हिन्दी लोक-साहित्य के विशिष्ट अध्येता - Distinguished Scholar of Hindi Folklore

हिन्दी लोक-साहित्य के विशिष्ट अध्येता - Distinguished Scholar of Hindi Folklore


देश के विभिन्न प्रान्तों में सन् 1920 के उपरान्त भारतीय विद्वानों ने लोक-साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य करना प्रारम्भ किया। बीसवीं शताब्दी के तृतीय दशक में लोक-साहित्य के क्षेत्र में प्रतिभाशाली एवं लोकप्रिय विद्वानों ने समर्पित, श्रमसाध्य एवं उल्लेखनीय कार्य किया।


बंगाल में डॉ. दिनेशचन्द्र सेन, बिहार में रायबहादुर शरदचन्द्र राय, उत्तर प्रदेश में पण्डित रामनरेश गुजरात में झवेरचन्द मेघाणी आदि विद्वानों ने लोक-साहित्य के क्षेत्र में शोध कार्य व संकलन का कार्य त्रिपाठी, अपने हाथों में लिया। कलकत्ता विश्वविद्यालय में बांग्ला भाषा और लोक साहित्य के रक्षार्थ विशेष कार्य किये गए।

डॉ. दिनेशचन्द्र सेन ने पूर्व बंगाल के मैमनसिंह जिले के लोक-गीतों का संकलन किया जिसे बाद में 'मैमनसिंह गीतिका' तथा 'पूर्वबंग गीतिका' नाम से प्रकाशित किया गया। इन गीतों का अंग्रेजी अनुवाद 'ईस्टर्न बंगाल बैलेड्स नाम से सन् 1923-1932 में प्रकाशित हुआ। डॉ. दिनेशचन्द्र सेन के भाषणों का प्रकाशन सन् 1920 में 'हिन्दी लिटरेचर ऑफ़ बंगाल नाम से हुआ। डॉ. दिनेशचन्द्र सेन बांग्ला साहित्य के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले अध्येताओं में प्रमुख हैं।


शरदचन्द्र राय ने बिहार में प्रशंसनीय कार्य किया। ये लोक-साहित्य-मर्मज्ञ होने के साथ-साथ मानव विज्ञानशास्त्री भी थे। इन्होंने बिहार की मुण्डा,

उराँव, संथाल, बिरहोर आदि का अध्ययन कर सामग्री संकलन का कार्य किया। इनके द्वारा रचित 'दि मुंडाज़ एंड देयर कंट्री' नामक पुस्तक सन् 1912 में प्रकाशित हुई। इनकी दूसरी पुस्तक 'दि बिरहोर्स' सन् 1925 में प्रकाशित हुई। शरदचन्द्र राय की इन दोनों पुस्तकों में उक्त आदिम जातियों की लोक वार्ताएँ संकलित हैं। सन् 1925 में एक अन्य पुस्तक 'दि ओरोक्स ऑफ़ छोटा नागपुर' प्रकाशित हुई। उड़ीसा के पर्वतों में निवास करने वाली भुइयाँ जाति के लोगों पर लिखी पुस्तक 'दि हिल्स भुइयाँज ऑफ़ ओरिसा' सन् 1936 में प्रकाशित हुई। इसमें खारी लोगों के 37 प्रचलित लोक गीत एवं 55 पहेलियाँ संगृहीत हैं।


गुजरात में झवेरचन्द मेघाणी ने लोक-साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य किया है ।

इन्होंने अपना समस्त जीवन साहित्य की एकान्त साधना में अर्पित कर दिया। मेघाणी ने गुजराती लोक कथाओं, वीर गाथाओं, लोक-गीतों, शिशु गीतों के संग्रह का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। सन् 1927 में रनपुर से मेधाणी-कृत 'कंकावटी' नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ। मेधाणी द्वारा सन् 1925-42 के बीच 'रुदयाली रात' नाम से चार खण्डों में लोक-गीतों का संकलन तैयार किया गया। सन् 1926-28 में मेधाणी-कृत 'चुन्दड़ी' नामक संग्रह दो भागों में प्रकाशित हुआ । इनके द्वारा रचित 'हालरडा' नामक ग्रन्थ में पालने के गीत हैं। मेधाणी द्वारा सन् 1931 में 'सोरठी गीत कथा' को प्रकाशित किया गया जिसमें ग्रामीण कहानियों का संकलन है।

इन संकलनों के अतिरिक्त इन्होंने लोक-साहित्य का सैद्धान्तिक विवेचन भी किया जिसे बम्बई विश्वविद्यालय ने पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया है। ये 'धरणी न घावन ग्रन्थ के संग्रहकर्ता एवं गायक दोनों थे। इनके अतिरिक्त गोकुलदास रामचुरा की रचनाओं से भी गुजराती लोक-साहित्य समृद्ध-सम्पन्न हुआ है।


सन् 1920 के बाद हिन्दी में लोक-साहित्य का शुभारम्भ हुआ जिसमें अग्रणी थे पण्डित रामगरीब चौबे, पण्डित रामनरेश त्रिपाठी, देवेन्द्र सत्यार्थी, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी और डॉ. सत्येन्द्र |


कर्नल टॉड द्वारा सन् 1829 में लोक-साहित्य के अध्ययन का शुभारम्भ हुआ।

इसमें भारतीय लोक वार्ता के संकलन एवं प्रकाशन कार्यों को प्रमुखता दी गई। शनैः शनैः भारतीय अध्ययनकर्त्ताओं ने इसका व्यवस्थित रूप से अध्ययन, संकलन एवं सम्पादन करना प्रारम्भ किया। पण्डित रामनरेश त्रिपाठी इनमें अग्रणी विद्वान् हैं। इनके द्वारा संकलित एवं सम्पादित ग्रन्थ 'कविता कौमुदी' भाग-5 सन् 1929 में प्रकाशित हुआ । इस ग्रन्थ में पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार के लोक गीत संगृहीत हैं। ग्राम साहित्य में लोकोक्तियों का भी संकलन किया गया है। डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय का मानना है- "हिन्दी क्षेत्र में लोक-साहित्य तथा लोकजीवन पर सर्वप्रथम संग्रह कार्य रूसी विद्वान् इवान पावलोविच मिनायेव ने सन् 1840-50 में आरम्भ किया।

सन् 1875 में इनके द्वारा संकलित हिन्दी के पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊँ की लोक कथाओं का रूसी अनुवाद प्रकाशित हुआ अतः रूसी विद्वान् इवान पावलोविच मिनायेव को ही हिन्दी लोक-साहित्य का सर्वप्रथम व्यवस्थित संग्रहकर्त्ता मानना चाहिए ।" डॉ. पाण्डेय के अनुसार हिन्दी लोक-गीतों का संग्रह करने का श्रेय पण्डित रामनरेश त्रिपाठी को दिया जाता है जिन्होंने यह कार्य सन् 1925 में प्रारम्भ किया। इनके पूर्व मिर्जापुर के कलेक्टर विलियम क्रुक के आदेशानुसार पण्डित रामगरीब चौबे ने सन् 1893 में लोक-गीतों के संकलन कार्य को पूर्ण किया था।


लोक-साहित्य के संकलन और सम्पादन के सन्दर्भ में निम्नलिखित तथ्य ध्यातव्य हैं-


1. भारत में लोक-साहित्य के अध्ययन, संकलन और सम्पादन के कार्य का श्रीगणेश अंग्रेज अधिकारियों द्वारा किया गया। 2. हिन्दी लोक-साहित्य के अध्ययन, संकलन और सम्पादन का सर्वप्रथम कार्य रूसी विद्वान् इवान


पावलोविच मिनायेव द्वारा किया गया जिसका सन् 1875 में रूसी में अनुवाद भी प्रकाशित हुआ।


3. कर्नल टॉड ने राजस्थानी भाषा के क्षेत्र में सर्वप्रथम लोक-साहित्य का कार्य किया।


4. हिन्दी लोक-गीतों के संकलन के कार्य में पण्डित रामगरीब चौबे पुरोधा हैं जिनके द्वारा संगृहीत गीतों का


प्रकाशन सन् 1893 में हुआ।


5. हिन्दी लोक गीतों का विधिवत संकलन एवं सम्पादन सन् 1929 में पण्डित रामनरेश त्रिपाठी द्वारा किया गया जो लोक-साहित्य के क्षेत्र में महनीय कार्य है। देवेन्द्र सत्यार्थी ने लोक-गीतों के संकलन एवं सम्पादन का कार्य किया। इन्होंने इन लोकगीतों की भावपूर्ण व्याख्याएँ एवं विवेकपूर्ण विवेचन भी प्रस्तुत किए। इनके द्वारा लिखित निबन्ध भावपूर्ण एवं अद्भुत हैं। अपने जीवन के अमूल्य बीस वर्ष इन्होंने लोक-गीतों के संकलन एवं सम्पादन कार्य में समर्पित किए। देवेन्द्र


सत्यार्थी ने लगभग तीन लाख लोक-गीतों का संकलन किया। इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं- 'बेला फूले आधी रात',


'धरती गाती है', 'बजट आवे ढोल' तथा 'धीर बहो गंगा' ।


डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने लोक-साहित्य के क्षेत्र में अध्ययनकर्त्ताओं को प्रोत्साहित किया। इन्होंने मथुरा संग्रहालय के संचालक पद पर कार्य करते हुए 'ब्रज साहित्य मण्डल' की स्थापना की। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'ब्रजभारती' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। इन्होंने 'पृथ्वीपुत्र' नामक पुस्तक लिखकर लोक- साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को सम्मान और प्रोत्साहन के साथ मार्गदर्शन किया। इनके प्रोत्साहन का ही प्रतिफल था कि पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी, कृष्णदत्त वाजपेयी और डॉ० सत्येन्द्र जैसे उद्भट विद्वान् लोक- साहित्य के अध्ययन और संकलन के क्षेत्र में आए।


सन् 1944 में पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी की प्रेरणा से ओरछा की राजधानी टीकमगढ़ में 'लोक वार्ता परिषद्' की स्थापना हुई,

जिसका कार्य था लोक-साहित्य का संकलन, सम्पादन और प्रकाशन। सन् 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देशी राज्यों के विलय के साथ ही 'लोक वार्ता परिषद्' का भी विलय हो गया।


कृष्णानन्द की प्रेरणा से बुंदेलखंडी लोक-साहित्य सेवा के लिए 'मधुकर पाक्षिक पत्रिका निकली किन्तु अल्प समय में ही उसका प्रकाशन होना बन्द हो गया। सन् 1952 में काशी में 'हिन्दी जनपदीय परिषद्' बनी और वहाँ से 'जनपद' नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित होना प्रारम्भ हुई जिसके सम्पादक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, डॉ. उदयनारायण तिवारी थे। अर्थाभाव के कारण इस पत्रिका के चार अंक ही प्रकाशित हो पाए।


महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का स्पष्ट निर्देश था कि हिन्दी साहित्य के अध्येताओं को अपने कर्तव्य- पालन हेतु लोक-साहित्य का अध्ययन और अनुशीलन अवश्य करना चाहिए। उन्होंने बल दिया कि इस दिशा में प्रवृत्त सुधीजनों को 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हिन्दी साहित्य का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।


डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, कृष्णानन्द गुप्त, डॉ. कृष्णदत्त वाजपेयी तथा देवीलाल सामर आदि विद्वानों द्वारा स्थापित संस्थाओं द्वारा लोक-साहित्य के संग्रहों का प्रकाशन किया गया तथा लोक-साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मुखपत्र निकाला गया।

डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा ब्रज साहित्य मण्डल की स्थापना, कृष्णानन्द गुप्त द्वारा फैजाबाद से 'अवधी भारती' पत्रिका का सम्पादन, गौरीशंकर पाण्डेय द्वारा 'लोक वार्ता' पत्रिका का सम्पादन, रघुवंश नारायण सिंह द्वारा 'भोजपुरी' पत्रिका का सम्पादन, खाकी बाबा द्वारा भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, बक्सर का आयोजन तथा भोजपुरी संसद वाराणसी के सभापति डॉ. स्वामीनाथ भट्ट आदि द्वारा किये गए विविध प्रयासों ने लोक-साहित्य के प्रचार-प्रसार का अभूतपूर्व कार्य किया।


विशृंखल लोक-साहित्य और संस्कृति को वैज्ञानिक पद्धति द्वारा सुनियोजित कर लोकसाहित्य के संग्रह का कार्य करने हेतु सन् 1958 में 'भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान की स्थापना की गई।

इसके संस्थापक पण्डित ब्रजमोहन व्यास, श्रीकृष्णदत्त तथा डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय थे। इन विद्वानों द्वारा अक्टूबर 1959 में अखिल भारतीय लोक-साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन प्रयाग में आयोजित किया गया। इसका दूसरा अधिवेशन दिसम्बर 1959 में बम्बई में आयोजित हुआ जिसमें इंग्लैंड की 'हिन्दी लोर सोसायटी' भी सम्मिलित हुई। भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा 'लोक-संस्कृति' नामक पत्रिका भी प्रकाशित की गई तथा 'लोक- साहित्य के विद्वानों का परिचय' एवं 'लोक-साहित्य तथा लोक-संस्कृति सम्बन्धी पुस्तकों का विवरण' नामक दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी प्रकाशित की गई। लोक कला के विकास के लिए प्रयाग में 'लोक कला संग्रहालय की स्थापना की गई जिसके अन्तर्गत एक पुस्तकालय का भी निर्माण किया गया। लोक कला संग्रहालय में देश-विदेश की लोक-साहित्य सम्बन्धी अनेक पुस्तकों का संकलन संरक्षित है। इस शोध संस्थान के माध्यम से शोध कार्य में गति आयी और लोक-साहित्य सम्बन्धी साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन प्रारम्भ हुआ।