मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में युगीन परिवेश - Epoch environment in the poetry of Maithilisharan Gupta
राष्ट्रकवि गुप्त को काव्य-सृजन की प्रेरणा महावीरप्रसाद द्विवेदी से मिली, लेकिन परिवर्तित युगधाराओं से आवश्यक तत्त्व प्राप्त करते हुए उन्होंने युगानुकूल काव्य-सृजन किया। वे कभी अगतिमय नहीं हुए और न ही गतानुगतिक होकर प्राचीनता के आवर्त में ही पड़े रहे, अपितु वे जागरूक प्रहरी के समान प्रत्येक नूतन परिवर्तन की ओर दृष्टिपात करते हुए सदैव नूतन काव्य-सृष्टि की ओर कदम बढ़ाते रहे । उनके काव्य में अपने युग की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक जीवन की गतिविधियाँ वर्णित हैं, इसी कारण उनका समग्र साहित्य युगानुकूल है।
उस युग में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना कर हिन्दू धर्म को रूढ़ियों और आडम्बरों से मुक्त करके उसके शुद्ध रूप को अपनाने का आग्रह किया। स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द आदि ने अपने अतीत, साहित्य और संस्कृति के प्रति श्रद्धा और गौरव की भावना जाग्रत करने का प्रयास किया। विभिन्न आन्दोलनों से बालविवाह, बहुविवाह, सतीप्रथा, पर्दाप्रथा, अस्पृश्यता आदि असामाजिक कुप्रथाओं का विरोध प्रारम्भ हो चुका था। इसके साथ ही विश्व बन्धुत्व, सर्वभूतहित, सामाजिक समानता, निष्काम कर्म, देश के लिए सर्वस्व बलिदान, पुरुषार्थ की महत्ता, नारी शिक्षा और स्वतन्त्रता, हिन्दू-मुस्लिम एकता, मानवतावाद आदि विचारों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।
गुप्तजी के साहित्य पर इन सभी सामाजिक विचारों का प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपनी रचनाओं में युग की विभिन्न समस्याओं को उभार कर उनका समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
गुप्तजी मानते हैं कि पराधीनता के सुप्त वातावरण में अतीत की जय ही जागरण उत्पन्न कर सकती है। उन्होंने 'मौर्य विजय' की भूमिका में कहा है कि- “यदि सौभाग्य से किसी जाति का अतीत गौरवपूर्ण है तो उस पर अभिमान करें तो उसका भविष्य भी गौरवपूर्ण हो सकता है।" इसीलिए उन्होंने अपनी कृतियों में अतीत-चित्रण को अधिकाधिक सशक्त बनाने का प्रयास किया है।
किन्तु वे इस बात के प्रति भी सचेत थे कि केवल अतीत-चित्रण से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी बल्कि युगानुसार आने वाले परिवर्तन को भी सहज रूप से स्वीकार करना होगा । वे कहते हैं-
प्राचीन बातें ही भली हैं यह विचार आलोक है, जैसी अवस्था हो, वहाँ वैसी व्यवस्था ठीक है।
गुप्तजी का यह मानना है कि युगीन परिस्थितियों के अनुरूप विचारों को बदलने से अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने युगीन मूल्यों के साथ प्राचीन गौरव पूर्ण तत्त्वों का संतुलन किया।
वे प्राचीन आदर्श भावों की पृष्ठभूमि में आधुनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ते हैं और 'भारत भारती' में अतीत का गौरवभाव जगाकर वर्तमान को सुधारने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं-
मानस भवन में आर्यजन, जिसकी उतारें आरती । भगवान् भारतवर्ष में, गूँज हमारी भारती ।
गुप्तजी ने अतीत के आधार पर अनेक रचनाओं का सृजन किया। किन्तु उन्हें युगीन परिस्थितियों के अनुसार नवीन रूप प्रदान कर प्राचीन कथाओं को नूतन उद्भावनाओं से सजाया है। परम्परा की लीक पर चलते हुए भी कथा के स्वाभाविक क्रम में उन्होंने परिवर्तन अवश्य दिखाया है।
उनकी 'द्वापर' में आमजन को तत्कालीन युग की परिस्थितियों से हीन भावना से ग्रसित न होकर देश के गौरव को बढ़ाने के लिए कर्तव्य करने की प्रेरणा दी गई है -
अपने युग को हीन समझना आत्महीनता होगी, सजग रहो, इससे दुर्बलता और दीनता होगी। जिस युग में हम हुए वही तो अपने लिए बड़ा है। अहा! हमारे आगे कितना कर्मक्षेत्र पड़ा है।
गुप्तजी गाँधीवाद के पक्के समर्थक थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव था।
वे कहते हैं- 'सत्याग्रह है कवच हमारा, कर देखे कोई भी बार।' उन्होंने भारतवासियों को अहिंसा, सत्याग्रह के द्वारा अपनी मातृभूमि की रक्षा का सन्देश दिया है-
अस्थिर किया टोप वालों को गाँधी टोपी वालों ने, शस्त्र बिना संग्राम किया है इन माई के लालों ने ।
उन्होंने अपने साहित्य में तत्कालीन सामाजिक अव्यवस्था का चित्रण किया है। वे छुआछूत की भावना के विरोधी हैं। उन्होंने समाज में निम्न वर्ग की प्रतिष्ठा करते हुए उन्हें पवित्र गंगा का सहोदर माना है-
उत्पन्न हो तुम प्रभु-पदों से जो सभी को ध्येय है। तुम हो सहोदर सुरसरि के चरित जिसके गेय है ।
इसी युग की प्रमुख समस्या हिन्दू-मुस्लिम एकता थी। गुप्तजी ने अपनी अनेक रचनाओं में इन दोनों की एकता पर बल दिया। धार्मिक समन्वय की भावनाओं को व्यक्त करते हुए, वे कहते हैं-
हिन्दू मुसलमान दोनों अबछोड़ें वह विग्रह की नीति ।
मैथिलीशरण गुप्त मानवतावाद के पोषक और समर्थक थे।
उनके काव्य में विश्वमानव की कल्याण भावना मुखरित होकर सामने आयी है। वे मानवता के सच्चे पुजारी थे इसलिए उन्होंने सभी संकीर्ण भावों का विरोध किया। उनकी मानवतावादी विचारधारा को प्रस्तुत पंक्तियों में सहज ही देखा जा सकता है-
न तन सेवा, न मन सेवा, न जीवन और धन सेवा
मुझे है इष्ट जनसेवा सदा सच्ची जन सेवा ।
मैथिलीशरण गुप्त पर नवजागरण की नारी सम्बन्धी विचारधारा का गहरा और व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने पौराणिक कथाओं का सन्दर्भ लेकर नारी की गरिमामयी,
तेजस्वी प्रतिभा को प्रस्तुत किया। देश की तत्कालीन परिस्थितियों में नारी की स्थिति पर दुःख व्यक्त करते हुए नारीशक्ति की महत्ता को प्रकट करते हुए वे कहते हैं-
अनुकूल आद्या शक्ति की सुखदायिनी जो स्फूर्ति है, सधर्म की जो मूर्ति और पवित्रता की पूर्ति है, नर जाति की जननि तथा सुख शान्ति की खोतस्वति हा देव ! नारी जाति की कैसी यहाँ है दुर्गति ।
गुप्तजी यथार्थवादी कवि थे, वे सभी को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता देने के पक्षधर थे। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने मर्यादा को भी पर्याप्त महत्त्व दिया। इसी सोच को व्यक्त करती उनकी यह पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
जितने प्रवाह हैं बहें अवश्य बहें वे । निज मर्यादा में किन्तु सदैव रहें वे ॥
उस युग में द्विवेदीजी के प्रेरणा से मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ीबोली को अपने काव्य की भाषा बनाया और उसमें आवश्यक सुधारकर उसे काव्योचित रूप प्रदान किया। उनके द्वारा रचित अधिकांश प्रबन्धकाव्य पौराणिक और ऐतिहासिक हैं, लेकिन इनकी मूल संवेदना आधुनिक है। इन रचनाओं में अतीत को विकसित चेतना के आलोक में व्याख्यायित किया गया है। अतः यह कहा जा सकता है कि गुप्तजी के काव्य में अतीत-चित्रण की पृष्ठभूमि में युगीन परिस्थितियों और प्रवृतियों का चित्रण किया गया है।
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