लोक-गीतों की रूढ़ियाँ - folk song stereotypes
लोक-गीतों की रूढ़ियाँ - folk song stereotypes
लोक-गीतों की परम्परा से चली आ रही प्रवृत्तियाँ धीरे-धीरे लोक-गीतों की रूढ़ियों का रूप धारण कर लेती हैं। लोक-गीतों की प्रमुख रूढ़ियों को पाँच प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-
1. संख्याओं से सम्बद्ध रूड़ियाँ
लोक-गीतों में संख्याओं में अनेक प्रकार से प्रयोग दिखाई देते हैं। जैसे मांगलिक संख्याएँ, परिमाण
बताने वाली संख्याएँ, क्रमानुसार आने वाली संख्याएँ संयुक्त संख्याएँ निश्चित संख्याएँ आदि ।
(1) लोक-विश्वासों में कुछ संख्याएँ शुभ व कुछ अशुभ मानी जाती हैं। शुभ संख्याओं के प्रयोग लोकगीतों में अधिक मिलते हैं । जैसे - पचरंगी पाघ, पचरंगी चूँदड़ी, सात सुहागिनें, सात सहेलियाँ आदि। जैसे -
सात सहेलियाँ रौ झूलरी, ओ पणिहारी जिए तो। गई गई समंद तळाब वा ला जो ॥
(2) इसी प्रकार परिमाण द्योतक संख्या में प्रायः 'नौ' की संख्या का उल्लेख मिलता है। जैसे-
अरी राई री नौ मन सरसों पिलाऊँ, मसाल जुराऊँ बाई ऐ लै चलू दाई री ।
(3) क्रमिक संख्या के प्रयोग, क्रमानुसार संख्याओं को गीतों में स्थान देना। जैसे-
मारू थारा देस में निपजै तीन रतन एक ढोलो, दूजी मारवण तीजी कसूमल रंग।
तथा,
एक बन लांगियो रे मिरगा,
दूजी बन लांगियो रे, तीजै फेदै में नहीं पड़ना, मिरगला रे ।
(4) संयुक्त संख्याओं का प्रयोग-
पूरी तो सेकू देवर कूँ लचपचीजी, एजी कोई साग करूँ दस-बीस ।
(5) इसी भाँति निश्चित संख्याओं के प्रयोग भी लोक-गीतों में किए जाते हैं-
कहाँ जी धरे ऐं पाँचों कापड़े, कहाँ घरे ऐं पाँचों हथियार । सिंदूक घरे हैं पाँचों कपड़े, खूँटी टंगे ऐं हथियार ॥
अन्य उदाहरण प्रस्तुत है-
आडी ओ नणदल बाई सुणीजै बायड़मेर, आडी सोढां री सोळे कोटड़ियाँ, जाळियाँ तो रखावी पूरी डोढ़ सौम्हारा राज।
लूंग हंदी ओ हंजामारू मैल चुणा
2. अतिशयोक्ति विषयक रूढ़ियाँ :
लोक कवियों की यह एक खास प्रवृत्ति रही है कि वे तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर अतिरंजना के स्तर तक ले जाते हैं। लोकजीवन के जो चित्र कवि ने उकेरे हैं, वे ग्रामीण जीवन की अति सुदृढ़ता को दर्शाते हैं।
एक साधारण ग्रामीण ललना का 'रतन कटोरे' में मेंहदी भिगोना, सोने की थाली में भोजन परोसना, मोती-
माणक से चौक पूरना आदि बातें ग्रामीण जीवन की भव्यता प्रदर्शित करती हैं, जो कि वास्तविकता से परे है। 'चंवरी' निर्माण के एक राजस्थानी लोक गीत में ऐसी ही बात कही गई है-
सोनै रूपै री चार खूँटियाँ घड़ावी,
केसर गार घलावी, ओ राज,
पिचरंग रेसम, रौ ताण तणावी,
अगर चन्नण री समधियाँ मंगावौ ... ।
एक अन्य लोक गीत में बहुत सहजता से मोतियों से माँग भरने की बात कही जा रही है -
कर कंकन सोहै हाथ चुरियन बाँह भरी।
सिर सोहै दाखिनी चीर, मुतियन माँग भरी ॥
3. प्रश्नोत्तर सम्बन्धी रूढ़ियाँ:
सवाल और उसके जवाब के आधार पर लोक गीत को गति प्रदान की जाती है। यह रूढ़ी गीत में
उत्सुकता को उत्पन्न कर उसे रोचक बना देती है-
कुण जी दिवली संजोवियौ,
डोरी हीर रौ रे लाल,
कुणजी हेरयो नवसर हार, बाभी जी दिवली सँजोवियौ,
वीरी सा हेरयो नवसर हार, डोरी हीर रौ रे लाल ।
4. पुनरावृत्ति की रूढ़ियाँ
गीत के बोलों के दुहराव की प्रवृत्ति भी लोक गीतों में बहुतायत से मिलती है। न केवल बोल बल्कि पूरे चरण को दुहराने के उदाहरण भी देखे जाते हैं-
इरेडिये रा ऊखळ माँय धम्मड़ खीच छड़ियौ ।
घम्मड़ खीच छड़ने म्है तो डांगळिये सुखायौ ॥ डागळिये सुखाय म्हैं तो छाजळे छटकायौ । छाजळे छटकाय म्है तो धम्मड़ घरटी पिस्यौ औ ॥
5. अनन्त संयोजन :
गीत को विस्तार प्रदान करते हुए उसके कलेवर को भाँति-भाँति के गहनों, रिश्तों, स्थानों आदि के नाम ले-लेकर बढ़ाया जाता है । शारीरिक अंगानुसार अलग-अलग गहनों के नाम जोड़ते हुए गीत को बढ़ाया जाता है 1
गणगौर पर्व का गीत-
खेलण दो गणगौर, भँवर म्हानै पूजण दो गणगौर, ओजी म्हारी सहेलियाँ जोवे बाट, माथा ने मेंमद लाव, भँवर म्हारी रखड़ी रतन जड़ाव ।
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