लोक गीत एवं शिष्टगीत - Folk songs and Etiquette
लोक गीत एवं शिष्टगीत - Folk songs and Etiquette
शिष्टगीत का तात्पर्य उन साहित्यिक गीतियों से है जो शास्त्रीयता के नियमों में आबद्ध है जबकि लोक गीत किसी नियम में बँधा हुआ संगीत नहीं है यह सहज रूप में फूट पड़ने वाले प्राकृतिक स्त्रोत सदृश है। लोक गीत व शिष्टगीत का पार्थक्य डॉ. गुलाब राय ने इस प्रकार बताया है "गीत लोक गीत भी होते हैं और साहित्यिक भी। लोक-गीतों के निर्माता प्रायः अपना नाम अव्यक्त रखते हैं और कुछ में वह व्यक्त भी रहता है। ये लोक भावना में अपने भाव मिला देते हैं। लोक-गीतों में होता तो निजीपन ही है किन्तु उनमें साधारणीकरण और सामान्यतया कुछ अधिक रहती है तभी वे वैयक्तिक रस की अपेक्षा जनरस उत्पन्न कर सकते हैं। साहित्यिक गीतों में निर्माता का निजीपन अधिक रहता है।"
इसी सन्दर्भ में श्री रामखेलावन पाण्डेय के विचारानुसार "लोक गीत व साहित्यिक गीतियों का भेद कृत्रिमता अकृत्रिमता तक ही सीमित न होकर आत्मीयता, आत्मनिष्ठा एवं संवेदनशीलता की कोटियों में भी दोनों में अन्तर है। शास्त्रीय (शिष्टगीत) काव्य-विधान में उपर्युक्त कोटियों का अभाव है। आप मानते हैं कि - "कला यदि रागात्मक क्षणों की आवेशपूर्ण अभिव्यक्ति है तो ग्राम-गीत निश्चय ही कलात्मक हैं। उनमें भावना और संगीतात्मकता का समन्वय है।"
लोक-साहित्य विधाओं द्वारा लोक-गीतों की विशेषताओं का वर्णन विवेचन किया गया है।
डॉ. श्याम परमार के अनुसार "लोक गीत निर्वैयक्तिक हैं। उन्हें समूह द्वारा निर्मित माना जाता है इसलिए व्यक्तित्व का - अभाव और समूह अथवा जातीय विशेषताओं के लक्षण उनमें मिलते हैं। संक्षेपतः अकृत्रिमता, सामूहिक भावभूमि, परम्परात्मकता एवं मौखिक परम्परा के गुण रूढ़ अतिशयोक्ति तथा संगीतात्मकता आदि लोकगीतों की विशेषताएँ हैं।"
उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर यदि लोक गीत व शिष्टगीत के स्वरूप की तुलना की जाए तो 'संगीतात्मकता' ही एक ऐसी विशेषता है जो शिष्ट-गीतों में भी पाई जाती है। इस प्रकार लोक-गीतों की ये विशेषताएँ स्वतः ही दोनों का अन्तर स्पष्ट कर देती हैं।
लोक गीत एवं शिष्टगीत के अन्तर को कुछ इस भाँति भी प्रकट किया जा सकता है-
1. लोक-गीतों में मानव हृदय की प्रकृत भावनाओं एवं विभिन्न राग वृत्तियों की अभिव्यक्ति होती है।
2. लोक-गीतों में भावों को प्रकट करने के लिए वाणी का जो आश्रय लिया जाता है, वह लयात्मक होता है।
3. लोक-गीतों में सामूहिक प्रवृत्ति अधिक व्यापक है। 4. लोक-गीतों का रचयिता अज्ञात होता है परन्तु शिष्ट-गीतों का रचयिता ज्ञात होता है।
व्यक्ति विशेष की रचनाएँ भी सामूहिक भावनाओं में ढलकर सामान्य हो जाती हैं।
5. लोक-गीतों में प्राचीनतम मानव सभ्यता एवं संस्कृति के विभिन्न चित्र अंकित रहते हैं पर शिष्टगीत आधुनिकता लिये होते हैं।
6. लोक-गीतों से मनोरंजन भी होता है पर आवश्यक नहीं कि शिष्टगीत से मनोरंजन हो।
उपर्युक्त विशेषताओं में भी लयात्मकता विषयक विशेषता ही शिष्ट-गीतों में पाई जाती है शेष नहीं। इस प्रकार संगीतात्मकता, लयात्मकता जैसी विशेषताओं में लोक गीत व शिष्ट-गीतों का साम्य है जबकि लोक-गीतों की अन्य विशेषताएँ शिष्ट गीतों से मेल नहीं खाती हैं।
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