लोक-मंच का स्वरूप और उसके उपादान - Form and components of Lok Manch

लोक-मंच का स्वरूप और उसके उपादान - Form and components of Lok Manch


1. रंगमंच का स्वरूप


लोक मंच के स्वरूप पर दर्शकों की अनुमानित संख्या का बहुत प्रभाव पड़ता है। बड़े-बड़े नगरों में जहाँ बड़ी संख्या में दर्शक आते हैं वहाँ ऊँचा मंच बनाया जाता है जिससे अधिक से अधिक दूर तक बैठे दर्शक भी मंचित लोक नाट्य को देख सकें। साथ ही, इस मंच को पृष्ठ भाग में चाँदनी (पर्दा) तानकर कृत्रिम फूलों, डालियों, गुब्बारों, फूल-पत्तों आदि से सुसज्जित भी किया जाता है। परन्तु जब किसी छोटे से गाँव में जहाँ कम संख्या में दर्शक होते हैं अथवा जहाँ मंच की ऊँचाई कम होती है, वहाँ अक्सर गाँव के चौपाल में ही तख्त बिछाकर उसको मंच का स्वरूप दे दिया जाता है या फिर किसी चबूतरे को ही मंच के रूप में काम ले लिया जाता है। ऐसी स्थिति मैं इस मंच की कोई साज-सज्जा भी नहीं की जाती है।


2. नेपथ्य का स्वरूप :


लोक-नाट्यों की यह सर्वमान्य विशेषता रही है कि इनका मंच खुला होता है। परन्तु ब्रज लोक नाट्य 'भगत' इसका अपवाद है। इसमें नेपथ्य में मुख्य मंच पर कनातें लगाई जाती हैं जिससे पात्रों के आने-जाने या आकाशभाषित की व्यवस्था रहती है।


3. रंगमंच की सज्जा


दर्शकों की अनुमानित संख्या के आधार पर इसकी ऊँचाई तय की जाती है और प्रसंगानुकूल विशेष सिंहासनों आदि की व्यवस्था की जाती है। साजिदों के बैठने की व्यवस्था भी यहीं पर अलग से की जाती है।


4. प्रकाश-विधान :


सामान्यतः विद्युत, लालटेन या गैस द्वारा संचालित उपकरणों द्वारा प्रकाश की व्यवस्था की जाती है। 1 इनके अभाव में मशाल जलाकर भी यह कार्य किया जाता है। राजस्थान में 'पड़ वाचन' में दीपक का उपयोग किया जाता है। शीतकाल में अलाव जलाकर भी प्रकाश-विधान किया जाता है। प्रकाश-व्यवस्था को भी दर्शकों की अनुमानित संख्या प्रभावित करती है।


5. वादित्र:


उपयोग में आने वाले सभी वाद्यों, जैसे सारंगी, नक्कारा, ढोलक, झाँझ, मजीरा, चीमटा, नफीरी आदि की व्यवस्था मंच की ओर ही रहती है।

इनके वादक मंच की समानान्तर ऊँचाई के तख्त आदि डालकर बैठते हैं। कई बार पात्र स्वयं भी रावणहत्था या सारंगी आदि का वादन करते हैं।


6. अभिनय प्रकार


लोक-नाट्यों में आगिक और वाचिक अभिनय पाया जाता है। हाव-भाव, मुख-मुद्राएँ या संवादशैली द्वारा अभिनय प्रस्तुत किया जाता है। साथ ही, नृत्य व गीत का भी इनमें प्रभावकारी सहयोग लिया जाता है।


7. भूल-मार्जन के साधन


जब भी कोई पात्र अपना संवाद भूल जाता है या उसे अशुद्ध बोल जाता है तो नाटक मण्डली का कुशाग्र व सचेत संचालक बड़ी चतुराई से उसकी भूल को वाद्य यंत्र पर बैठेबैठे ही संभाल लेता है।

8. आरम्भ और उसकी शैली :


लोक-नाट्यों के आरम्भ की शैली बहुत रोचक होती है जिसमें मंचित किए जाने वाले लोक नाट्य का परिचय देते हुए तथा उसके माहात्म्य पर नाट्य-निर्देशक द्वारा प्रकाश डाला जाता है।

प्रारम्भ में ही गणेश वन्दना, इष्टदेव वन्दना भी की जाती है।


9. समापन और उसकी शैली :


आरम्भ की ही भाँति लोक नाट्य का समापन भी बहुत विशेष होता है। भारतीय परम्परा में अधिकतर लोक नाट्य सुखान्त होते हैं। लोक नाट्य के समापन में देवी-देवताओं के जयकारे बोले जाते हैं। लोक विश्वासानुसार रामलीला के अन्त में हनुमानजी को आदरपूर्वक विदा भी किया जाता है।