लोक गाथा की विशेषताएँ - Features of folk tale
लोक गाथा की विशेषताएँ - Features of folk tale
भारतीय लोक गाथाओं को ध्यानपूर्वक देखने पर ज्ञात होता है कि सभी प्रदेशों की लोक-गाथाओं की विशेषताएँ प्रायः समान हैं। इतना ही नहीं, विश्व की समस्त लोक कथाओं में भी ये विशेषताएँ समान रूप से पाई जाती हैं। लोक-गाथाओं की ये विशेषताएँ उन्हें अलंकृत काव्य से पृथक् करती हैं। इन लोक-गाथाओं की प्रधान विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
01. अज्ञात रचयिता और रचनाकाल
लोक गाथाओं की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इनका रचयिता अज्ञात होता है। भारत में ढोला-मारू, लैला-मजनूँ, बगड़ावत, वीर तेजाजी आदि लोक गाथाएँ विभिन्न प्रदेशों में समान रूप से प्रचलित और प्रसिद्ध हैं किन्तु इनकी रचना किस काल में,
किस कवि द्वारा की गई ! यह तथ्य अज्ञात है। इन लोक गाथाओं के सृजनहार की स्थिति उस बूँद के समान है, जो सागर में जाकर सहज ही विलीन हो जाती है। मौखिक परम्परा से प्राप्त होने के कारण इनका रूप आकार घटता-बढ़ता और सुधरता रहता है। इनके रूप-परिवर्तन में कब, किसने, कितना योगदान दिया ! यह बता पाना असम्भव है। किन्तु इस परिवर्तन-परिवर्द्धन की प्रक्रिया में यह रचना वैयक्तिक न रहकर समस्त समुदाय की कृति बन जाती है। रचनाकार की भाँति ही इनका रचनाकाल भी अज्ञात है, क्योंकि इनमें वर्णित प्राचीन समाज का चित्रण इनकी प्राचीनता तो प्रकट करता है किन्तु रचनाकाल की निश्चित अवधि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है।
02. प्रामाणिक मूल पाठ का अभाव :
लोक गाथाएँ मौखिक परम्परा से प्राप्त ऐसा साहित्य है जिसमें समय-समय पर रूप-परिवर्तन होता रहता है।
जो गाथा जितनी लोकप्रिय होती है उसमें परिवर्तन की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। अतः इनके प्रामाणिक मूलपाठ का सर्वथा अभाव पाया जाता है। कुछ विद्वानों ने लोक-गाथाओं को उस विशाल नदी के समान बताया हैं जो अपने उद्गम स्थल से पतली जलधारा के रूप में निकली है और निरन्तर आगे बढ़ते हुए विशाल नदी का रूप धारण कर लेती है। लोक-कण्ठ पर चलायमान लोक गाथाओं के रूप आकार में युगों से परिवर्तन होते रहे हैं, परिणामस्वरूप उनके मौलिक स्वरूप का पता नहीं चल पाता है। यहाँ एक बात ध्यातव्य है कि लोक गाथाओं की प्रामाणिकता उसके मूल पाठ के निर्धारण से नहीं, वरन् उसके लोक कण्ठ में विराजने से सिद्ध होती है।
03. गीत-संगीत और नृत्य का सुन्दर समन्वय :
लोक गाथा गीतात्मक कथा होती है, जिसका वाचन नहीं, गायन होता है। गायन के साथ संगीत सदैव वांछनीय होता है। अतः लोक गाथा का गायक गाथा गायन के दौरान ढोलक, सारंगी, चिकाड़ा आदि वाद्यों का प्रयोग कर अपने गायन को प्रभावी बनाता है। लोक गाथा के लिए अंग्रेजी में 'बैलेड' शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है, 'नाचना गाथाकार की विविध भाव-भंगिमाएँ, पद-संचालन नृत्य का ही रूप हैं। इस प्रकार गाथाकार गीत-संगीत-नृत्य का सुन्दर समन्वय कर गाथा को और अधिक रोचक और प्रभावी बना देता है। साथ ही, उसका यह प्रयास उसे लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
04. आंचलिक रंग:
लोक गाथा की प्रमुख विशेषता उसका आंचलिक रंग हैजो उसकी शाश्वत जीवन्तता का प्रमाण है। लोक गाथा चाहे जहाँ की भी हो किन्तु क्षेत्र विशेष में पहुँचकर वहाँ की विशेषताओं को अपना लेती है। तब इनमें वहाँ के लोक-समुदाय का सामाजिक सांस्कृतिक जीवन प्रतिबिम्बित होने लगता है। इसके अतिरिक्त लोक गाथाओं में जन समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों और परम्पराओं का भी सहज वर्णन उपलब्ध होता है। लोकप्रचलित मुहावरे, कहावतों और भाषा-शैली का भी इसमें सुन्दर समावेश हो जाता है। इस प्रकार क्षेत्र विशेष में पहुँचकर लोक गाथा वहाँ के आंचलिक रंग में पूरी तरह रंग जाती है और आंचलिकता का पुट उसे विशेष सौन्दर्य से परिपूर्ण बनाता है।
05. मौखिक परम्परा
समग्र लोक-साहित्य मौखिक परम्परा से प्राप्त वह विरासत है, जो एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ पर चलायमान होती रहती है और इस प्रक्रिया में उसकी श्रीवृद्धि भी होती रहती है। लोक गाथा भी इसका अपवाद नहीं है। प्रो० गूमर ने मौखिक परम्परा को लोक-गीतों और लोक-गाथाओं की सच्ची कसौटी बतलाया है। डॉ. बैरियर एलविन के मतानुसार गीतों को लिपि की शृंखला में बाँधने पर उसका विकास नष्ट हो जाता है क्योंकि जब तक वह मौखिक परम्परा में रहती है तब तक वह लोक समाज की सम्पत्ति बनी रहती है किन्तु लिपिबद्ध होने पर वह साहित्य- सामग्री बन जाती है।
06. प्रति
लोक गाथाएँ पाण्डित्यपूर्ण उपदेशात्मक कथनों के भार से विहीन और सहज भावाभिव्यक्ति के नैसर्गिक सौन्दर्य से युक्त होती हैं। इन लोक-गाथाओं में आदर्शोन्मुखी प्रवृत्ति का समावेश होता है। अतः गाथाकार अपनी गाथा के माध्यम से उपदेश नहीं देता वरन् वह आदर्श चरित्रों को श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत कर आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा अवश्य देता है। इस प्रकार लोक-गाथाओं में उपदेशात्मक प्रवृत्ति का अभाव होते हुए भी नीति की अभिव्यंजना अवश्य होती है और इसके लिए गाथाकार अभिधा शक्ति के स्थान पर व्यंजना शक्ति का प्रयोग करता है । अतः गाथा से शिक्षा प्राप्त करना श्रोता की क्षमता पर निर्भर करता है।
07. अनलंकृत काव्य :
लोक गाथाएँ लोक मानस का सहज हृदयोद्गार है इसलिए इनमें सायास लायी जाने वाली कलात्मकता अर्थात् काव्यशास्त्र में वर्णित छन्द - अलंकारों का अभाव रहता है, किन्तु इनमें रस-निष्पति की सर्वोच्च अनुभूति होती है। पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने इसी विशेषता को अलंकृत काव्य और लोककाव्य का अन्तर बताते हुए स्पष्ट किया है - "ग्राम्य गीत और महाकाव्य की कविता में अन्तर है। ग्रामगीत हृदय का धन है और महाकाव्य मस्तिष्क का ग्रामगीत में रस है, महाकाव्य में अलंकार रस स्वाभाविक है और अलंकार मनुष्यनिर्मित । ग्राम गीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं केवल रस है, छन्द नहीं केवल लय है, लालित्य नहीं केवल माधुर्य
08. दीर्घ कथानक :
लोक गाथाओं का कथानक अत्यन्त विस्तृत होता है। इसके दीर्घ स्वरूप के दो कारण माने जा सकते हैं - (i) अन्तर्कथाओं की बहुलता तथा (ii) सामाजिक सम्पत्ति होने का प्रभाव । लोक गाथाओं को रोचक बनाने के लिए उनमें अनेक अन्तर्कथाओं का समावेश किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप लोक गाथाओं का कथानक दीर्घ स्वरूप प्राप्त कर लेता है। लोक-गाथाओं को लोक समाज अपनी सम्पत्ति मानते हुए समय-समय पर मनमाने ढंग से उसमें परिवर्तन-परिवर्द्धन करता है जिससे वे वृहदाकार हो जाती हैं। अतएव जो लोक गाथा जितनी प्राचीन होगी उसका रूपाकार उतना ही बृहत् होगा।
09. टेक पदों की पुनरावृत्ति :
टेक पदों की पुनरावृत्ति को लोक गाथा की प्रमुख विशेषता माना जाता है, क्योंकि टेक पदों को दोहराने से गाथाकार और श्रोता के मध्य एक सुन्दर समायोजन हो जाता है। इसके अतिरिक्त संगीतात्मकता की वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप गाथाकार और श्रोतागण को विशेष आनन्द की अनुभूति होती है जिससे गाथा अधिक सरस और रोचक प्रतीत होने लगती है।
10. संदिग्ध ऐतिहासिकता:
अधिकांश लोकगाथाओं की रचना ऐतिहासिक पात्रों को केन्द्र में रखकर की गई है किन्तु इनका कथानक ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध होता है।
इसका प्रमुख कारण यह है कि लोक गाथा का रचनाकार इतिहास- विशेषज्ञ नहीं होता तथा वह गाथा की रचना लोकरंजन की दृष्टि से करता है। इसके साथ यह बात भी उल्लेख्य है कि मूल रचनाकार रचना के सृजन के दौरान इतिहास-तत्त्व की रक्षा करता भी है तो समय के साथ होने वाले परिवर्तन के कारण उसका मूल स्वरूप सुरक्षित नहीं रहता और उसमें अनेक काल्पनिक तत्त्वों का समावेश हो जाता है। इस कारण विभिन्न गाथाओं में चित्रित पात्रों के ऐतिहासिक होने पर भी उनमें वर्णित घटनाओं को संदिग्ध माना जाता है।
कह सकते हैं कि लोक गाथाएँ विभिन्न विशेषताओं को आत्मसात् कर जनमानस की वह रचना है, जो अपने लोक समाज को आत्मिक आनन्द की अनुभूति कराती है। इनमें लोक-विश्वास, लोक-संगीत, लोक-नृत्य का सुन्दर संगम हुआ है जो जनमानस की तृष्णा को शान्त कर जीवन में उल्लास का संचार करता है।
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