लोक नाट्य परम्परा एवं प्रविधि - folk theater tradition and technique
लोक नाट्य परम्परा एवं प्रविधि - folk theater tradition and technique
लोक नाट्य की परम्परा के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि वेदों की परम्परा ही लोक नाट्यों का मूल स्रोत है तो दूसरा वर्ग इनके बीज रामायण और महाभारत के उन गायकों में बाते हैं जिन्हें 'पाठक' और 'धारक' की संज्ञा से पुकारा जाता है। इन विद्वानों ने रामलीला और रासलीला के प्रेरक स्त्रोत भी इन्हीं गायकों को माना है। कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि लोक नाटक ही संस्कृत नाटकों की प्रेरणा रहे हैं।
डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार "हिन्दी नाट्य परम्परा का मूल स्रोत यह वन नाटक ही है जो 'स्वांग आदि नाम से प्राचीन रूप में अब तक विद्यमान है।
डॉ. श्याम परमार के अनुसार "मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के समय उत्कृष्ट रंगमंच के अभाव में लोकमंच को ही विकसित होने का अवसर प्राप्त हुआ। भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्तों ने लोक नाट्य शैली को अपनाकर गीति नाट्य परम्परा को प्रश्रय दिया।"
सदियों पुरानी इस लोक नाट्य परम्परा ने अपने उस उच्च स्तर को प्राप्त किया है कि आज भी उत्सवों, पर्वो या आनन्द के क्षणों में यह लोक नाट्य भारत के प्रत्येक प्रदेश में प्रदर्शित होते देखे जा सकते हैं। जैसे - ब्रज और हरियाणा के स्वाँग, ब्रज की रासलीला, हिमाचल का करिमाला, मिथिला का कीर्तनिया, आसाम का अकिया भोजपुरी की रामलीला, महाराष्ट्र का तमाशा, गुजरात का भवाई, बिहार का विदेसिया, राजस्थान का ख्याल आदि।
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