लोक नाट्यों की विशेषताएं - Features of folk dramas
लोक नाट्यों की विशेषताएं - Features of folk dramas
लोक-नाट्यों की अपनी विशेषताएँ हैं जो शिष्ट-नाट्यों या साहित्यिक नाट्यों से उनका विभेद उपस्थित करती हैं। जगदीशचन्द्र माथुर के अनुसार लोक-नाट्यों की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
1. लोक रंगमंच मानक्समाज की सामूहिक अनुभूतियों, भावनाओं एवं प्रवृत्तियों को प्रस्तुत करता है, व्यक्ति विशेष की नहीं। साथ ही, यह कार्य लोक नाट्य अपनी स्वाभाविक पद्यात्मक भाषा के द्वारा संवादों के
रूप में करता है अर्थात् इनमें संवाद पद्यात्मक होते हैं। 2. लोक नाट्यों के टाइप चरित्र अर्थात् पात्र किसी समूह विशेष या प्रवृति विशेष का प्रतिनिधि करते हैं।
3. लोक नाट्यों का प्रदर्शन खुला रंगमंच पर होता है जहाँ प्रायः एक पर्दा पृष्ठ भाग में लगा रहता है तथा दृश्य
परिवर्तन का अभाव पाया जाता है। 4. लोक नाट्यों में संकेतात्मक अभिनय का महत्त्व है यह अभिनय नृत्य के हावभाव युक्त होता है।
5. लोक-नाट्यों पौराणिक कथा पर आधारित होता है। कथा के मध्य निश्चित अन्तराल पर विदूषक का प्रवेश होता है। इसमें मर्मस्पर्शी अभिनय के साथ-साथ आदर्श स्थापनात्मक उपदेश अथवा उच्च वर्ग पर व्यंग्य तथा सम-सामयिक विषयों पर चुटीली भावाभिव्यक्ति की जाती है।
6. लोक नाट्यों में कथानक का महत्त्व कम होता है क्योंकि कथाएँ प्रायः परिचित होती हैं। इनमें रसानुभूति द्वारा तृप्ति का महत्त्व अधिक होता है।
7. लोक-नाट्यों में नाटक मण्डली का प्रत्येक सदस्य आवश्यकतानुसार किसी भी पात्र को निभा सकता है।
जैसे नायक अथवा विदूषक का अभिनय या निर्देशक का कार्य करना।
8. लोक नाट्यों में लोकजीवन के रीति-रिवाज या उत्सवों का उल्लेख अनिवार्य रूप से होता है। साथ ही, लोकप्रचलित गीतों और कहावतों का समावेश भी आवश्यक रूप से रहता है।
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