लोक गीत : विभिन्न प्रकार के लोक-गीतों का परिचयात्मक अध्ययन - Folk Songs: Introductory Study of Different Types of Folk Songs

लोक गीत : विभिन्न प्रकार के लोक-गीतों का परिचयात्मक अध्ययन - Folk Songs: Introductory Study of Different Types of Folk Songs


1. संस्कार गीत


भारतीय समाज में सोलह संस्कार माने जाते हैं। इन संस्कारों में से जन्म, विवाह व मृत्यु संस्कार के लोक-गीतों का प्रचलन अधिक है।


(1) जन्म संस्कार के गीत :


इन गीतों में नौ महीनों के दौरान गर्भिणी में जो-जो शारीरिक व मानसिक बदलाव आते हैं या प्रसव पीड़ा, प्रसवोपरान्त का हर्ष, सूरज-पूजन आदि प्रसंगों का कुशल चित्रण देखा जा सकता है।


पहलौ महीना जब लागिए, बाकी फूलु गहयो फलु लागिए ।

ए बाई दुजौ महीना जब लागिए । राजे तीजी महीना जब लागिए, बकौ खीर खांड मन आइए।


(2) विवाह संस्कार के गीत :


विवाह के गीत समस्त प्रकार के लोक-गीतों के अलंकरण कहे जा सकते हैं। इन गीतों में विनायक, मेंहदी, हल्दी, उबटन आदि गीत अधिक प्रसिद्ध हैं-


म्हारी हळदी रौ रंग सुरंग आ निपजै माळवे,


'मी' लावे बालक बणजी 'रा बाभौसा, माताजी रे अंग ख्लै, वारा माताजी चतुरसुजाण केसर कैवटे, बनडा थे हौ जी केसर जोग, हळदी रंग (अंग) चढै।


(3) जनेऊ के गीत :


इस संस्कार को भी विवाह जितनी ही धूमधाम से मनाया जाता है। एक भोजपुरी लोक गीत में यज्ञोपवीत धारण करने के अवसर पर बालक के शरीर पर हल्दी लगाते समय यह गाया जाता है-


पाँच सखी आ ही मीलिके हरदी चढ़ाव हमारा लाल के। बाहरो बाजन बजाइके, हरदी चढ़ाव हमरा लाल के ॥


(4) मरण संस्कार के गीत :


मरण चिर सत्य है। पकी उम्र में जब किसी की मौत होती है तो इस समय भजन, चेतावनियाँ आदि गायी


जाती हैं।


काया कैसे रोई, तज दीनी प्राण तज प्राण काया यूँ बोली, छोड़ गयो निर्मोही, मैं सोची काया साथ चलेगी, मल-मल धोई रे।


2. व्रत-गीत


भारतीय जनमानस में सदा से धर्म फलता-फूलता रहा है। विभिन्न देवी-देवताओं में आस्था रखना व श्रद्धा के साथ उनसे सम्बन्धित दिवस पर व्रत रखना व उसे निभाना, भारतीय जीवन का एक अभिन्न अंग माना जाता है। विशेषकर स्त्री समाज अपने पतियों की दीर्घायु व गृह सुख-शान्ति हेतु कई प्रकार के व्रत रखती हैं जिनमें प्रमुख व्रत हैं वह सावित्री, कजली व सावणी तीज, दशा माता, कार्तिक पूर्णिमा व्रत, एकादशी व्रत, करवाचौथ - व्रत आदि। करवा चौथ व्रत में गाये जाने वाला एक लोक गीत है-


उठा-उठौ सुलच्छना नारी।


बारे चंदा अरघ देओ, मनमानिक दिअना बारि । साँई जिये लाख बरिस, बिटना जीयें कोटि बरिस | अरध चंदा का सोहाग ।


3. श्रम-गीत


भारत भूमि में कर्म की महत्ता असंदिग्ध रूप से स्वीकार की गई है। कार्य करते समय जो भी गीत गाये जाते हैं वे श्रम-गीत के नाम से जाने जाते हैं। संगीत प्रेमी मानव-मन कार्य से होने वाली थकावट को मिटाने, एकाकीपन से उबरने या कार्य समय की सुदीर्घता को हल्का करने के उद्देश्य से ये गीत गाता रहा है। इन गीतों में 'पाँणत' (खेतों में पानी देना) रोपनी, सोहनी, निरवाही, कटनी, चक्की पीसना, कोल्ह के गीत प्रसिद्ध है। उदाहरणार्थ चरखे का एक गीत-


चरखा कातो मानो गाँधीजी की बतियाँ। विपतिया कीट जइहें ननदियाँ ॥


4. गीत


भारत वर्ष भाँति-भाँति की ऋतुओं वाला देश है। यहाँ सभी ऋतुएँ अपनी एक विशेष पहचान रखते हुए उल्लास का वातावरण सृजित कर देती हैं। इन लोक-गीतों में बारह मासा, चौमासा, फाग, बसन्त मल्हार, सावन ऋतु का विशेष उल्लेख मिलता है।


काळूडी कळायण ऊमड़ी ऐ पणिहारी जीये लो, ओ मिरगा नैणी जीये लो। मोटोड़ी छाँटा रौ बरसे मेह, बाला जो ॥


(1) फाग ऋतु:


आज बिरज में होरी रे रसिया।


बाजत ताल मृदंग झाँझ ढफ, और नगारे की जोरी रे रसिया ।


(2) मल्हार गीत :


सामन आयौ सुघड़ सुहागनों जी (एजी कोई) आयी है अजुब बहार,


धनिक रंगाइदै री अम्मा मेरी, सीकियाँ जी, पचरंगी छविदार।


5. जाति-गीत


वे गीत जो किसी जाति विशेष के लोगों द्वारा ही गाये जाते हैं, जाति-गीत कहलाते हैं। जैसे- 'विरहा' नामक गीत अहीरों द्वारा गाया जाता है।

सामान्यतः इस गीत को अहीर लोग जिस भाव-भंगिमा व मधुरता से गाते हैं, कोई और नहीं गा सकता है। 'पचरा' गीत प्रायः दुसाध जाति के लोग गाते हैं। यह गीत अपनी चिकित्सकीय विशेषता से जाना जाता है। इसी प्रकार 'आल्हा' गीत भी वर्षा ऋतु में विशेष जाति द्वारा गाया जाता है तो साँई नाम से प्रसिद्ध गेरु वस्त्रधारी साधु गोपीचंद और भरथरी के गीत गाते हैं। 'माली' जाति के लोग माता के गीत गाते हैं। 'निहाल दे गीत' को कुछ विशेष जाति के गायक गाकर अपना गुजर बसर करते हैं। समय के बदलाव के साथ गीत गायन की पद्धति बदली है। अब लोक गीत किसी भी जाति द्वारा गाये जाने लगे हैं-


सावण ती लागी पिया, भादवी जी


काँई बरसण लागौ मेह,


अब घर आयजा, गौरी रा बालमा हो जी।