लोक नृत्य : उत्पत्ति - Folk Dance : Origin

लोक नृत्य : उत्पत्ति - Folk Dance : Origin


नृत्य की उत्पत्ति उल्लास से मानी जाती है। उल्लास-उमंग के क्षणों में मनुष्य द्वारा उछलना कूदना, किलकारी मारना या हाथ-पैरों को गति प्रदान करते हुए उनका संचालन करना ये सभी क्रियाएँ उसके आनन्द भाव को प्रकट करती हैं। कपोतादि पक्षियों के मन में भी जब उमंग जागती है तब वे अपने साथी को रिझाने के उद्देश्य से उसके समक्ष नृत्य करते हैं। काले घने बादलों को देखकर मोर का पंख फैलाकर नाच उठना उसके आनन्द भाव को प्रकट करता है। इस प्रकार आनन्द, उमंग तथा उल्लास भाव नृत्य का जन्मदाता कहा जा सकता है इसीलिए नृत्य की उत्पत्ति उल्लास भाव से मानी जाती है।


उल्लास का यह भाव जब प्राकृतिक उपादानों व पशु-पक्षियों तक को प्रभावित कर नृत्यातुर कर देता है। तो भला मनुष्य उससे कैसे बच सकता है ! इस प्रकार आदिमयुग से मनुष्य के जीवन में नृत्य का महत्त्व है। ज्यों- ज्यों उसका जीवन भयरहित होता गया तथा वह आनन्द-भाव की ओर शनैः शनैः बढ़ने लगा त्यों-त्यों उसके जीवन में नृत्यों का स्थान भी अधिक बढ़ता गया। यही आदिम नृत्यावस्था थी। जब आदिम मानव समूह बनाकर रहने लगा, उसमें सामाजिकता और सामुदायिकता की भावना आने लगी और वे साथ-साथ मिलकर नृत्य का आनन्द उठाने लगे तब लोक नृत्यों की उत्पत्ति हुई।


कालान्तर में लोक-नृत्यों से शास्त्रीय नृत्यों का विकास हुआ। जब नृत्यों में कला की सूक्ष्मता लाई गई तो वे जटिल व क्लिष्ट होने लगे। यह रूप शास्त्रीय नृत्यों के रूप में विकसित हुआ तथा सीमित वर्ग के दायरे में आते हुए यह लोक की पहुँच से बाहर होकर शास्त्रीय कला बन गया। विद्वानों के अनुसार इस प्रकार आदिम नृत्यों से लोक नृत्य का और लोक नृत्यों से शास्त्रीय नृत्यों का निर्माण हुआ।