भारतेन्दु के काव्य में पुनर्जागरण की चेतना का स्वरूप - The form of consciousness of renaissance in Bhartendu's poetry

भारतेन्दु के काव्य में पुनर्जागरण की चेतना का स्वरूप - The form of consciousness of renaissance in Bhartendu's poetry


पुनर्जागरण भारतेन्दु के चिन्तन का मुख्य स्वर है। वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय जनमानस में जिस नयी चेतना का स्वर प्रतिफलित हुआ, उसे कई नामों से लक्षित किया गया । यथा रिनेसां पुनर्जागरण, प्रबोधन, नवजागरण आदि । सर्वप्रथम अंग्रेजी शब्द रेनेसां की जगह हिन्दी में पुनर्जागरण शब्द प्रयोग में लाया जाने लगा। रिनेसां (Renaissance) फ्रांसीसी शब्द रेनयात्रे (Renaitra) से लिया गया है। (Henary s. lucas The renaissance and reformation, P-3) इन शब्दों की उत्पत्ति मुख्य रूप से लैटिन भाषा के रेनासोर शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है पुनर्जन्म या पुनर्जागरण ।

भारतीय सन्दर्भ में कुछ विद्वानों ने आधुनिककाल के नवजागरण को पुनर्जागरण की संज्ञा दी है। उनका मत है कि भारत का भक्तिकाल का नवजागरण आधुनिककाल का पुनर्जागरण है और इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं पुरातन साहित्य व संस्कृति का पुनरावलोकन तथा मानवतावादी विश्व दृष्टि । भारतेन्दु इस दृष्टि के अग्रदूत हैं ।


भारतेन्दु ने अपनी युगान्तरकारी चेतना से भारतीय जनमानस को पुनर्जागरण के बोध से उद्वेलित किया। अंग्रेजी उपनिवेशवाद और तत्कालीन समाज की विकृत मनस्थितियों से जकड़े समाज को भारतेन्दु ने राष्ट्रीय अस्मिता और आधुनिक बोध से सम्पृक्त कर जाग्रत करने का सफल प्रयास किया।

ध्यातव्य है कि पुनर्जागरण की यह चेतना एक ओर अंग्रेजी शासन और उसकी शोषणकारी नीतियों के प्रति विद्रोह के रूप में सामने आती है तो दूसरी ओर भारतीय समाज की अनेक सामाजिक विकृतियों और धार्मिक पाखण्डों के विरोध के रूप में। यह सांस्कृतिक व सामाजिक जागरण के साथ ही राजनैतिक व राष्ट्रीय जागरण भी था। भारतेन्दु का साहित्य इस जागरण को प्रमुखता से अभिव्यक्ति देता है।


भारतेन्दु के काव्य में पुनर्जागरण की चेतना तत्युगीन चेतना से अलग है। वस्तुतः पुनर्जागरण की इस चेतना का प्रारम्भिक स्वर बंगाल में सुनाई पड़ता है बाद में हिन्दी जगत् में।

लेकिन भारतेन्दु का जागरण बोध बांग्ला एवं मराठी के कवियों के जागरण बोध से अधिक व्यापक और समावेशी है। इस सन्दर्भ में बच्चन सिंह का मत ध्यातव्य है - "हिन्दी नवजागरण बंगाल, महाराष्ट्र के नवजागरण से मूलतः भिन्न न होकर अपने दृष्टिकोण और तेवर में भिन्न था। बंगाल के सबसे अधिक प्रभावी लेखक बंकिम थे। उनके लेखन में हिन्दूवाद का स्वर अधिक मुखर था और उनकी राष्ट्रीयता अपने बंगाल तक सीमित थी। उस काल के अनेक बांग्ला लेखकों की दृष्टि भी प्राय: 'सोनार बांग्ला' के आगे नहीं जाती है। क्षेत्रीयता से आज भी उसकी मुक्ति नहीं हुई है। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध गद्यकार चिपलूणकर वर्ण-भेद की खाई नहीं पार कर पाए थे। महात्मा फुले को वे हीन दृष्टि से देखते थे।

pre-wrap;"> पर भारतेन्दु और उनके मण्डल के लेखकों में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं थी न वर्ण-भेद की और न क्षेत्रीयता की । अन्य लेखकों की भाँति भारतेन्दु मण्डल भी देश के स्वतन्त्र सांस्कृतिक व्यक्तित्व की खोज कर रहा था। पर इनका देश बड़ा था।" यही कारण है कि भारतेन्दु की काव्य-चेतना में बार बार 'भारत' की चिन्ता व्याप्त है।

भारतेन्दु हिन्दी नवजागरण के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में सामने आते हैं लेकिन अन्तर्वस्तु और भाषा दोनों ही आधारों पर उनके गद्य में नवजागरण की जैसी बृहत् चेतना निर्मित होती है वैसी उनकी विशुद्ध काव्य-रचनाओं में नहीं होती।

इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि भारतेन्दु के काव्य साहित्य में नवीन बोध और नवजागरण की अभिव्यक्ति नहीं हुई है। वस्तुतः भारतेन्दु की कविताओं में कई स्वर हैं- शृंगार का स्वर, भक्ति का स्वर और नवजागरणकालीन नवजीवन बोध का स्वर आदि । शृंगार और भक्ति की कविताओं में भारतेन्दु भक्ति और रीति परिपाटी का पालन करते प्रतीत होते हैं लेकिन नवजागरण से सम्बन्धित कविताओं में वे राष्ट्रभक्ति, अंग्रेजी शासन तन्त्र का विरोध, भारतीय समाज की दुर्दशा और सामाजिक-धार्मिक विकृतियों का बड़ा सजीव चित्रण करते हैं। यह सच है कि भारतेन्दु ने गद्य का लेखन खड़ीबोली में किया लेकिन काव्य लेखन के लिए उन्होंने ब्रजभाषा को ही अधिक उपयुक्त माना ।

इसका कारण यह है कि ब्रजभाषा में कविता की इतनी सघन व सशक्त परिपाटी मौजूद थी कि भारतेन्दु भी उसकी उपेक्षा न कर सके। हालाँकि उन्होंने कुछ कविताएँ खड़ीबोली में भी लिखी हैं। यह भी है कि उनकी पुनर्जागरण और खड़ीबोली से सम्बन्धित अधिकांश कविताएँ उनके नाटकों का अंश हैं। विशुद्ध काव्य-ग्रन्थों में तो शृंगार और भक्ति की ही प्रधानता है लेकिन उनकी जागरण से सम्बन्धित कविताएँ इतनी महत्त्वपूर्ण हैं कि उनके आधार पर भारतेन्दु के जागरण के स्वरूप को विश्लेषित किया जा सकता हैं। भारतेन्दु के पुनर्जागरण में वर्ण, धर्म, क्षेत्र से ऊपर उठकर एक राष्ट्र का सपना हैं। अंग्रेजी शासन का और उनकी दमनकारी नीतियों का विरोध है तो उनकी अच्छी नीतियों का समर्थन भी है।

हमारी सामाजिक विकृतियों और धार्मिक अन्धविश्वासों का खण्डन है तो सांस्कृतिक पुर्नमूल्यांकन की चेतना भी। उसमें वर्तमान की चिन्ता है तो अतीत से जुड़ाव भी राष्ट्र-प्रेम की भावना है तो समाज की बुराइयों का नग्न चित्रण भी देश के लोगों की अकर्मण्यता और विवेकहीनता से वे आहत हैं। वे स्त्रियों की दशा में सुधार के प्रबल पक्षधर हैं। उनमें आस्था भाव भी है और विद्रोही स्वर भी वे आत्मचेतस भी हैं और समष्टि चेतस भी "आत्मचेतस का भाव तो सम्पूर्ण भारतीय नवजागरण में है। यही चेतना भारतीय अस्मिता सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान है । भारतेन्दु ने इसी आत्मचेतस को समष्टि-चेतस की ओर उन्मुख किया। "2


भारतेन्दु की कविताओं में नवजागरण का स्वरूप बृहत् भी है और समावेशी भी वे दकियानूसी नहीं हैं। उन्होंने भारतीय समाज की बुराइयों की निन्दा में संकोच नहीं किया। ठीक उसी तरह उन्होंने पश्चिम की अच्छी बातों को भी उदारतापूर्वक स्वीकार किया। अतः उनका नवजागरण भारतीय सांस्कृतिक अस्मिताबोध के पुनर्मूल्यांकन की बात करता है। वे हर भारतीय विचार को न आँख मूँद कर स्वीकार करते हैं न हर पश्चिमी अवधारणा एवं ज्ञान का बिना विचारे विरोध । “विदेशी प्रभाव को उन्होंने स्वस्थ रूप में ग्रहण किया और इसीलिए अंग्रेजों के प्रति तीव्र घृणा की भावना का प्रसार न करके उन्होंने भारतीयता को जगाने की कोशिश की।

उनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण ज़रा भी विलायती रंग में नहीं रंग पाया है, क्योंकि वहाँ तो 'साँवरो रंग चढ् यौसो चढ् यौ। '३ कहना न होगा कि भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त पुनर्जागरण न तो पूरी तरह से पश्चिम की नकल है न बंगाल पर निर्भर । वह भारतेन्दु का अपना है जिसे भारतेन्दु ने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप गढ़ा हैं। उनके मंतव्य को 'कविवचन सुधा' पत्रिका के इस सिद्धान्त वाक्य से समझा जा सकता है-


खलगन सों सज्जन दुखीमति होंहि, हरिपद मति रहे । अपधर्म घटें, स्वत्व निज भारत गहै, कर दुःख बहे ॥ बुध तजहि मत्सर, नारि नर सम होंहि, जग आनन्द लहै । तजि ग्राम कविता सुकवि जन की अमृतबानी सब कहे ॥


वस्तुतः भारतेन्दु ने तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक सन्दर्भों से अपनी चेतना को आकार दिया । उन्होंने अपनी कविताओं में ऐसे विषयों को स्थान दिया जो तत्कालीन समाज की दशा और दिशा को निर्धारित करने वाले थे। जैसे अकाल, महँगाई, भूख, निर्धनता, रोग, बैर, कलह, आलस्य, संतोष, खुशामद, कायरता, टैक्स, अनैक्य, देश की दुर्दशा, धार्मिक मत-मतान्तर, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, छुआछूत, अशिक्षा, अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षा अज्ञान, रूढिप्रियता, समुद्रयात्रा, ईश्वर, देवी-देवता, भूत-प्रेत, अपव्यय, अदालती व्यवस्था, पुलिस के अत्याचार, फैशन, सिफ़ारिश, रिश्वतखोरी, बेकारी, मद्यपान आदि। इस ढंग से भारतेन्दु ने अपनी पुनर्जागरण की चेतना को स्वरूप दिया।