प्रियप्रवास' का सामयिक सन्दर्भ - Current context of 'Priyapravas'

'प्रियप्रवास' का सामयिक सन्दर्भ - Current context of 'Priyapravas'


'प्रियप्रवास' की रचना सन् 1914 ई. में हुई। यह खड़ीबोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। यह कवि की प्रबन्ध-पटुता एवं काव्य-प्रतिभा के उत्कर्ष का परिचायक है। 'प्रियप्रवास' मूलतः वियोगप्रधान काव्य-ग्रन्थ है । वियोग वात्सल्य का चित्रण भी इसमें प्रमुखता से हुआ है। यशोदा के विलाप में वेदना एवं पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। साथ ही अवसरानुकूल संयोग शृंगार, रौद्र, अद्भुत एवं भयानक रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। 'प्रियप्रवास' महाकाव्य महान् उद्देश्य से अभिप्रेरित है। कवि की रचनात्मक प्रवृत्ति मूल्यहीनता की कोरी चिन्ता करने की नहीं, अपितु मूल्यों को प्रतिष्ठित करने की है जहाँ लोकसेवा एवं लोकोपकार ही जीवन का मूल उद्देश्य है। राधा और कृष्ण के चरित्र यही प्रेरणा देते हैं।


'प्रियप्रवास' की कथावस्तु


'प्रियप्रवास' की कथावस्तु कृष्ण के मथुरागमन, राधा एवं गोपियों की विरह व्यथा, पवन दूती प्रसंग, यशोदा की व्यथा, उद्धव-गोपी संवाद, राधा- उद्धव संवाद आदिमार्मिक प्रसंगों पर आधारित है। कृष्ण के जीवन के प्रमुख प्रसंगों यथा पूतना वध, बकासुर वध, शकटासुर वध, कालीनाग वध, कंस वध, जरासंध वध आदि का उल्लेख यथास्थान किया गया है। राधा-कृष्ण के परम्परागत चरित्र को युगीन साँचे में ढालकर मानवीय धरातल पर प्रस्तुत किया गया है। 'प्रियप्रवास' की राधा विरहिणी मात्र नहीं है अपितु वह लोकसेविका एवं समाजसेविका भी है । इसी प्रकार कृष्ण भी जननायक अधिक प्रतीत होते हैं। जन्मभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा, दुराचारी के प्रति विद्रोह अन्याय- दमन,

स्वदेश-प्रेम एवं लोकोपकार के भाव भी इस कथा में पिरोये गए हैं। भारतीय संस्कृति का उज्ज्वल रूप 'प्रियप्रवास' महाकाव्य में सफलतापूर्वक चित्रित हुआ है। आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेम को प्रस्तुत करते हुए भी कवि का ध्यान लोकपक्ष एवं लोक-कल्याण पर केन्द्रित रहा है।


'प्रियप्रवास' की कथावस्तु सत्रह सर्गों में निबद्ध है। प्रथम सर्ग में संध्या-वर्णन है। द्वितीय सर्ग में कृष्ण के प्रति आसक्त गोकुलवासियों की विरह व्यथा का चित्रण है।

तृतीय सर्ग में नन्द की व्याकुलता एवं यशोदा द्वारा कृष्ण की कुशलता के लिए मनायी गई मनौतियों का वर्णन है। चौथे सर्ग में राधा के सौन्दर्य का चित्रण किया गया है। पाँचवें एवं छठे सर्ग में सम्पूर्ण गोकुल के विरह का निरूपण हुआ है। इसी सर्ग में राधा एवं माता यशोदा की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। सातवें सर्ग में नन्द के मथुरा लौट आने पर पुत्र-वियोग से व्यथित माता यशोदा के पुत्र विषयक प्रश्नों का हृदयस्पर्शी वर्णन उल्लेखनीय है। आठवें सर्ग में गोकुलवासियों को अतीत में कृष्ण के साथ बिताये दिनों की स्मृति करते दिखाया गया है। नौवें सर्ग में कृष्ण को गोकुल के स्मरण में व्यथित होते दिखाया गया है। दसवें व ग्यारहवें सर्ग में उद्धव प्रसंग है।

उद्धव गोकुलवासियों को सांत्वना और उपदेश देते हैं। ग्यारहवें सर्ग में कृष्ण के लोकोपकारी स्वरूप का चित्रण हुआ है। बारहवें सर्ग में कृष्ण को जननायक के रूप में चित्रित किया गया है। चौदहवें सर्ग में गोपी- उद्धव संवाद है। पन्द्रहवें सर्ग में कृष्ण- विरह में व्यथित गोपियों की दीन-हीन दशा का मार्मिक वर्णन है। सोलहवें सर्ग में राधा-उद्धव संवाद है। सत्रहवें सर्ग में कवि ने प्रतिपादित किया है कि विश्वप्रेम की भावना व्यक्तिगत प्रेम की कामना से अधिक महत्त्वपूर्ण है।


आधुनिक सन्दर्भ एवं मानवीय चेतना


'प्रियप्रवास' के प्रमुख पात्र राधा एवं कृष्ण हैं। उनके परम्परागत चरित्रों को सुरक्षित रखते हुए हरिऔध ने युगानुकूल परिवर्तन किया है।

यहाँ कृष्ण को ईश्वर न मानकर एक महापुरुष, लोकसेवक व जननायक स्वीकार किया गया है। हरिऔध के कृष्ण मानवता के अनन्य पुजारी, अन्याय- दमन में सदैव तत्पर तथा जन्मभूमि के अनुराग से युक्त सच्चे देशभक्त हैं। चारित्रिक सद्गुण, सदाचरण एवं उदात्त मानवीय भावनाएँ उन्हें सामान्य मानव से बढ़कर 'महामानव' के रूप में प्रतिष्ठापित करती हैं।


'प्रियप्रवास' की राधा भी अपने परम्परागत स्वरूप में वर्णित न होकर नवयुग के अनुरूप सद्गुणों से सम्पन्न नायिका के रूप में प्रस्तुत हुई हैं। वे आँसू बहाने वाली विरहिणी नहीं हैं,

प्रत्युत कर्त्तव्यपरायण, परदुखकातर लोकसेविका हैं। नारी सुलभ गुणों से परिपूर्ण राधा आजन्म कौमार्यव्रत का पालन करते हुए लोकसेवा एवं लोकोपकार के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है। कृष्ण की अनन्य प्रेमिका राधा का जीवन कृष्णमय है। ब्रजभूमि की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर वह ब्रज की आराध्य देवी बन जाती है।


द्विवेदीयुगीन प्रकृति-चित्रण में पर्याप्त स्थूलता है। वहाँ कल्पना वैभव एवं सौरस्य का अभाव है किन्तु यथार्थ की ताज़गी है। प्रकृति का आलम्बन रूप में चित्रण अधिक हुआ है।

'प्रियप्रवास' में प्राकृतिक सौन्दर्य की अनेकविध छटा नाना प्रसंगों में दिखाई देती है। कवि ने वातावरण निर्माण के लिए भी प्रकृति-चित्रण किया हैं। 'प्रियप्रवास' का तो आरम्भ ही प्रकृति-वर्णन से हुआ है-


दिवस का अवसान समीप था। गगन था कुछ लोहित हो चला । तरु शिखा पर थी अब राजती। कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा ॥


उद्दीपन रूप में प्रकृति का चित्रण देखिए-


आके तेरे निकट कुछ भी मोद पाती न मैं हूँ । तेरी तीखी महक मुझको कष्टिता है बनाती ॥


अपने युग का सजीव चित्रांकन करने में हरिऔध सफल हुए हैं। युगीन मान्यताओं के कारण ही राधा- कृष्ण के परम्परागत स्वरूप में परिवर्तन किये गए हैं। लोकसेवा, परदुखकातरता, विश्वबन्धुत्व, मानवता तथा धार्मिक सहिष्णुता के जो भाव 'प्रियप्रवास' में उजागर किये गए हैं, वे युगीन मान्यताओं के अनुरूप हैं। उदाहरणार्थ उद्भव के मुख से यह सुनकर कि कृष्ण सर्वजनहिताय लोकमंगलकारी कार्यों में संलग्न और लीन हैं, राधा अपनी विरह-वेदना विस्मृत कर देती है। विश्वप्रेम की भावना के वशीभूत होकर वह स्वयं को जन-जन की सेवार्थ समर्पित कर देती है।

अपने परम्परागत स्वरूप से भिन्न हरिऔध की राधा सात्त्विकता, मानवता, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं विश्वबन्धुत्व की साकार प्रतिमूर्ति है। राधा की विरह वेदना का चित्रण 'प्रियप्रवास' के छठे सर्ग में है। वह पवन को अपना दूत बनाकर उसे प्रियतम कृष्ण के पास मथुरा भेजती है और उससे अनुरोध करती है कि तू मेरे प्रियतम की चरण धूल ला दे। मैं उसी को लगाकर अपने हृदय को शान्त कर लूंगी -


पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी ।

तो तू मेरी विनय इतनी मान ले औ चली जा ॥ छू के प्यारे कमल पग को प्यार के साथ आ जा। जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को गले लगा के |


परदुःखकातर राधा पवन को कहती है कि मार्ग में मिलने वाले रोगी, श्रान्त पथिक और क्लान्त कृषक बाला को अपने शीतल स्पर्श से सुख पहुँचाना और उनकी थकान दूर करना तेरा प्राथमिक कर्त्तव्य है।


सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ


'प्रियप्रवास' में सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलता व विरूपता के प्रति सहवेदना और उनके कारणों के प्रति क्षुब्ध प्रश्नात्मकता के साथ ही व्यक्ति के अस्तित्वबोध और उसकी आन्तरिक पीड़ा की मुखर अभिव्यक्ति हुई है।

यह अभिव्यक्ति इतनी संतुलित और सार्थक है कि व्यक्तिवादी कवियों के अहंकार तथा मंचीय कवियों के 'दर्द के दायरे' इसके उदात्त स्तर को छू भी नहीं सकते। 'प्रियप्रवास' की राधा नन्द-यशोदा को सांत्वना देने उनके घर जाती हैं, उद्विग्न ग्वाल-बालों एवं गोपियों को धीरज बँधाती है और दीन-दुखियों एवं अनाथों की सेवा करती हुई अन्ततः लोकसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लेती है। राधा और कृष्ण की सामाजिक-सांस्कृतिक संलग्नता और मानवीयता उनके चरित्रों को यथार्थ स्वरूप प्रदान करती है।


विश्वप्रेम


व्यष्टि और समष्टि की अपरिहार्य एकरूपता एक महत्त्वपूर्ण घटक है। व्यक्तिगत जीवन की पद्धत्ति जब व्यापक संवेदना के साथ संधारित हो जाती हैतब अनुभव की सामाजिक परम्परा वैश्विक व बहुआयामी सन्दर्भों के साथ जन्म लेने लगती है।

व्यक्तिगत संवेदना का सामाजिक संवेदना के साथ रूपान्तरण संघर्ष की प्रक्रिया से लगातार जूझता है और कवि की दृष्टि को शनैः शनैः विकसित करता है। किन्तु यदि उसकी वैयक्तिक संवेदना सामाजिक संवेदना में रूपान्तरित नहीं हो पाती तो धीरे-धीरे वह जड़ होने की प्रक्रिया में आ जाती है। व्यक्तिवादिता और आत्मनिर्वासन की जड़ें क्रमशः इतनी गहरी होती जाती हैं कि सम्पूर्ण मानसिकता ही संज्ञाशून्य और विद्रूप हो जाती है।


हरिऔध एक समर्थ व संवेदनशील रचनाकार हैं। वे मानवीय संसार के रचनाकार हैं। मनुष्येतर संसार से उनका उतना ही लगाव है जितना मानवीय संसार को समझने और अभिव्यक्त करने में सहायक हो सके।

वे मनुष्य के अन्तर्मन में झाँककर देख लेते हैं और उसकी अभिप्रेरणा बन जाते हैं। कवि की चिन्तन की गहराई उनकी कृतियों में स्पष्टतः दिखाई देती है। 'प्रियप्रवास' की रचना-प्रक्रिया में राधा-कृष्ण का चरित्रांकन हरिऔध के सनातन संस्कारों से युक्त मानवीय चिन्तन का परिणाम है। डॉ. मुकुन्ददेव शर्मा के शब्दों में अपने वर्तमान से जूझना किसी रचना की अनिवार्यता है । पर यह रचना कार्य किसी सरलीकरण से नहीं किया जा सकता ।

'हरिऔधजी' का 'प्रियप्रवास' राधा-कृष्ण के माध्यम से नयी संभावनाओं को उजागर करने वाला अद्भुत ग्रन्थ है । इसमें कवि की चेष्टा है कि राधा-कृष्ण के परम्परागत चरित्र में छेड़छाड़ किये बिना ही उनके व्यक्तित्व को नये आयाम दिए जाएँ। इसमें अनुभूति का ऐसा फैलाव या बिखराव नहीं दिखता है कि रचना की प्रभावान्विति ही समाप्त हो जाए। सत्रहवें सर्ग में 'विश्व प्रेम' की मार्मिक अभिव्यंजना करते हुए कवि अपने रचनात्मक प्रतिपाद्य को बखूबी स्मरण रखता है। परिणामस्वरूप उसकी रचनात्मक अनुभूति सर्ग के पूरा होते ही समापन ग्रहण कर लेती है और किसी प्रकार का अनावश्यक विस्तार न देकर हरिऔधजी पूरे कथानक को बोझिल होने से सफलतापूर्वक बचा लेते हैं।


आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेम की अभिव्यंजना


'प्रियप्रवास' में राधा-कृष्ण की आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेमाभिव्यंजना में कोई फिसलन नहीं है, अपितु यहाँ परम्परागत चिन्तन को समृद्ध करते हुए उस पर जमी काई को फाड़ डालने की शक्ति है। दूसरे के दुःख को अपना अवसाद मानकर उसे जागरूक, धैर्यशील व संघर्षशील बनाने की प्रवृत्ति हरिऔध को बेचैन बनाए रखती है । जीवन-जगत् की गाँठों को खोलने के लिए ही उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम की नूतन व्याख्या की है । आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेम को प्रस्तुत करते हुए भी रचनाकार का ध्यान लोकपक्ष एवं विश्वकल्याण पर केन्द्रित रहा है।

'प्रियप्रवास' की राधा के लिए अपनी आँखों की नमी का कोई खास महत्त्व नहीं है। दूसरों की आँखों की नमी उसे व्यथित करती है। 'प्रियप्रवास' की राधा में एक व्यग्र और सन्नद्ध चरित्र दिखाई देता है जो मनुष्य की समानता, विश्वबन्धुत्व और विश्व-कल्याण के सिंहद्वार को खोलने के लिए अकेले ही आगे नहीं बढ़ता, अपितु सामान्य जन को भी अपने साथ आने के लिए आमन्त्रित करता है। राधा की कामना यही है कि कृष्ण मथुरा से भले ही न लौटें पर लोकहित में सदैव संलग्न रहें-


प्यारे जीवें जग हित करें, गेह चाहे न आवें।


'प्रियप्रवास' की राधा जायसी की नागमती, सूर की राधा, गुप्त की यशोधरा एवं ऊर्मिला आदि अन्य विरहिणियों से भिन्न है । यद्यपि यशोधरा की व्यथा कुछ-कुछ राधा की व्यथा के समान अवश्य है तथापि वहाँ जीवन का ध्येय लोकसेवा और परोपकार नहीं है,

जबकि 'प्रियप्रवास' की राधा परदुखकातर है जो लोकसेवा और परोपकार को अपने जीवन का मूल ध्येय बनाकर कृष्ण के प्रति अपने आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेम को विश्वप्रेम में रूपान्तरित कर देती है। द्विवेदीयुगीन आदर्शवादी साँचे में ढली हुई राधा अनुपम व्यक्तित्व वाली ऐसी


नारी है जो अपने त्याग, सेवा और परोपकार जैसे उदात्त गुणों के कारण जन-जन की प्रिय बन जाती है।


लोकहित की कामना एवं विश्व प्रेम की अभिव्यक्ति


हरिऔध द्विवेदीयुग के प्रतिनिधि कवि हैं। द्विवेदीयुग में राष्ट्रीयता,

समाज-सुधार, नवजागरण, स्वातन्त्र्य- चेतना, मानवतावाद, सामाजिक समता एवं गाँधीवाद का बोलबाला था। हरिऔध की रचनाओं में उपर्युक्त समस्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। अपने काव्य में जीवन-मूल्यों का समावेश करते हुए हरिऔध ने युगबोध एवं समसामयिकता की प्रवृत्ति का परिचय दिया है। 'प्रियप्रवास' के राधा-कृष्ण के चरित्रांकन में प्रेम का आदर्श एवं 'उसके उदात्त स्वरूप को देखा जा सकता है। राधा सम्पूर्ण विश्व में कृष्ण की कान्ति का दर्शन कर विश्वप्रेमिका और विश्वसेविका बन जाती है। 'प्रियप्रवास' के सत्रहवें सर्ग में लोकहित की कामना करते हुए कवि हरिऔध विश्वप्रेम की अभिव्यंजना करते हैं। राधा के माध्यम से वे सिद्ध करते हैं कि विश्वप्रेम व्यक्तिगत प्रेम से अधिक श्रेयस्कर है।


काव्य समाज-दर्शन और सामाजिक प्रेरणा का शास्त्र है। समसामयिक समाजदृष्टि को परिभाषित, व्याख्यायित और पुरातन मूल्यों को प्रतिष्ठित करने में काव्य की प्रमुख भूमिका है। 'प्रियप्रवास' के कथानक में समसामयिकता की अनुभूति होती है। सामाजिक विवेक का जागरण, विश्व-कल्याण, सार्वजनिक व सार्वभौमिक हित-चिन्तन तथा अमानवीय शक्तियों से संघर्ष का भाव विकसित करना कवि का अभीष्ट है। लोककल्याण के निमित्त वे राधा-कृष्ण के सहज व संवेदनशील चरित्र का विकास करते हैं। सामाजिक व मानवीय यथार्थ का आग्रह, अन्याय का प्रतिकार, पक्षपात का विरोध और विसंगतियों के बखान 'प्रियप्रवास' के कथानक को सामयिक बनाता है और हरिऔध की जागरूकता को प्रमाणित करता है। लोकहित एवं विश्वप्रेम की कामना अभिव्यक्त करती राधा की मनःस्थिति द्रष्टव्य है-


हो के राधा विनत कहतीं में नहीं रो रही हूँ । आता मेरे दृग-युगल में नीर आनन्द का है। जो होता है पुलक कर के आप की चारु सेवा । हो जाता है प्रकटित वही वारि द्वारा दृगों में ॥


होती मारे मन यदि कहीं गोप की पंक्ति बैठी। किम्वा होता विकल उनको गोप कोई दिखाता। तो काय्यों में सविधि उनको यत्नतः वे लगातीं । औ ए बातें कथन करतीं भूरि गंभीरता से ॥


वर्तमान समय में नष्ट होते सामाजिक मूल्य व बढ़ते भौतिकवाद के प्रभावस्वरूप मानवीयता और नैतिकता लुप्त होती जा रही है।

निसर्ग चित्रण, ग्राम्य-जीवन की सहजता, मूल्य चेतना और मनःस्थितियों के रेखांकन के माध्यम से कवि ने नैतिक जीवन-मूल्यों का महत्त्व प्रतिपादित किया है। खण्डित व्यक्तित्व की दुविधाजन्य मानसिकता को राधा के चरित्र में वे रचनात्मक व लयात्मक रेखाओं में बाँधते हैं।


'प्रियप्रवास' हरिऔध की चिन्तनशील प्रवृत्ति एवं सामाजिक प्रतिबद्धता को उजागर करता है। वस्तुतः मनुष्यता और सभ्यता की आधारभूमि व्यक्ति की स्वतन्त्र चेतना नहीं है,

अपितु समाज एवं विश्व कल्याण की चेतना का सन्दर्भित होना ही सभ्यता का आधार और मानवीयता का सेतु है। राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से हरिऔध की मंगल कामना है कि-


देखो प्यारी भगिनि भव को प्यार की दृष्टियों से। जो थोड़ी भी हृदय-तल में शान्ति की कामना है ॥


उद्योगी हो परम रुचि से कीजिये कार्य्यं ऐसे । जो प्यारे हैं परम प्रिय के विश्व के प्रेमिकों के ॥