लोक-साहित्य का प्रसार - dissemination of folklore
लोक-साहित्य का प्रसार - dissemination of folklore
लोक-साहित्य का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक और विशाल है। लोक अनुभूतियों की व्यापकता और अभिव्यक्तियाँ ही लोक-साहित्य है। जीवन की सभी क्रियाएँ इस क्षेत्र में समाहित हैं। डॉ० कुन्दनलाल उप्रेती ने लिखा है "एक समय था जब जनता की सरलता, स्वभाविकता तथा स्वछन्दता से यह साहित्य विभूषित रहता -- था। वह साहित्य उतना ही स्वाभाविक था जितना जंगल का फूल, उतना ही स्वछन्द था जितना आकाश में विचरने वाली चिड़ियाँ, उतना ही सरल एवं पवित्र था जितनी गंगा की निर्मल धारा। उस समय के साहित्य का जो अंश आज अवशिष्ट रह गया है, वही हमें लोक-साहित्य के रूप में उपलब्ध होता है।"
इन रचनाओं में लोक-गीतों की प्रमुखता है। लोक गीत छोटे भी होते हैं और बड़े भी बड़े गीतों को लोक गाथा या लोक कथा कहते हैं। आदिकाल के वीरगाथाओं में भरपूर लोक तत्त्व विद्यमान है। राहुल सांकृत्यायन का यह अभिमत समीचीन प्रतीत होता है- “सभ्यता के प्रभाव से दू रहने वाली, अपनी सहजावस्था में वर्तमान में जो निरक्षर जनता है उसकी आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, जीवन-मरण, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि की अभिव्यंजना जिस साहित्य में होती है उसे लोक-साहित्य कहते हैं।" (हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पृष्ठ 15-16 ) अतः सामाजिक,
पारिवारिक, ऋतु सम्बन्धी, श्रम सम्बन्धी, कृषि सम्बन्धी गीतों के अतिरिक्त, राजनीति एवं राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण गीत भी लोक-साहित्य के अन्तर्गत आते हैं। इसके अतिरिक्त नानी, दादी, काकी की कहानियाँ, माताओं की लोरियाँ भूत भागने के लिए पचरा (देवी गीत) लोगों के मनोरंजन के लिए नौटंकी, बहुरूपिया स्वांग, रामलीला, रासलीला आदि का आयोजन एवं रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाली कहावतें, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, खेल गीत आदि लोक-साहित्य की धरोहर हैं, अमूल्य पूँजी हैं।
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