हिन्दी की जनपदीय बोली - राजस्थानी - District dialect of Hindi - Rajasthani

हिन्दी की जनपदीय बोली - राजस्थानी - District dialect of Hindi - Rajasthani


राजस्थान का मूल लोक-साहित्य वहाँ के वीरों की सजीव गाथाएँ हैं। यहाँ की लोक-गाथाओं में राजस्थान के वीरों के अदम्य साहस और शौर्य का वर्णन है। इन धरती पुत्रों की शौर्य गाथाएँ इतनी जीवन्त हैं कि श्रोता को सीधे उस काल का भ्रमण करा देती हैं। वीरों का एक सजीव चलचित्र आँखों के सामने घूम जाता है।


कर्नल टॉड ने लोक-साहित्य के अध्ययन-अनुसन्धान के क्षेत्र में अथक परिश्रम किया है। उनके ग्रन्थ 'एनाल्स एंड एंटीक्वीटीज़ ऑफ राजस्थान में राजस्थान के खान-पान, रीति-रिवाज, वेशभूषा, शौर्य गाथाओं आदि का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

इस ग्रन्थ में राजपूताना काल का सम्यक् इतिहास है। यहाँ की डिंगल भाषा का अध्ययन इटली के विद्वान् एल.पी. टॅसीटोरी ने किया है। यहाँ के चारणों के गीतों का संकलन और संरक्षण करने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। लेखक ने स्वयं राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर वहाँ की माटी में लोक की सुगन्ध को सूँघने का प्रयास किया है। राजस्थान की ग्रामीण हिन्दू-मुस्लिम साझा संस्कृति प्रेरणादायी है । छोटी-सी सारंगी पर बजती हुई सर्वाधिक प्रचलित धुन 'केसरिया बालमा, आवो नी, पधारो म्हारो देस रे !'



मानों हमारे कानों को कुछ गूढ़ सन्देश, प्रेम-गाथाओं एवं वीर गाथाओं को सुनने का निमन्त्रण देती है। कठपुतली- नाच और स्वाँग के माध्यम से लोक कथाओं का वर्णन करना सहज रूप में दर्शकों को आकर्षित करता है।

वहीं अजमेर शरीफ में सूफी-गीतों की धुन हमें एक अलग ही कालखण्ड में ले जाती है। 'नरसी मेहता का मायरा' एक नवीन विधा है। कृष्णभक्तिगाथा, जिसमें एक भक्त अपनी पुत्री को मायरा भेजने में असमर्थ पाता है, पर उसकी अगाध भक्ति के वशीभूत हो कृष्ण स्वयं उसकी पुत्री के घर मायरा देने जाते हैं। वह मायरा अद्वितीय है। यह एक भक्त की मार्मिक कथा है तथा मायरे के माध्यम से समाज में प्रचलित प्रथा का ज्ञान भी कराती है। वहाँ की लोक कथाओं में वीरों की अदम्य शौर्यगाथा, निश्छल प्रेमगाथाएँ हैं। लोक नृत्य में कठपुतली नृत्य एवं कठघोड़े का नृत्य है और लोक नाट्य स्वाँग महत्त्वपूर्ण हैं।


राजस्थानी लोक-साहित्य के प्रमुख रूप


लोक गाथा लोक गीत


नरसी मेहता का मायरा, प्रेम और शौर्यगाथाएँ


'केसरिया बालमा आवो नी पधारो म्हारो देस रे' जैसे गीत एवं संस्कार गीत


लोक नृत्य


कठपुतली नृत्य, कठघोड़ा नृत्य


लोक नाट्य


स्वाँग