लोक नृत्य : भारतीय परम्परा - Folk Dance: Indian Tradition
लोक नृत्य : भारतीय परम्परा - Folk Dance: Indian Tradition
भारतीय परम्परानुसार लोगों का यह विश्वास है कि विश्व के प्रथम नट शंकर हैं, जिनके विराट् नृत्य से विश्व की पञ्च क्रियाओं का जन्म हुआ और सृष्टि के ताल, स्वर आदि का स्वरूप निर्दिष्ट हुआ है। नटराज शिव नृत्यकला के आदि स्रोत हैं और नृत्यकला का लास्य रूप माता पार्वती की देन है। भगवान् शंकर के ताण्डव नृत्य के पद विन्यास सैला झूमर, लहकी, सजनी आदि लोक-नृत्यों के पद विन्यास ही हैं। पैरों का थिरकना, चंचलता, गति आदि क्रियाएँ वीभत्स रस के नृत्य की भंगिमाएँ हैं जो शिवशंकर के ताण्डव नृत्य में विद्यमान है। वेदों में भी नृत्य का उल्लेख मिलता है। श्रीकृष्ण व गोपियों का सम्बन्ध भी प्रायः रास नृत्य के द्वारा इस कला से जोड़ा जाता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय नृत्य का आदिरूप दिव्य रहा है। प्राचीनकाल से लेकर यह कला निरन्तर जन-जीवन का अभिन्न अंग बनी हुई है।
महाभारत कथानुसार राजा विराट्र की राजकुमारी उत्तरा का बृहन्नला के रूप में अर्जुन से नृत्यकला सीखना यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारतीय राजघरानों में भी यह प्रिय रहा है तथा राजपरिवार की राजकुमारियाँ इसे सीखती थीं। दक्षिण भारत के अनेक प्रसिद्ध मन्दिरों के पुजारी इस कला में दक्ष थे। भरतमुनि द्वारा रचित 'नाट्यशास्त्र' में अन्य कलाओं के साथ नृत्यकला का भी प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार प्राचीनकाल से लेकर अब तक नृत्यकला भी अन्य कलाओं की भाँति पनपी और विकसित हुई। कला के क्षेत्र में समय-समय पर आने वाले उतार-चढ़ाव तथा विदेशी आक्रमणों ने इसे प्रभावित किया तथा नृत्यकला दक्षिण में मन्दिरों की देवदासियों तक सीमित हो गई तथा उत्तर भारत में कुछ व्यावसायिक वर्गों तक सिमट गई।
कालान्तर में सामाजिक वातावरण व रूढ़ियों के कारण तथा राजदरबारों द्वारा समर्थन नहीं मिलने के कारण यह कला निम्न वर्ग तक ही सीमित हो गई। परन्तु देश की स्वतन्त्रता के उपरान्त इस दिशा में सकारात्मक कार्य हुए व लोक नृत्यों जैसी महत्त्वपूर्ण कला को सुरक्षित रखने व उसके पुनरुत्थान को महत्त्व दिया गया। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में प्रत्येक प्रान्त के लोक नृत्यों की प्रस्तुति की प्रथा लोक नृत्यों के लिए वरदान साबित हुई। राज्य स्तर पर भी लोक-कलाकारों व लोक नृत्यों को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ फलस्वरूप आज हमारे लोक नृत्य विश्व स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।
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