लोक-साहित्य संग्रह की कठिनाइयाँ - difficulties of folklore collection

लोक-साहित्य संग्रह की कठिनाइयाँ - difficulties of folklore collection


लोक-साहित्य संग्रह में निम्नलिखित कठिनाइयाँ आती हैं-


1. शिक्षा और रोजगार की विविधता के कारण लोक गीत गवैयों का अभाव-सा होता जा रहा है। पारम्परिक गायकों को रोजगार के लिए कारण पलायन करना पड़ रहा है। अपनी संस्कृति से कटकर उन्हें अपने गीतों का मोह छोड़ना ही पड़ता है। हालाँकि इस पलायन के कारण लोक-संस्कृति का विस्तार भी हुआ है। ये दोनों ही बातें चुनौतीपूर्ण हैं। कुछ जातियाँ ही बची हैं जो पुराने गीतों को गाती हैं। आधुनिक शिक्षा प्रसार ने गीत गायकों के अवसर छीन लिए। भौतिकवादी जीवन दर्शन ने भी इस अवसर को क्षीण किया है। बहुरूपिया, स्वाँग जैसी लोक कलाएँ लुप्त हो गई हैं। पढ़ी-लिखी नवीन पीढ़ी की खियाँ इन गीतों को गाने में संकोच का अनुभव करती हैं।

अपने कण्ठों में संजोकर रखने वाली वरिष्ठ पीढ़ी काल के गाल में जा चुकी है। सामाजिक परिवर्तन की आँधी ने लोक साहित्य को उड़ा ले जाने का निश्चय कर लिया है। ऐसे में लोक-साहित्य का संकलन का कार्य दुरूह हो गया है।


2. लोक-गीतों की मर्मज्ञ स्त्रियाँ दूसरों के सामने गाने में लज्जा का अनुभव करती हैं। घर के आँगन में जब लोक-गीतों को विभिन्न अवसरों पर गाया जा रहा हो उसी समय बाहर बैठकर लिखा जा सकता है। टेप रिकॉर्डर इस क्षेत्र में बहुत सहायता कर सकता है।


3. लोक गीत गाने वाले गवैये मस्ती की तरंग में प्रायः गलत उच्चारण तथा कभी कोई पंक्ति तक भूल जाते हैं।

सुनकर लिपिबद्ध करने वाले व्यक्ति श्रुतिदोष के कारण भ्रान्तिपूर्ण पाठ भी लिख सकते हैं।


4. लोक गीत गाने वाले समय, ऋतु और मौकों पर ही गाते हैं अतः अवसर की प्रतीक्षा बहुत कठिन है। धान की रोपाई वाला गीत तो खेत की मेड़ पर ही बैठकर लिखा जा सकता है। उसे गीले खेत पर बैठकर लिखना आसान नहीं है। झूला झूलते हुए जो गीत गाया जाता है, उसे कजरी कहते हैं। कोई बाहरी व्यक्ति ऐसे में आ जाए तो स्त्रियाँ खुलकर नहीं गा सकतीं।


5. लोक गायक अपने गीतों को अपनी पूँजी समझते हैं। इसे रोजी-रोटी मानने वाली संकुचित मनोवृत्ति के कारण वे ये गीत किसी को देना नहीं चाहते ।

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय इसका उल्लेख करते हुए लिखते हैं- "गोपीचंद तथा भरथरी की कथाओं को लिखना चाहा था" परन्तु उन्हें इस कार्य में सफलता न मिल सकी। इन गायकों को ज्ञात नहीं था कि कथा लिपिबद्ध हो जाने से लोक-साहित्य की कितनी निधियाँ नष्ट होने से बच जाएँगी।


लोक-साहित्य में विद्यमान गोपनीय विद्याएँ, यथा चिकित्सा सम्बन्धी, खप्पर गीत, मन्त्रपरक गीत, साइले, समाइन, गुरसठी कीलन आदि को लिपिबद्ध करने में अधिक कठिनाई आती है।

लोक-साहित्य के क्षेत्र में कतिपय विद्वानों ने कुछ संस्थाओं की नींव डाली, जिनमें प्रमुख हैं डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, कृष्णानन्द गुप्त, डॉ० कृष्णदत्त वाजपेयी तथा देवीलाल सामर इनकी संस्थाओं ने लोक-साहित्य के संग्रहों का प्रकाशन किया। इन्होंने अपने-अपने मुखपत्र निकाले और मुखपत्र द्वारा लोकसाहित्य का प्रचार-प्रसार का कार्य किया।


लोक-साहित्य को परिभाषित करते हुए पूर्व पाठ में लिखा जा चुका है कि यह साहित्य मौखिक परम्परा का साहित्य है और इसका प्रचार-प्रसार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मौखिक रूप प्रदान करके होता रहा है इसलिए अनेक वर्षों तक लोक-साहित्य एवं संस्कृति के लिए जो प्रयास हुए,

वे प्रायः विशृंखल ही थे। ऐसी कोई केन्द्रीय संस्था नहीं थी जो विभिन्न स्थानों तथा विभिन्न विद्वानों द्वारा लोक-साहित्य सम्बन्धी कार्यों में संयोजन कर सके । इस बहुत बड़े अभाव की पूर्ति के लिए सर्वप्रथम प्रयाग में सन् 1958 में 'भारतीय लोक-संस्कृति शोध संस्थान की स्थापना की गई। इसके संस्थापक पण्डित ब्रजमोहन व्यास, श्रीकृष्णदास तथा डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय थे। इन तीनों विद्वानों ने सन् 1958 में अखिल भारतीय लोक-साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन प्रयाग में तथा दूसरा सम्मेलन दिसम्बर माह 1959 में बम्बई में आयोजित किया। इस संस्थान की 'लोक-संस्कृति' नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन भी हुआ। संस्थान ने दो पुस्तकें भी प्रकाशित कीं (1) लोक-साहित्य के विद्वानों का परिचय (2) लोक-साहित्य तथा लोक संस्कृति से जुड़ी पुस्तकों का विवरण।