लोक-साहित्य : इतिहास - Folklore: History
लोक-साहित्य : इतिहास - Folklore: History
लोक-साहित्य के अध्ययन से इतिहास के सूत्रों की खोज की जा सकती है। राज्य, युद्ध, शासन व्यवस्था, युद्ध आदि को वास्तविक रूप में देखा जा सकता है। लोक मानस सदा से मानव इतिहास की अभिव्यक्ति के प्रति सजग रहा है। इसके प्रमाण लोक-गीतों में विद्यमान हैं जब भिखारी ठाकुर मंच से गाते हैं-
जेकर लाख रुपइया बाकी,
ओकर तलवा अमीनवाँ चाटी,
सौ-सौ रुपिया वाले जइहें जेहलखनवां ...।
तब पूरी शासन व्यवस्था की पोलपट्टी खुल जाती है। इसकी तुलना समकाल से की जा सकती है। - कभी छेद वाला पइसा था, इसे लोक कवि ने सँजो कर रखा है-
भाभी चल्यो छेद का पैसा, जाइ तू नारे लटकाइ लइयों।
यह सच है कि यदि लोक गाथाओं को इतिहास का कच्चा माल स्वीकार करके इसे विधिवत् लिपिबद्ध किया जाय तो हमें इतिहास सही अर्थों में प्राप्त हो सकेगा। इन गाथाओं में सच और कल्पना का सम्मिश्रण उतना ही होता है,
जितना सच एक आधुनिक कवि की रचना में भाव एवं कल्पना का सम्मिश्रण होता है। इस सन्दर्भ में डॉ. शंकरलाल यादव कहते हैं "लोक मस्तिष्क ने अपने इतिहास की लड़ियाँ अपने गीतों में, अपनी कथाओं में जोड़ी हैं। लोक-गाथाएँ तो एक प्रकार से हमारे इतिहास की प्रचुर सामग्री से सम्पन्न हैं। उसमें अतिरंजना भले ही हो किन्तु इतिहास के विद्यार्थी को कुछ ऐसे तथ्य अवश्य मिल जाएँगे जो प्रसिद्ध इतिहास लेखकों की दृष्टि से छूट गए हैं। "
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