भारत में लोक-साहित्य के अध्ययन का विकास - Development of Folklore Studies in India
भारत में लोक-साहित्य के अध्ययन का विकास - Development of Folklore Studies in India
भारत में अंग्रेजों का शासन सर्वाधिक समय तक रहा। यद्यपि वे प्रशासनिक कार्यवश यहाँ आए थे लेकिन उनमें से कतिपय अंग्रेजों की अभिरुचि भारत की सांस्कृतिक विरासत की ओर आकर्षित हो गई। इस दिशा में अंग्रेज अधिकारियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ईसाई मिशनरियों ने भी अपने अभियान को सफल बनाने के लिए यहाँ की संस्कृति और साहित्य का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। वे भारत की ग्रामीण संस्कृति मेलों, त्योहारों, विवाह आदि रीति-रिवाजों की ओर आकर्षित हुए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने अध्ययन की जानकारी को क्षमतानुसार लिपिबद्ध भी किया।
इन्हीं अध्येताओं के समानान्तर भारतीय विद्वानों ने भी इस दिशा में अपने प्रयत्न प्रारम्भ किए। यह निर्विवाद है कि भारत में लोक-साहित्य में अनुसन्धान, संकलन एवं अध्ययन का कार्य सर्वप्रथम विदेशी अध्ययनकर्त्ताओं द्वारा ही प्रारम्भ हुआ। पाश्चात्य विद्वानों द्वारा सम्पन्न कार्य का प्रारम्भ यद्यपि कर्नल टॉड द्वारा मान्य है तथापि सन् 1784 में ही इसकी आधारशिला 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' के द्वारा रखी जा चुकी थी।
राजस्थान
कर्नल जेम्स टॉड राजस्थान में अनेक रियासतों में रेजिमेंट के पदों पर आसीन रहे। राजपूतों की वीरता और उनके अदम्य साहस और राजस्थान की शौर्य गाथाओं से वे बहुत प्रभावित हुए।
राजस्थान की लोक-संस्कृति को निकटता से देखने का अवसर उन्हें मिला। कर्नल टॉड पहले ऐसे अंग्रेज अधिकारी बने जिनके द्वारा भारतवर्ष में साहित्य अध्ययन कार्य प्रारम्भ हुआ। कर्नल टॉड ने इससे सन्दर्भित एक ग्रन्थ 'एनल्स ऐंड ऐटिक्विटीज ऑफ राजस्थान' (ऑक्सफोर्ड संस्करण) लिखा। इसमें राजस्थान की वीरगाथाएँ लोगों का रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान और धार्मिक अनुष्ठान एवं आचरणों पर बृहत् रूप से प्रकाश डाला गया। इतालवी विद्वान् एल. पी. सीटोरी ने राजस्थान की डिंगल भाषा और लोक-साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने अपने अध्ययन को लेख रूप में 'इंडियन एटिक्वेरी' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया। राजस्थान में प्रचलित चारण गीतों के संकलन का श्रेय टैसीटोरी को ही प्राप्त है।
पंजाब
अंग्रेज सिविलियनों एवं ईसाई मिशनरियों ने उन्नीसवीं शताब्दी के छठे दशक में पंजाब की लोक-संस्कृति एवं लोक वार्ताओं के प्रति अपनी रुचि दिखाई। श्री स्विनर्टन ने पंजाब की वीरतापूर्ण एवं शृंगारी कथाओं का संग्रह 'रोमांटिक टेल्स ऑफ़ द पंजाब' नामक ग्रन्थ में किया। इन्होंने ही पंजाब में राजा रसालू की लोकप्रिय गाथा का प्रथम संकलन किया। सन् 1854 में 'रॉयल एशियाटिक सोसाइटी' का मुख्य पत्र प्रकाशित हुआ जिसमें पंजाब सम्बन्धी लोक गाथाओं पर लिखा लेख जे. एबल प्रकाशित हुआ। इनके अलावा सी. एफ. ओसबर्न ने पंजाबी लोक-गीतों तथा लोकोक्तियों का संग्रह 'पंजाबी लिरिक्स एंड प्रोवर्क्स' नामक ग्रन्थ में किया। पंजाब की लोक कथाओं का संग्रह अपनी पुस्तक 'द टेल्स ऑफ़ पंजाब' में एफ. ए. स्टील ने किया। आर. सी. टॅपुल्स ने सन् 1884 में 'लीजेंट्स ऑफ़ पंजाब नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया।
मध्यप्रदेश
ईसाई पादरी रेवरेंड हिल्पस ने मध्यप्रदेश के आदिवासियों के बीच रहकर उनसे जुड़ी लोक वार्ताओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। सन् 1866 में सर रिचर्ड टेंपुल्स द्वारा वनों में निवसित जातियों की लोक वार्ता और लोक-साहित्य का अध्ययन प्रकाशित हुआ।
बंगाल
डाल्टन ने बंगाल में विभिन्न जातियों से सम्बन्धित तरह-तरह की सामग्री एकत्रित की। इस समूची सामग्री का प्रकाशन 'डिस्क्रीपटीव एंथोलोजी ऑफ़ बंगाल नामक ग्रन्थ में हुआ। अन्य अंग्रेज विद्वानों में जी. एन. डेमेंट ने 'बंगाली हिन्दी लोर फ्रॉम दिनाजपुर में वहाँ की लोक कथाओं का संकलन किया तथा 'इंडियन एन्तिक्वेटी' में उनके लोक-साहित्य सम्बन्धी अनेक लेख भी प्रकाशित हुए।
इसी पत्रिका में एफ. टी. काक का 'द राजमहल हिल्समैन सौंग्स' शीर्षक से सन् 1876 में निबन्ध प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष बंगाली लोक गाथाओं का संग्रह भी प्रकाशित हुआ जिसके संग्रहकर्ता जी. एच. डेमेंट थे।
कश्मीर
सर ओरल स्टाइन ने कश्मीरी लोक कथाओं का संकलन किया।
दक्षिण भारत
'इंडियन एंटीक्वेटीं पत्रिका में आर. सी. कैंपबेल का निबन्ध 'तमिल पॉपुलर पोईटी' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। अंग्रेज महिला मिस फायर ने दक्षिणी लोक कथाओं का संग्रह एवं अध्ययन 'ओल्ड दकिन डेज' में प्रकाशित किया। चार्ल्स इ. ग्रोवर ने दक्षिण भारत के लोक-गीतों पर 'हिन्दी सोंग्स ऑफ़ सदर्न इंडिया' नामक पुस्तक का सम्पादन किया। इस पुस्तक में तमिल, कन्नड़, कुर्ग, तेलगु, मलयालम लोक-गीतों का संग्रह है।
आर. सी. टेंपुल्स के सहयोग से श्रीमती स्टील ने 'वाइड अवेक स्टोरीज' नामक पुस्तक में उस समय तक की उपलब्ध सभी कथाओं का एक अध्ययन प्रस्तुत किया। जे. रॉबिन्स ने 'टेल्स एंड पोयम्स ऑफ़ साउथ इंडिया' ग्रन्थ में दक्षिण भारत के लोक-गीतों एवं लोक कथाओं पर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया जिसमें विशेष टिप्पणियों के साथ अनुवाद भी दिया गया है। सन् 1906 में थर्सटन की 'एक्नोग्राफिक नोट्स इन सदर्न इंडिया' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें दक्षिण के लोक-साहित्य का विशद् वर्णन है। थर्स्टन ने ही सन् 1912 में 'आमिन्स एंड सुपरस्टिशन ऑफ़ सदर्न इंडिया' पुस्तक प्रकाशित की। इसमें जादू-टोना, अन्धविश्वासों तथा रूढ़ियों का विस्तृत विवेचन किया गया है।
भोजपुरी
सर ग्रियर्सन द्वारा सन् 1886 में 'सम भोजपुरी हिन्दी सोंग्स' नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। इसमें वहाँ की प्रचलित लोक-विधाएँ, बिरहा, जंतसार और सोहर नामक लोक-गीतों का संकलन है। मूल पाठ के साथ ही इसमें अंग्रेजी अनुवाद भी है। जी. एच. डेमेंट ने अपनी पत्रिका 'इंडियन एंटिक्वेरी' में लोक-साहित्य सम्बन्धी सन् 1871 में कई लेख लिखे। सन् 1905 में उराँव लोगों के 200 लोक-गीतों का संग्रह 'कुरुख हिन्दी लोर इन ओरिजिनल' नाम से ऑफ़ हान द्वारा प्रकाशित हुआ। सन् 1907 में डब्लू. टी. डेम्स की 'पॉपुलर पोएट्री ऑफ़ विलोचीस' पुस्तक प्रकाश में आयी जिसमें प्रेमगीत, वीरगाथा और पहेलियों का संग्रह किया गया है।
विलियम क्रुक ने सन् 1891 में 'कोस्ट्स एंड ट्राइब्स ऑफ़ नार्थ वेस्ट प्रोक्सेिज' तथा 'पॉपुलर रिलिजन एंड हिन्दीलोर ऑफ़ नॉरदर्रन इंडिया' जैसी पुस्तकें लिखीं। सन् 1920 तक भारतीय लोक-साहित्य सम्बन्धी कार्य विदेशी विद्वानों द्वारा किया गया।
भारतीय विद्वानों में सन् 1882 में तारादत्त की पुस्तक 'एशियाटिक बैलेड्स एंड लीजेंड ऑफ़ हिंदुस्तान' प्रकाशित हुई। इसमें भारतीय लोक वार्ता के संग्रह हैं। सन् 1883 में लाल बिहारी द्वारा संगृहीत 'हिन्दी टेल्स ऑफ़ बंगाल' बंगाली लोक कथाओं का प्रकाशन हुआ।
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श्री डे ने 'बंगाल पीजेंट लाइफ' लिखा जो वहाँ के किसानों पर महत्त्वपूर्ण रचना है। सन् 1885 में महेश शास्त्री का 'हिन्दी लोर इन सदर्न इंडिया' ग्रन्थ प्रकाशित हुआ ।
भारत में 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा साहित्य के अध्ययन का श्रीगणेश हो चुका था । कुछ समय बाद ईसाई पादरियों ने यह कार्य किया । अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । इसमें उनकी गुणग्राह्यता एवं दूरदर्शिता दोनों विद्यमान थी।
सर ओरेल ने कश्मीरी लोक कथाओं का संकलन किया।
डाल्टन, जी. एच. डेमेंट ने बंगाल की विभिन्न जातियों से सम्बन्धित लोक वार्ता का संग्रह किया। एफ. टी. काक ने पहाड़ी लोक-गीतों का संकलन किया। मिस फायर, चार्ल्स ई. ग्रोवर तथा आर. सी. टेंपुल्स ने दक्षिण भारत में प्रचलित लोक कथाओं, लोक गाथाओं एवं लोक-गीतों का अध्ययन किया।
भारतीय लोक-साहित्य से सम्बन्धित कार्य करने वालों में जार्ज ग्रियर्सन सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं । 'लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' इनकी अमर रचना है। वे भाषाविद थे। लोक-गीतों के महत्त्व को समझते हुए उन्होंने इस दिशा में प्रेरणाप्रद कार्य किया।
वे रॉयल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका से जुड़े हुए थे। इन्होंने बिहारी और भोजपुरी लोक-गीतों का संकलन अंग्रेजी में अनुवाद और विशेष टीका-टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किया। गोपीचंद की ऐतिहासिकता सिद्ध की तथा गोपीचंद के गीतों से सम्बन्धित पाठों को विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत किया। इन्होंने आल्हाखण्ड से सम्बन्धित अनेक भ्रान्तियों को दूर किया। इनके उल्लेखनीय कार्यों में 'सम बिहारी हिन्दी सांग्स हिन्दी लोर फ्रॉम इस्टर्न गोरखपुर', 'टू वर्जन्स ऑफ़ दि स्टोरी ऑफ़ गोपीचंद, 'सांग्स ऑफ़ विजयमाल', 'दि सांग्स ऑफ़ आल्हाज़ मैरिज', 'अ समरी ऑफ़ द आल्हाखण्ड', 'सेलेक्टेड स्पेसिमेंस ऑफ़ बिहारी लैंग्वेजस',
'द भोजपुरी डाईलेक्ट', 'द गीत नैकब बंजारा', 'द पॉपुलर लिटरेचर ऑफ नार्दन इंडिया', 'द सांग्स ऑफ़ मानिकचंद । इनके अलावा 'बिहारी पीजेंट्स लाइफ' ग्रन्थ में ग्रामीण पारिभाषिक शब्दावली का भी संग्रह किया गया है।
विलियम क्रुक ने भारतीय लोक-साहित्य का अध्ययन वैज्ञानिक रीति से किया। इन्होंने सन् 1896 में 'एन इंट्रोडक्शन टू द पॉपुलर रिलिजन एंड हिन्दी लोर ऑफ नार्दन इंडिया' ग्रन्थ लिखा। सन् 1891 में इन्होंने 'नार्थ इंडियन नोट्स एंड क्वेरिज' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। इन्होंने उत्तरप्रदेश की विभिन्न जातियों से सम्बन्धित 'ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ नार्थ वेस्टर्न प्रोविंस' नामक पुस्तक लिखी। इनके द्वारा प्रणीत दोनों ही ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी हैं। विलियम क्रुक की प्रेरणा से पण्डित रामगरीब चौबे इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए अग्रसर हुए । इन्होंने उत्तरप्रदेश के लोक-गीतों का संग्रह किया जिसे सन् 1893 में 'नार्थ इंडियन नोट्स एंड क्वेरीज़' में प्रकाशित किया गया।
इनके हरदौल गीत, कोयल गीत, शिशु गीत अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
जे. डी. एंडरसन ने 1891 में 'सम सांग्स ऑफ़ द पोर्चुगीज इंडियन' शीर्षक से लेख लिखा जिसमें गोवा निवासी भारतीयों के लोक-गीतों का संकलन है। लोक-साहित्य के क्षेत्र में कार्य करने वालों में स्विनर्टन, एफ. हान. थर्स्टन, डब्लू. टी. डेम्स, ई. स्टैक, सी. एच. वोयस, सैलिगमन आदि हैं। सी. ए. बंथ की 'फेथ्स, फेयर्स एंड फेस्टिवल्स ऑफ़ इंडिया' विशेष पुस्तकें हैं जिसमें लोक-साहित्य एवं लोक संस्कृति सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित हुई है। सन् 1918 में बिहार सरकार
ने डॉ. ग्रियर्सन की पुस्तक 'बिहार वीजेंट लाइफ' का पुनः प्रकाशन किया।
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