हिन्दी बोलियों की लोक-परम्परा - folk tradition of Hindi dialects

हिन्दी बोलियों की लोक-परम्परा - folk tradition of Hindi dialects


भाषा के उद्भव में श्रम-परिहरण सिद्धान्त जितना सच है, उतना ही सच है श्रमिक लोगों के स्वतः स्फूर्त स्वरों द्वारा लोक-गीतों की रचना का होना । वस्तुतः श्रम को आनन्द की कोटि तक पहुँचाने की दिव्य यात्रा ही लोक परम्परा है । अपने-अपने कार्य में जुटे लोगों के कण्ठ से ही लोक गीत का अति लघुरूप सर्वप्रथम फूटा होगा । वस्तुतः तो यह लोक उद्गार है जो लोक गीत, लोक गाथा, लोक नाट्य आदि विभिन्न रूपों में प्रस्फुटित हुआ है। जब नगरीय सभ्यता से थके-हारे शिष्ट लोगों को इस लोक-साहित्य ने अपनी ओर आकर्षित किया होगा तभी से इसे लिपिबद्ध करने का विचार जन-मन में आया होगा और लोककण्ठ से प्रस्फुटित मधुर स्वर ने लोक साहित्य का रूप धारण किया होगा।

यह इसलिए कि साहित्य शब्द आते ही लिखित परम्परा का रूप ही अर्थ का आकार ग्रहण करता है। गाँव जब शहरी सभ्यता के सम्पर्क में आया तो वह मजबूर (वर्कर) बन गया और उसके पसीने में ग्रीस लगकर यह सब तहस-नहस हो गया। अन्यथा जगत् विदित है कि इस लोक गीत परम्परा ने लोगों में जो रागात्मक सम्बन्ध जोड़ा है वह जुड़ाव किसी प्रवचनकारी विद्वान् के द्वारा कभी सम्भव नहीं था।


लोक में यथार्थ का पुट रहता है। उसमें मानव हृदय की सभी भावनाएँ अभिव्यक्ति पाती हैं। उसे सुनने वाला श्रोता एक लघु समाज ही होता है। जहाँ दोनों के मध्य एक ही नाता रहता है,

स्वर और आनन्द का । लोकसंगीत का ताना-बाना भी श्रम के अनुपात में श्वासों के आरोह-अवरोह द्वारा बुना जाता है। जाँता (चक्की) पीसती औरतों की लय गति, उसकी घर्र-घर्र और शारीरिक घुमाव भी इन लोक-गीतों में प्रयुक्त हैं जिसे 'जंतसार' कहते हैं। श्रम के अनुसार ही गीतों के विभिन्न भाव और रंग होते हैं। स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों का लगाव जुड़ाव, प्रेम-वियोग, मन-मुटाव, मान, व्यंग्य, हँसी, परिहास सब कुछ कच्चे कोरे धागे के समान विद्यमान रहता है।


लोक-साहित्य के मुख्यतः दो रूप हैं- लोक गाथा तथा लोक गीत । लम्बे आख्यान वाले काव्य को लोक गाथा तथा मुक्तक काव्य को लोक गीत कहते हैं।

जहाँ शिष्ट साहित्य का सम्बन्ध अभिजात्य वर्ग से है वहीं लोक-साहित्य का सीधा सम्बन्ध सामान्य जन से है इसीलिए इसकी भाषा लोकभाषा है। जनसामान्य के मनोरंजन, हास - विलास इसी लोकभाषा में होते हैं। लोकजीवन की अनभूतियों और संवेदनाओं को जिस रूप में व्यक्त किया गया है उसी को लोक साहित्य कहा जाता है।


सर्वसामान्य लोग जो कुछ भी सोचते हैं, अनुभव करते हैं, चिन्तन-मनन करते हैं, उन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति लोक-साहित्य में होती है।

यह जीवन के विभिन्न संस्कारों और परिवर्तित ऋतुओं पर गीत गाम्गाकर अपने लोकजीवन का मनोरंजन करता है। समय-समय पर कही जाने वाली लोकोक्तियों में ग्रामीणजन के हृदयगत विचारों और भावाभिव्यक्तियों को देखा जा सकता है। सामान्य व सहज स्वभाव वाली जनता के रागात्मक अनुभूतियों का प्रकाशन ही लोक-साहित्य है। इसीलिए जब भिखारी ठाकुर को शेक्सपियर की उपाधि दी जाती है तो इसमें मान शेक्सपियर का ही बढ़ता है। लोक-साहित्य की प्रमुख पाँच विधाएँ हैं-


1. लोक गीत ( मुक्तक रूप में)


2. लोक गाथा (प्रबन्धात्मक काव्य रूप में)


3. लोक कथा ( मौखिक कथाएँ)


4. लोक नाट्य (नौटंकी आदि)


5. प्रकीर्ण साहित्य अथवा लोकसुभाषित (लोकोक्तियाँ, मुहावरे, पहेलियाँ, खेलगीत आदि)


लोक-साहित्य का अर्थ है, 'वह साहित्य जिसे लोक ने रचा।' ऋग्वेद में लोक के लिए 'जन' शब्द का प्रयोग हुआ है इसीलिए लोक-साहित्य सर्वसाधारण का साहित्य है।

मनुष्य कितने भी विकसित समाज को गढ़ ले, उसका आदिम नाता लोक-साहित्य से होता ही है। वैसे लोक का व्यापक अर्थ भी है 'तीन लोक चौदह भुवन' एक विशेष प्रकार के वायुमण्डल में रहने वाले समुदाय को भी लोक कहते हैं, जैसे 'धरतीलोक'। इसकी व्यापकता धरा के इस कोने से लेकर आखिरी छोर तक है। अतः यह 'लोक' अनेक प्रकार से विस्तृत है। हर वस्तु में इसकी व्याप्ति है। प्रकृति और मनुष्य का आदि इतिहास जो भी बनता होगा वही इस 'लोक' शब्द एवं लोक-साहित्य का इतिहास होगा । यह प्रत्युत्पन्नमति जैसा नहीं है। इसकी जड़ें बड़ी गहरी हैं। यह वस्तुतः मानव का ऐतिहासिक दस्तावेज है।


आज जब कि मानव मूल्यों का हास तीव्रता से हो रहा है, ऐसे में सम्भव है कि लोक-साहित्य के कच्चे धागे हमें मानवीय बन्धनों में पुनः बँधने के लिए विवश कर दे। यदि गम्भीरतापूर्वक क्षेत्रीय सर्वेक्षण अध्ययन द्वारा भारत की जनपदीय लोक-साहित्य की तुलना समूचे विश्व साहित्य से की जाएगी तो ज्ञात होगा हम सब एक ही आत्म-बन्धन में बँधे हुए हैं। यह लोक-साहित्य हमें षड्विकारों से दू रखते हैं। ये हमारी मुक्ति का सहज मार्ग हैं। समाज की जिन समस्याओं से वैचारिकी मुठभेड़ करती हुई दिखाई देती है उन्हीं समस्याओं का बोधगम्य समाधान लोक-साहित्य में होता है। भाषा की शिष्टता को छोड़ दें तो हिन्दी साहित्य की छायावादी कविताएँ इसका प्रमाण हैं।


भाषा बनने की प्रक्रिया में लोक-साहित्य का महत्त्वपूर्ण योगदान है। पाणिनी ने भी 'लोक' की सत्ता को माना है। शब्दों की व्युत्पत्ति में वेद तथा लोक व्यवहृत स्वरूपों का पृथक्-पृथक् वर्णन किया है। भरतमुनि ने तो नाटक की लोकधर्मी प्रवृत्ति का विस्तृत उल्लेख किया है। प्राचीन ग्रन्थों की रचना लोकधर्मी ही रही है चाहे महाभारत हो या गीता के उपदेश । तुलसी ने अपनी सर्वोत्कृष्ट रचना 'मानस' लोक को ही सुपुर्द की है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी रचनाओं में 'लोक' शब्द का व्यापक प्रयोग किया है। 'लोक' शब्द ही कालान्तर में लोग बना गया । साहित्य में लोक विशेषण रूप में प्रयुक्त हआ है। लोक की ऐतिहासिक यात्रा कुछ इस प्रकार है-


1. भारतीय साहित्य में 'लोक' शब्द प्राचीनकाल से ही प्रयुक्त होता रहा है। लोक का सर्वग्राह्य अर्थ है, 'सम्पूर्ण जनमानस' ।


2. ऋग्वेद में लोक शब्द का प्रयोग जन के लिए हुआ है।


3. पुरुषसूक्त में लोक स्थान तथा प्राणियों के पर्याय के रूप में लिया गया है।


4. अथर्ववेद में यह 'लोक' दो रूपों में है- 'इहलोक' और 'परलोक' ।


5. उपनिषदों में लोक का व्यापक अर्थ है। प्रत्येक वस्तु में निहित और प्रयास करने पर भी जो अप्राप्य हो


उसे इस रूप में वर्णित किया गया है।


6. 'महाभारत' और 'भगवद्गीता' में भी 'लोक' शब्द का प्रयोग हुआ है। हरिवंशराय बच्चन ने भी 'क्या


भूलूँ क्या याद करूँ' में लोकशील की बात कही है।