लोक-साहित्य और अन्य समाज विज्ञान - Folklore and other social sciences

लोक-साहित्य और अन्य समाज विज्ञान - Folklore and other social sciences


लोक मानस की समस्त अभिव्यक्ति एवं जीवन के सभी पक्षों को लोक-साहित्य में देखा जा सकता है। आदिम मानव का स्वरूप इसमें विद्यमान है अतः आवश्यक है कि लोक-साहित्य के अन्य सामाजिक विज्ञानों और कलाओं से इसके सम्बन्धों का अध्ययन किया जाए।


लोक-साहित्य और पुरातत्त्व विज्ञान


पुरातत्त्व-विज्ञान मानव के जीवन, उसके रहन-सहन, आवास, भोजन, उपयोगी उपकरण, प्रथाएँ, रीति- रिवाज, विश्वास, उत्सव, मेले, देवी-देवताओं के स्वरूप, मन्दिर, वास्तुकला, पच्चीकारी और विभिन्न कलाओं का अध्ययन करता है । लोक-साहित्य द्वारा पुरातत्त्व वेत्ताओं को पुरातत्त्व की विलुप्त कड़ियों को जोड़ने का मार्ग मिल गया।

लोक-साहित्य के गर्भ में मानव इतिहास के ऐसे-ऐसे तथ्य छिपे हैं जिनके माध्यम से पुरातत्त्व विभाग सही दिशा प्राप्त कर सकता है। लोक-साहित्य की विविध विधाओं में पुरातत्त्व की महत्त्वपूर्ण सामग्री विद्यमान है। इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ने के लिए लोक-साहित्य उपयोगी हो सकता है। भविष्य में इतिहास लिखने के लिए लोक-साहित्य की यह सामग्री सहायक होगी। लोक-साहित्य में इतिहास का तटस्थ यथार्थ है। इसको जानने के लिए जहाँ इतिहास मूक है वहाँ यह लोक-साहित्य तिमिराछन्न स्थिति में प्रकाश प्रदान कर सकता है। डॉ० सत्येन्द्र का कहना है - "उधर लोक वार्ता के अध्ययन के लिए पुरातत्त्व और इतिहास बड़े सहायक हैं। लोक वार्ता में अनेक नाम और घटनाएँ होती हैं, अनेक तथ्य और सूचनाएँ रहती हैं। उनमें अनेक निर्माण स्तर होते हैं। इन सबका उद्घाटन इतिहास और पुरातत्त्व द्वारा ही होता है।" (लोक-साहित्य विज्ञान, पृ. क्र. 71)


लोक-साहित्य और इतिहास


इतिहास के कई तथ्यों का भण्डार लोक-साहित्य में विद्यमान है। लोक-साहित्य में लुप्त सामग्रियों की सहायता से इतिहास लिखा जा सकता है। ऐतिहासिक घटना के अभाव में लोक-साहित्य एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है। पुरातत्त्व विभाग जब असमर्थ हो जाता है तो इतिहास की सहायता लोक-साहित्य ही करता है। किसी स्थान या जनपद की लोक कथाएँ, लोक गीत, किंवदन्तियाँ वहाँ के इतिहास को अपनी झोली में धारण किये रहते हैं। लोकजीवन की जो बातें लोक-साहित्य में अभिव्यक्त होती हैं उनका उपयोग इतिहासकार दो रूपों में करता है - (1) इतिहास के तथ्यों का सूत्र प्रदान कर (2) लोकजीवन की सम्पूर्ण जानकारी लेकर। लोक-साहित्य की कथाओं में यथेष्ट ऐतिहासिक मूल्य होता है। लोक-साहित्य में वर्णित मानव और विश्व की जिज्ञासा को सुलझाने वाली विषयवस्तुएँ होती हैं

जो इतिहास को दिशा प्रदान करती हैं। कर्नल टॉड की प्रसिद्ध रचना 'एलंस राजस्थान' लोक वार्ता के आधार पर ही लिखी गई है। 1857 की क्रान्ति, सिपाही विद्रोह, महात्मा गाँधी के राष्ट्रीय आन्दोलन आदि से सम्बन्धित बहुत से ऐतिहासिक महत्त्व वाले लोक गीत मिलते हैं जिनमें शुद्ध रूप से जनभावना का उद्गार है।


लोक-साहित्य और भूगोल


लोक-साहित्य में विभिन्न रूपों में भूगोल की सामग्री होती है, जैसे अनेक जनपदों के नाम उनकी प्राचीन सीमाएँ, नदियाँ, नगर, प्रदेश राजधानी, व्यावसायिक केन्द्र आदि के नाम लोक-साहित्य में मिलते हैं। आज तो कई वनों,

मार्गों, नगरों, उपनगरों के नामों का लोप हो चुका है। वे भी लोक-साहित्य के गीतों में उपलब्ध हो जाते हैं। इन सामग्रियों के आधार पर भूगोल का शोधार्थी अनेक दिशाओं में शोध कार्य कर सकता है। इससे ज्ञान के कई बंद दरवाजे खुल जाते हैं। एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों का आवागमन, नदियों, पर्वतों को पार करना इन साधनों का ज्ञान भी लोक-साहित्य के माध्यम से सरलता से पाया जा सकता है। भोजपुरी लोक गीतों में गंगा, यमुना, सरयू, सोन और तमसा आदि नदियों के नाम उपलब्ध होते हैं। नगरों में काशी, प्रयागराज, पटना, बम्बई, दिल्ली, अयोध्या, जनकपुरी, कामरूप आदि नाम लोक गीतों में उपलब्ध होते हैं। 'आल्हा' लोक गाथा में महोबा, नौगढ़, कजरीवन, दिल्ली आदि का वर्णन है।


लोक-साहित्य और समाजशास्त्र


समाजशास्त्र वर्तमान समाज की विभिन्न जातियों अथवा समुदायों की प्रथाओं, रीति-रिवाज का अध्ययन करता है। लोक-साहित्य में सामाजिक रूढ़ियों, अन्धविश्वासों, देवी-देवता आदि वर्ण्य विषय हैं अतः इन दोनों में गहरा अन्तरसम्बन्ध है। लोक-साहित्य में मानव जीवन का यथातथ्य वर्णन रहता है जिसका आधार लेकर समाजशास्त्र का अध्ययन किया जा सकता है। लोक-साहित्य अतीत और वर्तमान दोनों ही सभ्यताओं और संस्कृतियों का विश्लेषण करता है जिसके आधार पर मानव जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला जा सकता है। वनों में रहने वाले तथा पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाली अनेक आदिम जातियों का अध्ययन लोक-साहित्य के आधार पर यथेष्ट किया जा सकता है।

लोककवि के समक्ष मानव जीवन का यथार्थ रूप रहता है इसलिए वह जो कुछ भी रचता है, जनसमुदाय की सामूहिक भावना उसमें सम्मिलित रहती है क्योंकि रचनाकार को अज्ञात रहना होता है इसलिए वह स्वाभाविक अभिव्यक्ति करता है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने ठीक ही कहा है- "लोक- साहित्य में जनजीवन का जितना सच्चा और स्वाभाविक वर्णन उपलब्ध होता है उतना अन्यत्र नहीं।" सच तो यह है कि यदि समाज का वास्तविक चित्र देखना अभीष्ट हो तो उसके लोक-साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। उन लोक गीतों, गाथाओं और कथाओं में मनुष्य के रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान, रीति-रिवाज का सच्चा चित्र देखने को मिलता है। लोकसत्य के परे कोई अन्य सत्य भला कैसे हो सकता है !



लोक-साहित्य और भाषाविज्ञान


लोक-साहित्य में जो अनगढ़ से शब्द होते हैं जिनके कारण लोककवि की अभिव्यक्ति अतीव सजीव दिखाई देती है। यही शब्द भाषाविज्ञान के अध्ययन की बुनियादी आवश्यकता है। किसी भी भाषा के शब्द, पद, ध्वनि, अर्थ और वाक्य का अध्ययन भाषाविज्ञान में होता है। लोक-साहित्य में प्रयुक्त शब्द, पद, ध्वनि, अर्थ और वाक्य के आधार पर भाषाविज्ञान का अध्ययन समुचित प्रकार से किया जा सकता है, जैसे किसी बोली के लोक- साहित्य में परिनिष्ठित भाषा या अन्य बोलियों के शब्दों, प्रयोगों एवं व्याकरणिक श्रेणियों के स्तर पर मिश्रण हो तो शुद्धता का निर्णय करने के लिए भाषाविज्ञान अध्ययन सहायक हो सकता है। इसी प्रकार लोक-साहित्य में प्रयुक्त भाषा की अनेक गुत्थियाँ भाषाविज्ञान की सहायता से सुलझायी जा सकती है अतः दोनों की परस्पर निर्भरता बनी रहती है और दोनों एक दूसरे के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।


लोक-साहित्य और मानव विज्ञान (नृ-विज्ञान )


मानवविज्ञान द्वारा विश्व के सभी समुदाय के मनुष्यों का अध्ययन किया जाता है। मानवजाति का विकास, उसका कार्य-कारण स्वरूप और तत्त्वों के अध्ययन की सामग्री लोक-साहित्य में मिलती है। डॉ० सत्येन्द्र ने ठीक ही लिखा है- "नृ-विज्ञान, शरीर और रक्त की परम्परा का अध्ययन करता है तो लोक वार्ता या लोक-साहित्य उस शरीर की वाणी का ।" लोक वार्ता में लोकतत्त्वों के वर्गों को समझने और उनके ऐतिहासिक कालांकन के लिए एंथ्रोपोलोजी या + विज्ञान के बिना काम नहीं चल सकता है। लोकतत्त्वों में जातीय लोक मानस व्याप्त रहता है। दोनों का कार्य एक-दूसरे के बिना सम्भव नहीं है।


लोक-साहित्य और मनोविज्ञान


मनोविज्ञान मानव मन की प्रक्रियाओं के अध्ययन का विज्ञान है और लोक-साहित्य में भी लोक और रचनाकार की मनोदशाओं, आशाओं तथा निराशाओं की अभिव्यक्ति है अतः इसमें समाज की मनोदशा को देखा जा सकता है। लोक-साहित्य में दाम्पत्य जीवन की मनोदशा का यथार्थ चित्रण देखा जा सकता है अतः दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। हालाँकि ये पद्धतियाँ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में प्रमाणित नहीं मानी जाती हैं।


लोक-साहित्य और धर्मशास्त्र


धर्म का आधार है समाज और समाज का संचालन धर्म करता है। दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े रहकर एक-दूसरे की रक्षा करते हैं।

स्वयं धर्म की प्रतिष्ठा लोक विश्वास पर आश्रित है। धर्म और पुराणों की अधिकांश गाथाएँ लोक-साहित्य में विद्यमान हैं। ईश्वर के अवतारों का वर्णन भी लोक-साहित्य में किया गया है। सूर्य, राम, कृष्ण, शीतला मईया, गंगा मईया, शिव-पार्वती, दुर्गा, काली, जगदम्बा, हनुमान आदि सम्पूर्ण रूप से लोक- साहित्य में द्रष्टव्य हैं।


लोक-साहित्य और चिकित्साशास्त्र


मानव जाति का आदिम जीवन प्रकृति के बेहद निकट का था। वह प्रकृति को जिज्ञासा भरी दृष्टि से भी देखता था और प्राकृतिक घटनाओं का अनुभवी साक्ष्य भी बन रहा था।

इस निरीक्षण में उसने चिकित्सा सम्बन्धी अद्भुत जानकारियाँ प्राप्त कीं । जब लोककवि पीपल में वासुदेव का दर्शन करता है तो परोक्ष रूप से वह वासुदेव की नहीं, पीपल की महिमा को मण्डित करता है और आज विज्ञान उसी बात का अध्ययन करके पीपल को सर्वाधिक प्राणवायु प्रदान करने वाला वृक्ष बता रहा है। लोक-साहित्य में रोगों का उपचार, झाड़-फूँक, जड़ी- बूटियों के गीत और नाम भी विद्यमान हैं। नीम के पेड़ में माता का निवास है। माता जो हर प्रकार से रक्षा करती है, यहाँ नीम और माता का निवास स्थान समान है। दोनों के गुणधर्म एक हैं। गर्मियों में चेचक आने पर नीम के पत्तों पर सुलाना तथा आसपास नीम के पत्तों से युक्त टहनियों को रखना एकमात्र उपचार है शरीर को शीतल करने के लिए।

आदिवासी लोगों में अनेक प्राकृतिक उपचार तथा जड़ी-बूटियों का ज्ञान लुप्त हो रहा है। इस लुप्त ज्ञान को लोक-गीतों में नाम सहित जाना जा सकता है। शिव को बेलपत्र चढ़ता है जो औषधीय गुण से भरपूर है। यह पेट के असाध्य रोगों को भी दूर करता है। भारतीय संस्कृति को नीम, पीपल और तुलसी के बिना विश्लेषित ही नहीं किया जा सकता है।


लोक-साहित्य और संगीत


संगीत का अर्थ है- गीत के साथ रहना। संगीत में स्वर का आरोह-अवरोह रहता है, जो गीत को गति प्रदान करता है। शिष्ट जनों में सहजता के स्थान पर संकोच का आवरण रहता है जबकि लोक में यह सहज प्रवृत्ति प्रबल होती है

इसीलिए यह नित-नूतन लगती है। लोक-साहित्य के अन्तर्गत 'लोक गीत' संगीत शास्त्रियों का मार्गदर्शन तो करता ही है, साथ ही, प्रेरणास्रोत भी बनते हैं। ताल, तुक, लय और धुन आदि की दृष्टि से नए-नए अविष्कार करके उसे शिष्ट साहित्य में जिस प्रकार का आदान-प्रदान होता है उसी प्रकार संगीतशास्त्र के साथ भी होता है। लोक-साहित्य से प्रेरित अनेक राग-रागिनियों से संगीतशास्त्र समृद्ध हुआ है। फिल्मों ने लोक-साहित्य को बहुत आधुनिक बना दिया है। दोनों ने एक-दूसरे से लिया और दिया है। इस प्रकार लोक-साहित्य की उपयोगिता और अध्ययन के सन्दर्भों का महत्त्व समझा जा सकता है।


लोक-साहित्य और पाठानुसन्धान


प्राचीन ग्रन्थों के पाठानुसन्धान के लिए अनेक शब्दों अन्तर्कथाओं में प्रयोग किये गए नामों, प्रवृत्तियों आदि की जानकारी और परिचय आवश्यक होता है क्योंकि अनेक शब्दों के प्राचीन रूप विषयक ज्ञान का स्रोत एकमात्र लोक-साहित्य होता है। चूँकि अनेक शब्द प्रचलन के बाहर हो जाने के बाद भी लोक-साहित्य के भण्डार में सुरक्षित रहते हैं। भाषाविज्ञान के लिए जिस प्रकार लोक-साहित्य का उपयोग किया जाता है। उसी रूप में यह पाठालोचन तथा पाठानुसन्धान के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता है।