लोक नृत्य : वैशिष्ट्य - Folk Dance: Characteristics
लोक नृत्य : वैशिष्ट्य - Folk Dance: Characteristics
लोक-साहित्यविदों ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हुए लोक नृत्यों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नानुसार बतायी हैं-
1. लोक नृत्य सरल सर्वगम्य और सर्वसुलभ होते हैं क्योंकि इनको सीखना, समझना और करना बहुत सरल होता है। इस हेतु किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। विवाहादि अवसरों पर स्त्रीवर्ग द्वारा किए जाने वाले नृत्यों में उपर्युक्त तीनों ही गुण विद्यमान रहते हैं।
विद्वानों की मान्यतानुसार पुराने संस्कारों तथा अनुकूल वातावरण के कारण बालक बचपन से ही लोक नृत्य सीख जाते हैं। यही बात व्यावसायिक लोक नृत्यों पर भी लागू होती है।
जैसे- भवाई आदि प्रसिद्ध लोक नृत्यकारों के घरों में अगली पीढ़ी को इसके प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। जन्म से ही बालक अपनी परम्परागत कला को संस्कारगत सीख जाते हैं।
2. लोक-नृत्यों में अप्रयत्नशील सरलता होती है। नृत्य कला के तीन प्रमुख स्तर माने जाते हैं - ताल, लय और अंग भंगिमाएँ। लोक नृत्यों में ये तीनों ही एक रस होकर अवतरित होते हैं।
शास्त्रीय नृत्यों की भाँति इनमें गिनतियाँ गिनने के ताल का खाली भरा होने या उसे पुनः सम पर लाने के नियम नहीं होते है बल्कि लोक नृत्यों में तो ऐसा प्रतीत होता है,
जैसे ताल और लय नृत्यकार की चेरी बन इसके पीछे-पीछे चलती है। नृत्यकार को ताल और लय के पीछे नहीं चलना पड़ता है।
आंगिक भंगिमाओं में एकरूपता के लिए कलाकारों को एक-दूसरे की भंगिमाओं का अनुकरण नहीं करना पड़ता वरन् लोक नृत्य में ताल, लय व अंग-भंगिमाओं का सृजन स्वयमेव हो जाता है।
3. लोक नृत्य स्व-सर्जित हैं लोक नृत्य बनाये नहीं जाते हैं, ये तो स्वतः ही बन जाते हैं। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा बनाये जाने की छाप इन पर अंकित नहीं होती है।
लोक नृत्य समस्त समाज द्वारा बनाये जाते हैं व सम्पूर्ण समाज के व्यक्तित्व की छाप इन पर होती है। प्रथमतः किसी सृजक ने अंग-भंगिमा का सृजन किया होगा कालान्तर में इसमें अन्य लोग कुछ-न-कुछ नया जोड़ते चले गए। इस प्रकार यह सम्पूर्ण समाज की धरोहर बन गए।
4. लोक नृत्यों में जनजीवन की परम्परा, उसके संस्कार तथा लोगों का आध्यात्मिक विश्वास होता है । लोक नृत्यों का उद्गम अत्यन्त प्राचीन है तथा दीर्घ काल से ये जनजीवन में अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाए हुए हैं। लोक नृत्यों ने काल, स्थान व परिस्थितियों की अनेक गतिविधियों को देखा,
उसे प्रभावित किया तथा सुदीर्घ काल तक जनजीवन को उल्लसित किया है फलस्वरूप यह आज जनता के जीवन में धार्मिक विश्वास की भाँति प्रतिष्ठित हो चुका है। यही कारण है कि ये लोक नृत्य जनता के जीवन को उन्नत, विकसित तथा स्वस्थ बनाने वाले सिद्ध हुए हैं। इनके पीछे कोई सामाजिक बन्धन नहीं है।
5. लोक-नृत्यों में आमतौर से वैविध्य में भी एकरूपता की महत्त्वपूर्ण विशेषता होती है। अनेक लोकनृत्यों में अंग-भंगिमाओं तथा चालों की विविधता रहती है परन्तु यह लोक नृत्यों की खासियत है कि इनके सभी नर्तक कलाकार एक ही ताल और एक ही नृत्यविशेष में रहते हुए भी विविध दिशाओं में फिरते हैं,
विविध अंग-भंगिमाओं का प्रदर्शन करते हैं परन्तु इनका सम्पूर्ण प्रभाव एक रसमय और एक रूपमय होता है।
6. सामूहिकता का भाव लोक नृत्यों की एक बड़ी विशेषता है। ये लोक नृत्य व्यक्तिगत आनन्द, लाभ, प्रतिष्ठा या वैयक्तिक भावना से परे होते हैं तथा सामुदायिकता, सामाजिक या नागरिक भावना में रचे-बसे होते हैं।
व्यावसायिक लोक नृत्यकारों को जो आर्थिक लाभ होता है, उसका प्रारम्भ भी सामुदायिक भावना से ही हुआ है। उन्हें पारिश्रमिक के रूप में जो भी धन उपलब्ध होता है, वह उनकी आजीविका की दृष्टि से समाज ने ही नियत किया है।
किसी पर्व, त्योहार, उत्सव या संस्कार पर यदि कोई नृत्य नहीं हो तो अशुभ माना जाता है।
अतः ये नृत्य सामाजिक, सामुदायिक व धार्मिक कर्त्तव्यों में शुमार हो गए हैं। इन नृत्यों में सामाजिक और सामुदायिक भावना के साथ ही आनन्द की भावना भी गुँथी हुई-सी प्रतीत होती है । आत्मानन्द और सामाजिक कर्त्तव्य का सुन्दर स्वस्थ और उपयोगी मेल लोकनृत्यों में ही देखा जा सकता है।
7. लोक नृत्य शास्त्रीय नृत्यों की भाँति शास्त्रीय नियमों के बन्धनों और सीमाओं से परे होते हैं परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि ये नृत्य प्राथमिक या अपरिपक्व होते हैं
या इनमें अनाड़ीपन होता है। लोक- नृत्यों में भी शास्त्रीय-नृत्य की भाँति संस्कारिकता, प्रभावोत्पादकता, कला, आनन्दप्रदायिनी शक्ति, रचना-कौशल तथा उच्च स्तरीय कौशल आदि गुण देखे जा सकते हैं। 'रास गरबा,' 'घूमर', 'भवाई', 'वालर', 'घूमरा', 'लौहरवा' जैसे प्रसिद्ध भारतीय लोक नृत्यों में प्रभावोत्पादक, आनन्ददायिनी शक्ति, रचना-विधि आदि के जो गुण हैं, वे किसी भी शास्त्रीय नृत्य से कम नहीं है। किसी नृत्य में नियम- प्रनियम की अधिकता, शास्त्रोक्त गुण और बाह्य चमक-दमक ही उसकी श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हो सकते हैं। लोक नृत्य सरल, आडम्बरहीन व नियमों-प्रनियमों से परे होने के कारण तथा अपनी स्वाभाविक सुन्दरता के कारण बहुत प्रभावशाली होते हैं।
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