लोक वार्ता के तत्त्व और लोक मानस - Elements of public talk and public mind

लोक वार्ता के तत्त्व और लोक मानस - Elements of public talk and public mind


यदि लोक वार्ता किसी सम्पूर्ण समाज या जाति विशेष का जीवन शास्त्र है जिसमें लोक ज्ञान भण्डार है। और उसकी समूची विरासत है तो निश्चित रूप से लोक वार्ता के तत्त्व भी उस समाज के रीति-रिवाज, विश्वास- अन्धविश्वास, परम्पराएँ, मान्यताएँ, लोक गीत, लोक नाट्य, लोक कथा, लोक गाथा, भावात्मक एकता एवं व्यक्तिगत विशेषता आदि से प्रभावित होंगे। इन्हीं के आधार पर लोक वार्ता के तत्त्व उस समाज विशेष के - इतिहास, मानव अवशेष एवं अभिव्यक्ति का अध्ययन करना आवश्यक है। लोक वार्ता, लोकविज्ञान, लोकचर्चा और लोक वाइय वस्तुतः एक ही रूप हैं।


इस क्षेत्र में डॉ. वासुदेशरण अग्रवाल ने लोक वार्ता के अध्ययन को जनपदीय अध्ययन से जोड़ दिया है। जिसके तीन प्रमुख घटक हैं- (1) भूमि और भूमि सम्बन्धित अध्ययन (2) भूमि पर रहने वालों का अध्ययन (3) उसके जनजीवन और जन संस्कृति का अध्ययन।


(1) भूमि का भौतिक अध्ययन भूमि की मिट्टी, चट्टानें, उस पर बहने वाले झरने, वृक्ष-वनस्पतियाँ, औषधियाँ, पशु-पक्षी आदि।


(2) भूमि जन उनकी जातीयता, रहन-सहन, रीति-रिवाज, गीत, नृत्य, उत्सव मेले आदि का अध्ययन ।


(3) जनसभ्यता और संस्कृति जनता का इतिहास, उसका जीवन-दर्शन, भाषाई सूक्ष्म अध्ययन आदि लोक वार्ता के तत्त्व या स्वरूप हैं।


सोफियावर्न के अनुसार इसके निम्नलिखित तीन घटक हैं- (1) लोक-साहित्य (2) लोकजीवन के रीति- रिवाज (3) लोकप्रचलित विश्वास ।


डॉ. श्याम परमार के अनुसार इसके निम्नलिखित घटक हैं- (1) लोक गीत, लोक-कथाएँ, कहावतें, लोकोक्तियाँ, पहेलियाँ आदि (2) रीति-रिवाज, त्योहार, पूजा, व्रत- अनुष्ठान आदि (3) जादू-टोना टोटका, भूत- परत सम्बन्धी विश्वास (4) लोक नृत्य, लोक नाट्य, लोक गाथा आदि (5) बालकों सम्बन्धी गीत, खेल गीत आदि


डॉ० सत्येन्द्र ने भी लोक वार्ता के तत्त्व और लोक मानस पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- "लोक: साहित्य के अन्तर्गत वे समस्त बोलियाँ या भाषागत अभिव्यक्ति आती है जिसमें (1) आदिमानव के अवशेष उपलब्ध हों, (2) परम्परागत मौखिक रूप से उपलब्ध बोली या भाषागत अभिव्यक्ति हो, जिसे किसी की कृति न कहा जा सके, जिसे श्रुति ही माना जाता हो और जो लोक मानस की प्रवृत्ति में समाई हो, (3) कृतित्व तो हो किन्तु वह लोक मानस के सामान्य तत्त्वों से युक्त हो ताकि उसके किसी व्यक्तित्व के साथ सम्बद्ध रहते हुए भी लोक उसे अपने व्यक्तित्व की कृति स्वीकार करें। "