लोक गीत : निर्माणक तत्त्व - Folk Songs: Constructive Elements
लोक गीत : निर्माणक तत्त्व - Folk Songs: Constructive Elements
रूप, लय, स्वरारोहण एवं स्वरावरोहण की दृष्टि से समानता रखने वाले गीत के भाग को 'झड़' कहते हैं। किसी भी लोक गीत का निर्माण चार या पाँच 'झड़ों' के मिलने से होता है। लोक-गीतों का निर्माण करने वाले तत्त्व इस प्रकार हैं-
1. अस्थायी गीत का आरम्भिक व प्रमुख अंग यही होता है। इसमें गीत का मुख्य भाग समाहित होता है। एक झड़ गाने के उपरान्त गीत के इसी अंग की पुनरावृत्ति की जाती है जिससे श्रोताओं पर गीत का स्थाई प्रभाव पड़ता है।
2. अंतरा स्थाई भाग से आगे गीत के मुख्य भाव की विवृति की जाती है। इस भाग को अंतरा कहते हैं।
3. लय लोक गीत का यही अंग या तत्त्व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। लोक गीत का रचयिता चूँकि अशिक्षित होता है अतः उसे छन्द, बंधों या गीतों की मात्राओं का ज्ञान नहीं होता है वह तो मात्र लय की रक्षा कर पाता है और उसकी यह लय ही लोक गीत में प्राण डाल देती है।
4. स्वरारोहण, अवरोहण एवं पुनरावृत्ति लोक गायक गीत में भावों का आवेग और आवेश उत्पन्न करने हेतु स्वरारोहण व स्वरावरोहण की सहायता लेता है।
स्वर को ऊँचा उठाना स्वरारोहण कहा जाता है व पुनः स्वर को उतारते हुए सामान्य या सम पर लाना स्वरावरोहण कहा जाता है। गीत में सौन्दर्य की सृष्टि करते हुए पुच्छ पदों की योजना व टेक अंग की पुनरावृति भी इसी अंग में की जाती है।
5. मिलान: यह झड़ का अन्तिम अंग है। यहाँ गाने के उपरान्त गीत के स्थाई अंग की पुनरावृति की जाती है । अन्तरा को समाप्त कर आरोह-अवरोह से गुजरने के पश्चात् गीत पुनः अपनी स्थाई की लय को प्राप्त करता है अतः इस भाग को मिलान कहा जाता है।
6. भरती : गीत की झड़ गाने के उपरान्त गीत के प्रभाव में निरन्तरता बनाये रखने हेतु कुछ पदों की योजना की जाती है, जिन्हें गीत का 'भरती' अंग कहा जाता है।
7. रंगत-विधान : श्रोताओं पर लोक गीत का प्रभाव छोड़ने के लिए गीत के मुख्य भाव को छन्द, परिवर्तन के साथ भावानुकूल छन्दों में गाया जाता है, जिसे रंगत-विधान कहते हैं। यह विधान परम्परा प्रवाही तथा रचित सभी तरह के लोक-गीतों में होता है।
8. मोड़ : एक झड़ को गाकर दूसरी झड़ गाने के लिए प्रवेश करने को मोड़ कहते हैं। एक ही झड़ के गायन में स्थाई से अन्तरा तथा अन्तरा से मिलान में प्रवेश करने को भी मोड़ कहा जाता है।
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