। ये गाथाएँ सुखान्त भी है और दुखान्त भी ढोला-मारू, हीर राँझा, भरथरी आदि को इसी वर्ग के अन्तर्गत रखा जा सकता है।
2. वीरकथात्मक गाथाएँ :
वीर कथात्मक गाथाओं में किसी लोकप्रसिद्ध शूरवीर के पराक्रम का वर्णन होता है। इन गाथाओं में वीरता और पराक्रम के साथ ही उदारता, मर्यादा पालन, नारी के सम्मान की रक्षा, धर्म की प्रतिष्ठा आदि पुरुषोचित गुणों का प्रभावी अंकन होता है। इस श्रेणी की गाथाओं में 'आल्हा' का स्थान सर्वोपरि है।
3. रोमांच कथात्मक गाथाएँ:
रोमांच कथात्मक गाथाओं में अलौकिकता का समावेश होता है। ये गाथाएँ प्रायः नायिका प्रधान होती हैं। इनमें नायिका का जीवन रोमांचकारी घटनाओं से परिपूर्ण चित्रित किया जाता है। 'सोरठी' की गाथा इसी वर्ग में आती है।
प्रो. कीट्रीज का वर्गीकरण-
1. चारण गाथाएँ :
वे गाथाएँ जो चारणों द्वारा रची और गायी जाती हैं, उन्हें चारण गाथाएँ कहा जाता है।
2. परम्परागत गाथाएँ :
चिरकाल से चली आ रही वे गाथाएँ, जिनका प्रचार और प्रभाव आज भी विद्यमान है, उन्हें परम्परागत गाथाओं की श्रेणी में रखा जाता है।
प्रो. गूमर का वर्गीकरण-
1. प्राचीनतम गाथाएँ :
प्राचीनतम गाथाएँ प्रायः समस्यामूलक होती हैं जो धरती आकाश आदि प्राकृतिक तत्त्वों से सम्बद्ध प्रश्नोत्तरी शैली में रचित होती हैं।
2. कौटुम्बिक गाथाएँ:
कौटुम्बिक गाथाएँ परिवार से सम्बन्धित होती हैं जिनमें परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों और
व्यवहार का अंकन होता है।
3. अलौकिक गाथाएँ:
अलौकिक गाथाओं में जादू, चमत्कार, परी प्रसंग, भूत-प्रेत, अन्धविश्वास आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका
होती है।
4. पौराणिक गाथाएँ
पौराणिक लोक गाथाएँ प्रायः पुराणों, रामायण, महाभारत में वर्णित कथाओं से प्रेरित होती हैं।
5. सीमान्त गाथाएँ :
सीमान्त गाथाएँ प्रायः स्थानीय वीरों की महिमा से मण्डित होती है। जगदेव की वीरगाथा, कुंवरसिंह का पँवारा इसी प्रकार की लोक-गाथाएँ हैं। इन्हें ऐतिहासिक लोक गाथा भी कहा जा सकता है।
6. आरण्यक गाथाएँ:
आरण्यक - गाथा के अन्तर्गत लोक हितैषी और कल्याणकारी डाकुओं, लुटेरों की गाथाएँ रखी जा सकती हैं।
यहाँ विश्वप्रसिद्ध 'रॉबिनहुड' का उल्लेख करना भी उचित प्रतीत होता है जिसमें रॉबिनहुड को एक वीर, साहसी, दीन-दुखियों के सहायक के रूप में चित्रित किया गया है। भारत में इस प्रकार की अनेक गाथाएँ प्रचलित हैं जिनमें ब्रज की 'राधाचरन को ढोला' राजस्थान की 'जोरजी चांपावत' विशेष रूप से उल्लेख्य हैं। इनमें नायक की वीरता, साहस, उदारता का वर्णन होता है अतः इन्हें साहसिक लोक गाथाएँ भी कहा जा सकता है।
प्रो० • गूमर ने अंग्रेजी लोक-गाथाओं के आधार पर उपर्युक्त वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। यह इतना विस्तृत और सांगोपांग है कि इसमें भारतीयलोक गाथाओं के सभी प्रकार समाहित किये जा सकते हैं।
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