हिन्दी की जनपदीय बोली - ब्रजभाषा - District dialect of Hindi - Braj Bhasha

हिन्दी की जनपदीय बोली - ब्रजभाषा - District dialect of Hindi - Braj Bhasha


यह ब्रज क्षेत्र की भाषा है। इसे 'ब्रज' कहते हैं। हिन्दी की सभी बोलियों में ब्रजभाषा प्रमुख है। इसके द्वारा पश्चिमी हिन्दी की बोलियों को सरलता से समझा जा सकता है। आधुनिक मथुरा जनपद और इसके आसपास का क्षेत्र ब्रज मण्डल कहलाता है। इस भाषा को ब्रजी, ब्रिज की भाषा, माधुरी, मधुरही, पुरुषोत्तम भाषा, नागभाषा तथा ग्वालियरी भी कहते हैं। शौरसेनी प्राकृत से उत्पन्न ब्रजभाषा सभी भाषाओं में उच्चासीन है। शौरसेनी का दूसरा नाम ब्रज मण्डल है। इसकी उपबोलियाँ हैं- भुप्सा, अन्तर्वेदी, डांगी, जादवाल मथुरा, आगरा और अलीगढ़ इसका मुख्य क्षेत्र हैं।

यदि हम कबीर, सूर और तुलसी को पढ़ते और समझते हैं तो देश के बहुत बड़े भूभाग की बोली भाषा को समझ सकते हैं। कबीर की काव्य-भाषा में भोजपुरी का विशद् क्षेत्र समाया है तो सूर की काव्य-भाषा में समूचा ब्रजमण्डल एटा, इटावा, मैनपुरी, बदायूँ, बरेली, गुडगाँव, धौलपुर, मथुरा, अलीगढ़, आगरा, भरतपुर क्षेत्र है और तुलसी की काव्य-भाषा में फैजाबाद, बैसवाड़ा से लेकर मध्य प्रदेश तक का बड़ा क्षेत्र समाया हुआ है । थोड़े-बहुत अन्तर के साथ इतने बड़े क्षेत्र को समझा जा सकता है। इन सन्त-भक्त कवियों ने अपनी वाणी से देश की सांस्कृतिक एकता को भाषाई आधार प्रदान किया है और भाषाविज्ञान के लिए एक नया दृष्टिकोण भी दिया है।

ग्रियर्सन के अनुसार ब्रजभाषा पश्चिमी हिन्दी की श्रेष्ठतर प्रतिनिधि भाषा है। ब्रजभाषा का साहित्य 14वीं शती से मिलता है। मध्यकाल में ब्रजभाषा समस्त भारतवर्ष की साहित्यिक भाषा रही है। इसका प्रयोग 16वीं शती के अन्त तक रहा तथा कुछ विद्वानों ने 20वीं सदी में भी साहित्य रचा है।


ब्रजभाषा लोक-साहित्य की दृष्टि से सम्पन्न भाषा है। इस भाषा का प्रयोग अपने काव्य में करने वालों में भारत के सिरमौर कवि सूरदास, नन्ददास, बिहारी, मतिराम, भूषण, देव, रत्नाकर और आधुनिक काल के भारतेन्दु तक रहे हैं।

इस भाषा में शब्दान्त में 'ओ' और 'ई' रहता है आया का आयो, होता का होतो, दूजा का दूजो। 'ड' के स्थान पर 'र'। जैसे जुड़तो के स्थान पर जुरतो। अधिकतर शब्द उकारान्त होते हैं। जैसे- माल के स्थान पर मालु, सब के स्थान पर सबु । इस भाषा में सर्वनाम हम के स्थान पर हों और था के स्थान पर हुतो, देखने के स्थान पर देखन, मारता के स्थान पर मारतु हो जाता है।


ब्रजक्षेत्र का रासलीला और होली नृत्य मानों मनोरंजन के गंगायमुना का दोआब है ।

रासलीला अन्य क्षेत्रों में भी होती है परन्तु ब्रज की रासलीला में कई टोलियाँ होती हैं। इसमें पुरुष ही राधा-कृष्ण बनते हैं। मंच पर जब राधा-कृष्ण के चरित्रों का अभिनय प्रस्तुत किया जाता है तो दर्शक दिव्य कृष्णलीला की साक्षात् अनुभूति से गद्-गद् हो उठते हैं। उनकी वेशभूषा और आंगिक अभिनय स्पृहणीय है। दर्शक रस से सराबोर हो जाता है और अन्त में फूलों की होली से लीला समाप्त होती है, जो दर्शक को ब्रज की कुंजों का स्मरण कराती है।