लोक कला - Folk Art
लोक कला - Folk Art
डॉ. सत्येन्द्र ने 'लोक-साहित्य विज्ञान' में 'लोक' के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है "लोक मनुष्य - समाज का वह वर्ग है, जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।" ऐसे लोक की सहज अभिव्यक्ति का एक स्वरूप लोक कला है। लोक कला समाज और संस्कृति का दर्पण है जिसमें समाज में प्रचलित मान्यताओं,
परम्पराओं और रीति-रिवाजों का प्रतिबिम्ब दिखलाई पड़ता है। सरलता और स्वाभाविकता ही इसके प्राण हैं। इसमें कहीं भी शास्त्रीय चिन्तन नहीं दिखाई पड़ता है। लोक-कलाएँ लोक मानस की वृत्तियों का चित्रण ही नहीं करतीं वरन् युगों-युगों से मानव समाज में होने वाले बदलावों और मानव मन पर पड़ने वाले उनके प्रभावों को भी दर्शाती हैं। अतः कह सकते हैं कि लोक कला लोक मन में झाँकने का एक सुगम झरोखा है।
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