हिन्दी के प्रारम्भिक साहित्य में लोक तत्त्व - Folk elements in early Hindi literature

हिन्दी के प्रारम्भिक साहित्य में लोक तत्त्व - Folk elements in early Hindi literature

लोकज्ञान और बौद्धिक चेतना वाला समुदाय जो मानव की आदिम प्रवृत्तियों तथा परम्पराओं के प्रवाह में बहता हुआ अकृत्रिम जीवन जीने में विश्वास रखता है द्वारा ऐसे लोक की अभिव्यक्ति जिन तत्त्वों के माध्यम से होती है, वे लोक तत्त्व कहे जाते हैं इसीलिए सम्पूर्ण मानव समुदाय लोक साहित्य के महत्त्व को स्वीकार करने लगा है और सतत इसकी ओर आकर्षण बढ़ता जा रहा है। हमारे देश के लोक-साहित्य में अपार साहित्य-सम्पदा भरी पड़ी है। साहित्य में लोक तत्त्व तथा लोक मानस की उस अवदान सामग्री को रेखांकित किया जाना आवश्यक है।

प्रकीर्ण और अलिखित तथा उपेक्षित रहकर भी अपनी अन्तःप्रेरणाओं से समूची मानव-चेतना को अपने रस- सलिल से अनुप्रेरित और अनुप्राणित करता आ रहा है। लोकभूमि के दर्शन के बिना शिष्टता की कोई सुघड़ परिभाषा नहीं दी जा सकती लोक तत्त्व के परिचय के बिना भौतिक उपक्रम निरर्थक से हो जाएँगे। अत्याधुनिक पेटेंट विधि भी जब संकट में आ जाएगी तो उसे इन्हीं लोकतत्त्वों की शरण में आना पड़ेगा और तब हमारा संरक्षित लोक-साहित्य निश्चित रूप से उद्धार करेगा। स्वतन्त्रचेत्ता आलोचकों ने स्वीकार किया है कि लोक-साहित्य सदा से गेय रहा है और यह गेयता लोक-साहित्य से संस्कृत को प्राप्त हुई है। संस्कृत पालि,

प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में लोक कथानकों को ही लिखित स्वरूप दिया गया है। हिन्दी में नाथों की वाणियों और सन्तों की रचनाओं का अधिकांश भाग लोक-साहित्य का है। एक प्रकार से इन रचनाओं की पूँजी है - लोक तत्त्व । अपभ्रंश साहित्य में कई रचनाएँ (प्रबन्धकाव्य) लोक कथाओं पर आधारित है। जैसे धनपाल रचित 'भविष्यत कहा' या भविष्यदत्त कथा । इसका दूसरा नाम 'सूर्यपंचमी कहा' भी है। इसमें घरेलू कहानी है जिसमें दो विवाहों के दुखद पक्ष को दर्शाया गया है। यह वणिक पुत्र भविष्यदत्त के भाग्य की कथा है।


'पाहुण दोहा' में लोकप्रचलित जीवन का उल्लेख है। बौद्ध-सिद्धों की रचनाओं में भी लोकानुभूतियों का वर्णन है, जैसे रूई धुनना, मदिरा निकालना, ढेकी चलाना आदि। अपभ्रंश के कवियों का लोकजीवन से गहरा - सम्बन्ध था। अपभ्रंश साहित्य ने लोकजीवन की सम्पूर्ण सम्पदा को अपनी झोली में भर लिया। नाथ साहित्य ने भी लोकजीवन में डूबकर अपने उन्हीं प्रतीकों के सहारे अपने गूढ ज्ञान को अभिव्यक्त किया है-


बाँध बाँधी बछरा पीओ पीर ।


आकाश की धेनु बछा जाया, ताधेनु के पूछ न पाया। बारह बछा सोरह गाई, धेनु दुहावत रैनि बिहाई।


सन्तों ने तो लोक गीकों के माध्यम से ही अपनी बात कही है। साधना एवं साधनात्मक अनुभूतियों, दोनों


के वर्णन में यह विद्यमान है -


बन की हिरनी कूबै बियानी ससा फिरै आकाश,


दुल्हिन गावहु मंगलचार | झीनी- झीनी बिनी चदरिया |


हमरे घर आए हो राजाराम भरतार,


झुलनी का रंग साँचा हमार पिया,


कवन सोनरवा गढ़ायो रे झुलानिया,


पड़े नहीं रंग काँचा हमार पिया ॥


हिन्दी साहित्य के आदिकाल में खुसरो की पहेलियाँ, विद्यापति की रचनाएँ, सम्पूर्ण रासो काव्य सब पर लोक-साहित्य की छाप है।


भक्तिकालीन कवियों का सांस्कृतिक समन्वयवादी दृष्टिकोण मूलतः लोकानुभूति है। लोकजीवन में प्रचलित सोहर, हिंडोला, बारहमासा,

होली गीतों को लोककण्ठ से सुनकर सूरदास ने ब्रजवासियों का यथार्थ जीवन चित्रित किया है। तुलसी की रचनाओं में 'रामलला नहछू', 'जानकी मंगल', 'पार्वती मंगल', 'गीतावली' पर लोक तत्त्व का साम्राज्य है। रामचरितमानस जैसा महाकाव्य भी लोक तत्त्व से अनुप्राणित है। कवितावली में लोकभाव द्रष्टव्य है-


पुर तें निकसी रघुवीर वधू, धरि घीर दए मग में डग है। झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर द्वै ॥ फिर बुझती हैं चलिहौं अब केतिक, अरु पर्ण कुटी करिहों कित है। तिय की लखि आतुरता पिय की, अँखिया अति चारु चलीं जल च्वै ॥


मलिक मुहम्मद जायसी का 'पद्मावत' लोकरस से ओतप्रोत है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल लिखते हैं। कि जायसी सच्चे पृथ्वीपुत्र थे। वे भारतीय जनमानस के कितने निकट थे ! इसकी पूरी कल्पना करना कठिन है। गाँव में रहने वाली जनता का जो मानसिक धरातल है, उसके ज्ञान की जो उपकरण सामग्री है, उसके परिचय का जो क्षितिज है, उसी सीमा के भीतर हर्षित स्वर में कवि ने अपने गान का स्वर ऊँचा किया है। जनता की शक्तियाँ और मान्यताएँ मानों स्वयं छन्द में बंधकर उसके काव्य में गुँथ गई हैं-


आवहिं झुंड सो पां तिहि पांति गवां सोहाई सो भाँतिहि भाँति । केस मेघावर सिरता पाई, चमकहिं दसन बीजु की नाई ॥


रीतिकाल में लोकजीवन की लोकोक्तियाँ एवं मुहावरों का समावेश है यद्यपि वह लोकजीवन से दूर है। आधुनिक कवियों में भी लोक तत्त्व दिखाई देते हैं। प्रेमचंद का समूचा कथानक लोकजीवन पर आधारित है। गोदान में होरी कहता है "मजूरी करना कोई पाप नहीं है। मजूर बन जाए तो किसान बन जाता है। किसान बिगड़ जाए तो मजूर हो जाता है। मजूरी करना भाग्य में न हो तो यह सब विपत्ति क्यों आती है ? क्यों गाय मरती है ? क्यों लड़का नालायक निकल जाता है ?" वस्तुतः साहित्य अपने आदिम काल में लोक तत्त्व के सान्निध्य में रहा और यह सान्निध्य तादात्म्यीकरण तक था। साहित्य और लोक तत्त्व अविभाज्य अंग हैं इसीलिए साहित्य में लोक तत्त्व की व्याप्ति शाश्वत है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्वीकार किया है कि भारतीय साहित्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाव लोक-साहित्य पर आधारित है। इसी बात को दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि साहित्य के कच्चे माल का भण्डार लोक-साहित्य है।