लोक कथाओं का शिल्प - folk art
लोक कथाओं का शिल्प - folk art
भारत के विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित लोक-कथाएँ अति लघु अर्थात् मात्र पाँच-दस पंक्तियों तथा दीर्घ कलेवर के रूप में मिलती हैं किन्तु इनमें रोचकता, प्रभाव, वक्ता और श्रोता के मध्य में समुचित सम्बद्धता के निर्वाह के लिए आधुनिक कहानी और उपन्यास की भाँति ही छह महत्त्वपूर्ण तत्त्व मिलते हैं जो इस प्रकार हैं कथावस्तु, चरित्रचित्रण, कथोपकथन, देशकाल या वातावरण, शैली तथा उद्देश्य । -
1. कथावस्तु :
कहानी के ढाँचे को कथावस्तु कहते हैं, जो कथा का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है। इसे घटना, बात, कथ्य, कथानक आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रत्येक कथा की कथावस्तु होना अनिवार्य होता है क्योंकि इसके बिना कथा की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय लोक कथाएँ दो रूपों में मिलती है- (1) वे जिनमें केवल मूल कथा ही प्राप्ति होती है तथा (2) वे जिनमें मूलकथा के साथ प्रासंगिक कथाओं का भी समावेश होता है। दोनों ही प्रकार की कथाओं में आरम्भ, मध्य और अन्त सुनिश्चित रहता है। इन तीनों सोपानों को आदि कथानक 'आदम हव्वा' में स्पष्ट देखा जा सकता है, यथा निषेध, उल्लंघन तथा दण्ड ।
अतः - कहा जा सकता है कि कथानक में समय की गति कथा की कड़ियों को खोलती चलती है और इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में श्रोता तृप्ति की अनुभूति करता है।
2. चरित्र-चित्रण :
कथाकार कथा कहने के लिए सशक्त कथानक की रचना करता है। कथानक में विभिन्न परिस्थितियाँ, घटनाएँ और क्रिया व्यापार होते हैं, जिन्हें कथा के पात्र जीते हैं। ये पात्र ही कथा के चरित्र कहलाते हैं और इन पात्रों के गुण-दोषों को चरित्र चित्रण कहते हैं। भारतीय लोक कथाओं में उत्कृष्ट और निकृष्ट दोनों प्रवृत्तियों के चरित्रों का चित्रण मिलता हैं। इनमें नायक सर्वत्र वीर, निर्भय और संघर्षरत दिखाया गया है तो खलनायक भीरू और लंपट रूप में चित्रित है।
इन कथाओं में दैवीय और आसुरी शक्तियों से सम्पन्न पात्र भी उपलब्ध होते हैं तो पशु-पक्षी और निर्जीव उपादानों का भी पात्र रूप में चित्रण मिलता है, जो कथा को रहस्य, रोमांच और अलौकिकता से परिपूर्ण बनाते हैं।
3. कथोपकथन :
कथोपकथन कथा के प्रमुख अंग होते हैं जो पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व और अन्य मनोभावों को प्रकट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। लेकिन लोक कथाएँ मौखिक परम्परा से ही प्राप्त होती है अतः इनके कथोपकथन में एकरूपता का अभाव रहता है। कथा वक्ता अपनी इच्छा और योग्यता के अनुरूप वार्तालाप की रचना करता है।
उसका संवाद-संयोजन, संवाद- प्रस्तुति और आंगिक चेष्टाएँ उसके कथावाचन को प्रभावी बनाती हैं और श्रोताओं को बाँधे रखती हैं।
4. देशकाल अथवा वातावरण:
कथा को वास्तविकता का आभास देने के लिए देशकाल या वातावरण का प्रयोग किया जाता है। अधिकांश कथाएँ ऐतिहासिक कथानक का कलेवर लिये होती हैं, उनमें तत्कालीन पारिवारिक, सामाजिक, जातीय वातावरण की झलक देखने को मिलती है। इन लोक-कथाओं में स्थानीय पुट देखने को मिलता है, ये क्षेत्र और युग विशेष की सामाजिक मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं को भी प्रकट करती हैं। इस प्रकार देशकाल या वातावरण का प्रयोग लोक-कथाओं को और भी अधिक प्रभावी बनाने वाला तत्त्व है।
5. शैली :
कथा के प्रस्तुतीकरण के ढंग में कलात्मकता लाने के लिए उसको अलग-अलग भाषा तथा शैली से अलंकृत किया जाता है। लोक-कथाएँ मौखिक स्वरूप में होती है अतः इनकी शैली वक्ता पर निर्भर करती है। प्रत्येक वक्ता की अपनी विशेष शैली होती है, जिससे वह कथा को रोचकपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है, लोक समुदाय में अपनी अलग पहचान बनाता है। वक्ता कथा प्रस्तुति के दौरान छोगे, बात-बणाव और विविध प्रसंगों को जोड़कर अपनी कथा को आकर्षक बनाता है। वक्ता इस कला में जितना पारंगत होता है, उसकी कथा उतनी ही आकर्षक होती है। शैली में कृत्रिमता के लिए कोई स्थान नहीं होता है। सामान्यतः कथा का प्रारम्भ अतीत की रोचकता, मध्य भाग अत्यन्त विस्तार की संभावना लिये तथा अन्त आशीर्वाद या मंगल-वचन के साथ होता है।
6. उद्देश्य :
कथा की रचना और उसके वाचन में वक्ता का एक निश्चित उद्देश्य निहित होता है। लोक-कथाओं की रचना विभिन्न उद्देश्यों को लेकर की जाती है। जैसे मनोरंजन, बुद्धि-विलास, आदर्श की स्थापना आदि। किन्तु इनका चरम लक्ष्य लोकमंगल की कामना है। कथाकार जीवन के कटु यथार्थ के ताप से पीड़ित मानव समाज में सुख और शान्ति की स्थापना करना चाहता है। यही कारण है कि अधिकांश लोक कथाएँ सुखान्त होती हैं, दुखान्त नहीं। ये कथाएँ निराशा में आशा का संचार कर लोक मानस को आत्मिक आनन्द की अनुभूति कराती हैं ।
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