लोक-गीतों की सामान्य प्रवृत्तियाँ और रूढ़ियाँ - General trends and conventions of folk songs

लोक-गीतों की सामान्य प्रवृत्तियाँ और रूढ़ियाँ - General trends and conventions of folk songs


लोक-गीतों की सामान्य प्रवृतियाँ


लोक-गीतों का उपयुक्त परिचय प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि लोक-गीतों का जिज्ञासु इनकी सामान्य प्रवृत्तियों तथा रूढ़ियों से अवगत हो । लोक-गीतों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ जो उभर कर सामने आती हैं, वे सभी भाषाओं के लोक-गीतों में लगभग एक जैसी परिलक्षित होती हैं। अनेक लोक-साहित्यविद् इन प्रवृत्तियों को कुछ इस तरह विवेचित करते हैं-


1. लयपूर्त्यर्थक पद योजना :


सभी प्रदेशों के लोक-गीतों की लय या घुन को साधने हेतु कुछ पदों का सहारा लिया जाता है। जैसे- है, हो, हाँ, वे, ओ रे इत्यादि ।

इससे स्वर साधने व तुकान्त को सरल बनाने में सहजता आ जाती है। लय की पूर्ति हेतु आने वाले इन पदों का हालाँकि कोई अर्थ नहीं होता है परन्तु गीत की लय को ये साधते हैं। लोक-गीतों में ये प्रवृति प्रमुखता से दिखाई देती है। ब्रज लोक-गीतों की भाँति राजस्थानी व अन्य लोक-गीतों में भी यह प्रवृति नजर आती हैं। राजस्थानी लोक-साहित्यकार डॉ. एस. डी. चारण के अनुसार अरे हाँ, अहा, हां, हो, जी, हाँ जी, रे, हाँ जीरे, ओ, औ, जी, ओ आदि उद्गारवाचक स्तोभाक्षरों का राजस्थानी लोक गीतों में प्रयोग हुआ है। उदाहरणार्थ राजस्थानी का एक लोक गीत उदाहरणार्थ प्रस्तुत है -


कांकरियाँ र कोटड़ला चुणाय जी ओ मारू रे । ईटा रा चुणायदो मिंदर माळिया हो जी।


और उधर ब्रजभाषा के लोक गीत में प्रयोग किया गया है-


आषाढ़ तुलसा बैंयन लागी तौ सामन द्वै द्वै पात हो राम भादो में तुलसा गरब गवीली, तौ क्वार में पितर समौधे हो राम ॥


2. समान ध्वनि के लिए निरर्थक शब्दों का प्रयोग :


गीत में नाद सौन्दर्य या सादृश्य को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसे निरर्थक शब्दों का प्रयोग सार्थक शब्दों के साथ किया जाता है, जिससे गीत का नाद-सौन्दर्य बढ़ जाता है। जैसे-


कोरा मोरा कुंडिया रै माँय करैला री बेल । करेली म्हैं वायो रे लाल ॥


और भी,


गागरिया नाएँ रे जल कैसे भरू,


कौन सम्हारे अगरी गगरी,


कौन सम्हारै नंदलाला,


कौन राजा मोइ रे।


सादृश्य के आधार पर नए शब्दों को गढ़ना व उन्हें मूल शब्द के साथ लगाकर बोलना लोकजीवन की एक खास प्रवृत्ति सदा से रही है और यह प्रवृत्ति लगभग सभी बोलियों में पाई जाती है।

चूँकि लोक-गीतों का ताना-बाना भी इन्हीं बोलियों में गूँथा गया है अतः इस प्रवृति ने सहज ही में लोक-गीतों में भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।


3. समानार्थी शब्दों का प्रयोग :


इस प्रवृत्ति के पृष्ठ में लोककवि की मंशा किसी शब्द विशेष पर बल प्रदान करने की रही है, इसीलिए एक से अर्थ देने वाले दो शब्दों को पास-पास बैठा दिया गया है। जैसे -


खाय मरूं जै'र विस ओ ई म्हारी जोर है।


इस पंक्ति में जहर व विष समानार्थी शब्दों द्वारा मरने की बात पर बल दिया गया है।


एक अन्य गीत में-


बाळू झाळू थारी जिभड़ली नणदल म्हारी अ ऊपर राळं सेध लूण बिणजारी ओ ।


4. सम्बोधनात्मक शब्दों का प्रयोग :


अक्सर देखा जाता है कि लोक-गीत संवाद आधारित होते हैं। माँ-बेटी, भाई-बहन, पति-पत्नी, देवर- भाभी इत्यादि रिश्ते जब आपसी मनोभावों को आपस में बाँटने की ओर मुखर होते हैं तो वहाँ ये संवाद सम्बोधन शैली को अपनाते हुए कुछ इस तरह अभिव्यक्त होते हैं -


कठोड़े बसैला से माँ म्हारी ओ, दोय दादर मोर, कठोड़े बसैला वन री कोयलाँ, बन में बसैला से धीया म्हारी ओ । दोय दादर मोर


बागा में बसैला वन री कोयला ॥


और भी,


ऊँचले मगरे जाऊँ ओ माँय ।


उळिया काचर लाऊं ओ माँय ॥


छोल ने छमकाऊं से माँय ।


वीरे ने जिमाऊं ओ माँय ॥ म्है वीरे री बाई ओ माँय ॥


वीरो म्हारों भाई ओ माँय ।


कई बार प्राकृतिक उपादानों को भी लोक-गीतों में सम्बोधित किया जाता है-


हळदी से थारा लांबा तीखा पान


गज गाँठिया सूँ नीपजै ॥


सरवर थारी ऊँची पाळ।


दोय उजळावत दीसै आवता ॥


और भी,


चांदा थारे चांदणे रमिया सगळी रात । डोरों हीर रौ रे लाल ॥


कई बार ये सम्बोधन लय की पूर्ति करते हुए भी गीत का अभिन्न अंग बन जाते हैं।




5. एक ही वर्ण से प्रारम्भ होने वाले शब्दों का पास-पास प्रयोग :


एक ही वर्ण की बार-बार आवृति भी इन गीतों की एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है। प्रसव वेदना के एक गीत में-


नैनी सी नार नारेळी सो पेट,


चाले है चीस उतावळी जी,


ज्यूँ चालै ज्यूँ धण लुळ-लुळ जाय,


चाले है पीड़ उतावळी सा


वर्णावृति के इस सहज प्रसूत चमत्कार से लोक-गीतों में निराली ही कर्णप्रियता का समावेश हो जाता है।


6. . पुच्छ पदों की योजना :


ब्रज प्रदेश के लोक-गीतों में यह प्रवृत्ति बहुतायत से देखने में आती है। इनमें कई पदों के बाद एक ही चरण पुच्छ पद के रूप में प्रयुक्त होता है। जैसे-


बैठ्यो आसन मारिकें, सोवै पाँव पसारि । चारी पहर भजन में बीते, भयौ सकारयौ आइ, कृस्न गुन गाइयें ।


7. धुनार्थ निषेधात्मक पदप्रयोग :


किसी बात को सरल सहज तरीके से कहने हेतु इन लोक-गीतों में निषेधात्मक पदों का प्रयोग किया जाता है। जैसे- न, ना। ऐसा जान पड़ता है कि घुन की सार्थक योजना ही इस निषेधात्मकता का कारण रही होगी।


फूल में फूल गुलाबी, सूरज पैइयाँ लागू न हो। सूरज तुम मोई साददेऊ बहुत गुनगाऊँ न हो ।


8. चरणान्तर तुकबंदी :


गीत के चरणान्त में तुकबंदी साधारणतया सभी प्रकार के गीतों में पाई जाती है परन्तु कभी-कभी चरण के मध्य में दो-दो, तीन-तीन बार तुक मिलान की प्रवृति भी लोक-गीतों में देखी जा सकती है- -


नेनन ते गम की झड़ी,


लड़ी हर घड़ी मुसीबत कड़ी, सह नाइ जावै,


बालम बिन बारह मास नींद न आवै।


झूलना गीतों जिकड़ी भजनों इत्यादि में यह प्रवृति दिखाई देती है।