लोक-साहित्य और संस्कृति - Folklore and Culture

लोक-साहित्य और संस्कृति - Folklore and Culture


लोक-साहित्य में लोक-संस्कृतियों के अवशेष निहित रहते हैं। 'संस्कृति' शब्द का अर्थ है 'परिष्कार करना', 'संशोधन करना', 'श्रेष्ठ बनाना' आदि। अंग्रेजी में इसे 'कल्चर' कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुधारना' या 'उत्पन्न करना' । जातीय संस्कारों की समष्टि का नाम ही संस्कृति है ।


संसार के हर जाति की भाषा का स्वयं का एक लोक-साहित्य होता है जो मौखिक होता है। यह लोक- साहित्य एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को मौखिक परम्परा से ही प्रदान की जाती है। इसमें रचनाकार अज्ञात होता है। यह अभिव्यक्ति सहज और स्वाभाविक होने के साथ ही परिवर्तनशील भी होती है।

यह लोक का हृदय पक्ष है जिसमें मूल्यवान् विचार भी हैं। इसमें लोक जनजीवन स्पन्दित होता है। इसमें बाल- शिशुओं की अल्हड़ नींद है, तरुणियों की भाव लहरियाँ हैं, विरहणी की सिसकियाँ हैं, समाज की कुरीतियों पर करार प्रहार भी है, लोक- मनोरंजन है, समूह की वाणी है किन्तु आप्त वचन नहीं है। इसका प्रवाह झरने और वायु की तरह स्वछन्द होता है। बन्धन से इसकी प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। शिष्ट और लोक-साहित्य में यह एक मौलिक अन्तर है। इसकी रचना को प्रत्येक जनसमूह अपना मानता है। भले ही किसी एक ने उसे रचा हो पर वह रचना भावाभिव्यक्ति के लिए सबका साधन बनती है। लोक-साहित्य रचना का प्रत्येक शब्द, लय, तुक, लहजा लोक का अपना है।


आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार "जो चीजें लोक-चित्त से सीधे उत्पन्न होकर सर्व साधारण को आन्दोलित, चालित और प्रभावित करते हैं, वे ही लोक-साहित्य, लोकशिल्प, लोक नाट्य, लोक कथानक आदि नामों से पुकारी जा सकती हैं।" वस्तुतः लोकसाहित्य रचनाकाल की सहजावस्था है जिसमें साधारणीकरण द्वारा रसनिष्पत्ति के साथ-साथ विकारों के विरेचन का कार्य भी निष्पन्न होता है। मनचक्षु द्वारा चित्त से भाव-विभोर होकर अक्षर ज्ञान के बिना जो रच दिया गया, वह लोक-साहित्य है।


संस्कृति परिष्कृत आचरण से बनती है। आचरण में विकार आ जाने से वह संस्कृति नहीं रह जाती रूढ़ि बन जाती है। रूढ़ियों को फेंककर जो नवीन वस्तु अपनायी जाती है

वही समाजोपयोगी संस्कृति बनती है। इसी से संस्कारित होकर मनुष्य का निजी जीवन तथा सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। इस संस्कृति से व्यष्टि या समष्टिरूप में मुक्ति पाना सम्भव नहीं है। किसी कारणवश यदि विपरीत परिवेश में इससे मुक्त हो भी जाएँ तब भी अनुकूल वातावरण मिलते ही यह फिर से उभर आती है। धर्म और संस्कृति दोनों में प्रायः यही संस्कार होता है। धर्म की व्यापकता के कारण ही वह समूचे समाज को अनुशासित करता है। धर्म व्यापक है क्योंकि धर्म देश व्यापक है और संस्कृति देश सापेक्ष है अतः लोक वार्ता (Folklore) और संस्कृति में कोई अन्तर नहीं माना जा सकता। हिन्दी लोर के लिए लोक-संस्कृति सटीक, उपयुक्त एवं समीचीन शब्द है।

लोक संस्कृति 'हिन्दी लोर' के व्यापक और विस्तृत अर्थ को व्यक्त करने में सक्षम है। साथ ही यह शब्द अव्ययादि दोष से मुक्त है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय दोनों में कोई अन्तर नहीं मानते। हिन्दी में लोक संस्कृति चिर-परिचित शब्द है। इसके उच्चारण मात्र से ही जनजीवन का चित्र, उनके संस्कृति की झाँकी आँखों के सामने उपस्थित हो जाती है इसलिए लोक वार्ता, लोकायन, लोकवान जैसे अपरिचित शब्दों का निर्माण कर उसे प्रचलित करना तर्कसंगत नहीं है। हिन्दी लोर और हिन्दी कल्चर दोनों एक दूसरे की सीमाओं को स्पर्श करती हैं।


"भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान में अखिल भारतीय लोक संस्कृति सम्मेलन के विद्वानों ने भी हिन्दी लोर के लिए लोक संस्कृति शब्द का ही प्रयोग किया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का भी यही सुझाव है । डॉ० उपाध्याय ने लिखा है कि हिन्दी में 'लोक वार्ता' शब्द ने जो अव्यवस्था और गड़बड़ी पैदा कर दी है वह लोक संस्कृति शब्द के प्रयोग से सदा के लिए नष्ट हो जाएगी तथा लोक-साहित्य एवं लोक संस्कृति के पर्याय को सरलता से समझा जा सकेगा।


संस्कृत में सम्यक् कृति ही 'संस्कृति' है, वही सम्भूय कृति भी है। मनुष्य की व्यक्तिशः कृति ही सामूहिक रूप से करने पर 'सम्भूय कृति' बन जाती है।

अज्ञेय कहते हैं- "यह दीप अकेला मदमाता, इसको भी पंक्ति को दे दो।" जब व्यक्ति और समूह दोनों जिस समय सम्यक् कृति होते हैं, वह मानव को अति विशिष्ट मानव बना देते हैं और संस्कृति शब्द अतिव्यापक अवधारणा का परिचायक हो जाता है, जिसमें समस्त धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, कला, सामाजिक और राजनैतिक प्रथा तथा संस्थाएँ आ जाती हैं लेकिन यही संस्कृति शब्द जब लोक विशेषण बन जाता है तो इसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से लोकजीवन से हो जाता है और यह उस सभ्य और शिष्ट समाज का बोध कराती है जो कृत्रिमता, साज-सज्जा रहित सीधी-सादी, सामान्य, सरल जीवन जीने को अभ्यस्त होती है। इतना ही नहीं, संगीत और वाद्य के साथ झंकृत होकर जब जीवन अगणित तरंगों में बहा और अगणितकण्ठों से स्वर फूटा,

वह सब आत्मप्रकाश प्रदायनी समष्टिगत रूप में 'लोक संस्कृति है। एक और बात ध्यातव्य है कि 'लोक संस्कृति' शब्द अतिगाम्भीर्य अर्थ वाला है। ऐसे में लोक वार्ता का सटीक शब्द 'लोक मुखरित स्वर' ही है। जहाँ लोक वार्ता एकांगी अर्थ व्यक्त करता है वहीं 'लोक मुखरित स्वर' समुच्चयबोधक लगता है। शिष्ट साहित्य जब स्वयं में शुष्ट लगने लगता है तो उसे वापस लौटकर अपने 'लोक स्रोत' के पास आना ही पड़ता है अतः लोक संस्कृति में लोक और उसके भौतिक वातावरण से पुष्ट परिवर्धित विचार है और किसी भी देश की यह मौलिक धरोहर भी है। बाबू गुलाबराय ने शिष्ट और लोक संस्कृति पर ठीक ही लिखा है- "बात सोलह आना ऐसी नहीं है जिस सभ्यता का आधार संस्कृति में नहीं है, वह सभ्यता सभ्यता नहीं है। संस्कृति की आत्मा के बिना सभ्यता का शरीर शव की भाँति निष्प्राण रहता है।" विनय और शील के बिना कटी-छटी पोशाक, सुसज्जित बंगले, क्रीम, सेंट और पाउडर मनुष्य को सभ्य नहीं बना सकते। अर्थात् विनयशील त्याग, धैर्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, ज्ञान, सत्य आदि शिष्टाचार ही शिष्ट संस्कृति हैं।