लोक वार्ता (FOLKLORE) और लोक-साहित्य - Folk talk (FOLKLORE) and folklore
लोक वार्ता (FOLKLORE) और लोक-साहित्य - Folk talk (FOLKLORE) and folklore
डॉ॰ वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'हिन्दी लोर' का हिन्दी पर्यायवाची शब्द लोक वार्ता वैष्णव सम्प्रदाय में प्रचलित चौरासी वैष्णवों की वार्ता तथा दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता शब्द के आधार पर किया है। यद्यपि अंग्रेजी में इसके सम्बन्ध में कहा गया है- Folklore means the traditions and facts related to a given subject like popular superstition, tales, traditions or legends, अर्थात् हिन्दी लोर किसी भी दिए हुए विषय सम्बन्धी रीति-रिवाज, तथ्य, लोकविश्वास, कथाएँ, धरोहर या विरासत को कहा जाता है। प्रत्येक शब्द की अपनी एक संस्कृति होती है और उसका अर्थ उसी संस्कृति की धरती की निष्पत्ति होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में देवेन्द्र सत्यार्थी ने ठीक ही लिखा है- "लोक वार्ता शब्द नया नहीं है परन्तु उसका वर्तमान प्रयोग अवश्य नया है।
लोक वार्ता शब्द अंग्रेजी के हिन्दी लोर से कहीं अधिक अर्थपूर्ण है। जनता जो कुछ युग-युग से कहती और सुनती आयी है अर्थात् मौखिक परम्परा की समूची सामग्री, वह सब लोक वार्ता के अन्तर्गत आ जाती है। "
मेक एडवर्ड लीच ने लिखा है कि- "लोक वार्ता एक संज्ञानात्मक शब्द है जो किसी भी एक जातीय कृत्रिमता विमुक्त जनसमूह के समग्र संचित ज्ञानभण्डार अर्थात् उसका रीति-रिवाज, लोकविश्वास, लोक परम्पराओं, लोक कथाओं, जादू-टोना की क्रियाओं,
लोकोक्तियों, लोक गीत इत्यादि का परिचायक है जो कि न केवल उसे साधारण भौतिक बन्धनों से परस्पर आबद्ध करता है बल्कि जिसके बीच भावात्मक एकता के सूत्र भी हैं जो उनकी हर अभिव्यंजना को न केवल अपने रंग में अनुरंजित कर लेते हैं, बल्कि उन्हें निराली और निजी विशिष्टता ही प्रदान करते हैं। "
गाम्बे ने हिन्दी लोर को परिभाषित करते हुए कहा है- "लोक वार्ता के अन्तर्गत वह समस्त संस्कृति आ जाती है जो 'जन' से सम्बन्ध रखती है, जो शास्त्रीय धर्म तथा इतिहास में परिणत हो गई है और जो सर्वदा अपने आप बढ़ती रही है । सभ्य समाज में इस संस्कृति का प्रतिनिधित्व परम्परा से चले आते हुए अपरिमार्जित विश्वास तथा प्रथाएँ करती हैं।"
जर्मनी, फ्रांस, इटली आदि देशों में इसके जो समानार्थी शब्द प्रयुक्त किये जाते हैं उनका अर्थ जनता का काव्य या जनता की परम्पराएँ होता है। रूसी भाषा में भी जनता की सर्जना को 'लोक वार्ता' कहा गया है।
लोक वार्ता का हिन्दी में सर्वप्रथम प्रयोग डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने किया था। उनका कहना है कि लोक वार्ता एक जीवन शास्त्र है। लोक का जितना जीवन है उतना ही लोक वार्ता का विस्तार है। लोक में बसने वाला जन जन की भूमिका और भौतिक जीवन तथा तीसरे स्थान में उस जन की संस्कृति । इन तीनों क्षेत्रों में लोक के पूरे ज्ञान का अन्तर्भाव होता है और लोक वार्ता का सम्बन्ध भी उन्हीं के साथ है। इस वक्तव्य के प्रथम आह्वान के साथ साहित्य के इस नवीन हवन कुण्ड में नित नई हविष्य सामग्री तैयार होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयीं है।
हिन्दी कोश में इसका अर्थ आध्यात्मिक संवाद है जबकि लोक वार्ता का अर्थ है 'जनस्वर' । ब्रजभाषा में इसे बुढ़िया पुराण कहते हैं।
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