द्विवेदीयुगीन कविता की ऐतिहासिक भूमिका - Historical role of Dwivedi era poetry
द्विवेदीयुगीन कविता की ऐतिहासिक भूमिका - Historical role of Dwivedi era poetry
द्विवेदी युग ने आधुनिक हिन्दी कविता को बदलने में युगान्तरकारी भूमिका का निर्वाह किया है। इस युग में न सिर्फ़ कविता की भाषा और शैली में बदलाव आया बल्कि कविता की बुनियादी धारणा और उसके उद्देश्य के बारे में भी व्यापक बदलाव आया। इससे उस युग की कविता के विषय अन्तर्वस्तु और भाषा-शैली में भी परिवर्तन आया। इस युग की कविता की ऐतिहासिक भूमिका को निम्नलिखित उपशीर्षकों के माध्यम से विश्लेषित किया जा सकता है।
हिन्दी भाषा का एकरूपीकरण और परिष्कार
द्विवेदी युग ने भारतेन्दुकालीन भाषायी संक्रमण को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इस युग के पूर्व गद्य की भाषा तो खड़ीबोली हिन्दी है लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा है। द्विवेदी युग में गद्य की भाषा तो खड़ीबोली हिन्दी ही रही लेकिन पद्म की भाषा हिन्दी और ब्रजभाषा दोनों बनी। 'रत्नाकर' जैसे कवि तो ब्रजभाषा में ही कविता लिखते रहे। कुछ कवि तो दोनों ही भाषाओं में कविता लिखते थे जबकि मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि द्विवेदीजी के प्रभाव में आकर ब्रजभाषा छोड़कर खड़ीबोली हिन्दी में कविता करने को प्रवृत हुए। द्विवेदीजी स्वयं भी चाहते थे कि हिन्दी साहित्य में गद्य और पद्य की भाषा एक ही हो अर्थात् खड़ीबोली हिन्दी ही हो।
इसके लिए उन्होंने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से अनेक उद्यम किये। खड़ीबोली को कविता की भाषा बनाना आसान नहीं था। ब्रजभाषा में कविता करने की सैकड़ों साल पुरानी परम्परा थी। उसकी लोच, कोमलता, शब्दावली और छन्द-परम्परा का खड़ीबोली के साथ कोई मुकाबला ही नहीं था। कवि भी ब्रजभाषा में ही लिखने के अभ्यस्त थे और नवोदित कवियों का काव्य-प्रशिक्षण भी ब्रजभाषा में ही होता था। खड़ीबोली में कविता करने की कोई सुसंगत परम्परा नहीं थी। अभी तो वह बोली से साहित्य की भाषा के रूप में विकसित ही हो रही थी। उसका कोई साहित्यिक रूप निश्चित नहीं हुआ था न ही उसका व्याकरणिक रूप ही स्थिर हो पाया था। उसमें काव्य की शब्दावली का भी अभाव था।
ऊपर से उसके विरोधी भी बहुत थे। लेकिन वह आधुनिकता के अश्व पर सवार थी। वह गद्य और विचार की भाषा बन चुकी थी। वह राजनीति की भाषा थी और राष्ट्रभाषा होने की प्रबल दावेदार थी । यदि हिन्दी कविता को आधुनिक होना था और समय के साथ कदमताल करना था तो उसे ब्रजभाषा के केंचुल का त्याग करना ही था। द्विवेदीजी समय की इस माँग को समझते थे। इसीलिए महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती के लेखक मण्डल को खड़ीबोली में कविता लिखने के लिए उत्साहित किया। उनके प्रभाव में आकर अनेक कवियों ने खड़ीबोली में कविता लिखने का बीड़ा उठाया। इनमें मैथिलीशरण गुप्त सर्वप्रमुख हैं। इनके अलावा सियारामशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, मुकुटधर पाण्डेय,
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' आदि कवियों ने खड़ीबोली हिन्दी में कविता लिखने की शुरुआत की। खड़ीबोली को कविता की भाषा बनाने के लिए सबसे ज़रूरी था कि इसके व्याकरणिक स्वरूप को निश्चित किया जाए। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने इसके लिए अथक प्रयत्न किया। वे सरस्वती में छपने के लिए आने वाली रचनाओं की व्याकरणिक त्रुटियों और वाक्य की संरचना को सुधार कर अपनी पत्रिका में छापते थे। उन्होंने अनेक शब्दों के लिंग का निर्धारण किया। सर्वनामों के प्रयोग को स्थिर और निश्चित किया। उन दिनों खड़ीबोली को बरतने की अनेक शैलियाँ थीं। द्विवेदीजी ने हिन्दी लिखने की शैली को भी निश्चित किया।
उन्होंने अरबी और फारसी के शब्दों से परहेज किया। खड़ीबोली की सम्प्रेषण क्षमता और शब्दावली को बढ़ाने के लिए संस्कृत के शब्दों का सहारा लिया। संस्कृत की सहायता से नये शब्दों का निर्माण किया गया | तत्सम और तद्भव शब्दों की जुगलबंदी से खड़ीबोली हिन्दी का नया वितान तैयार हुआ। इसके लिए द्विवेदी युग के साहित्यकारों को उर्दू ब्रजभाषा, बांग्ला तथा हिन्दी की अन्य बोलियों से संघर्ष करना पड़ा। हिन्दी भाषा के स्वरूप निर्धारण, मानकीकरण और कविता की भाषा के रूप में खड़ीबोली के प्रचलन को सम्भव बनाने में द्विवेदी युग का अप्रतिम योगदान है।
नवजागरण की चेतना
हिन्दी कविता को द्विवेदी युग का दूसरा योगदान है, 'नवजागरण की चेतना का विस्तार करना।' अंग्रेजी राज में धन के विदेश चले जाने का उल्लेख भारतेन्दु कर ही चुके थे। द्विवेदी युग के कवियों में राजनैतिक और समाज-सुधार की चेतना और प्रखर रूप में सामने आती है। हिन्दी कविता के इतिहास में पहली बार कवियों ने अपने देश और उसकी दुर्दशा पर इतना विचार किया। पराधीनता और हतदर्प मनोवृति को दूर करने के लिए इस दौर के कवियों ने अनेक उपाय किये। इसके अतिरिक्त इस दौर के कवियों ने वैज्ञानिक चेतना, विवेक,
बुद्धिवाद और शिक्षा के प्रसार पर भी बहुत जोर दिया। सरस्वती पत्रिका में साहित्येतर विषयों पर भी खूब लिखा जाता था। अर्थशास्त्र, समाज की दशा, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति आदि पर लिखते हुए दूसरे देशों से भारत की तुलना की जाती और भारत की दुर्दशा को दूर करने का उपाय बताया जाता। द्विवेदीजी स्वयं ही अनेक अंग्रेजी पुस्तकों की सामग्री का हिन्दी अनुवाद सरस्वती पत्रिका में छापते थे। उनकी पुस्तक सम्पत्तिशास्त्र भी उसी समय छपी। इन प्रयासों से नवजागरण की चेतना के विकास और प्रसार में मदद मिली और इसका सकारात्मक प्रभाव हिन्दी कविता पर भी दिखाई देता है। इस विषय पर आगे के सामाजिकता और राष्ट्रीय चेतना वाले उपशीर्षकों में विस्तार से विचार किया जाएगा।
रीतिविरोधी अभियान
इस नवजागरण की चेतना का ही परिणाम था, 'रीतिविरोधी अभियान' द्विवेदीजी कविता को देश और समाज की वास्तविक दशा से जोड़ना चाहते थे। वे कविता के माध्यम से सामाजिक बदलाव करना चाहते थे। इसके लिए आवश्यक था कि कविता को मनोरंजन की वस्तु समझने की धारणा का खण्डन किया जाए। नायिका- भेद, प्रेम और शृंगार जैसी प्रवृतियों और विलासिता जैसी मनोवृतियों का विरोध किया जाए। इस युग के कवियों ने नायिका भेद और अलंकारशास्त्र के अनुरूप कविता करने की परिपाटी का विरोध किया। ब्रजभाषा की कविता के विरोध का एक कारण नायिकाभेद और उसकी अलंकारप्रियता भी थी।
इस दौर में समस्यापूर्ति जैसी काव्य- शैलियों का भी विरोध किया गया। इस युग के कवि रीतिवाद के संकुचित सामाजिक आधार और निर्जीव भाषा- सौन्दर्य के आलोचक थे। वे कविता को इस कृत्रिमता से निकाल कर उसे जीवन-संग्राम और समाज-सुधार से जोड़ना चाहते थे। द्विवेदीजी के नेतृत्व में उस युग के साहित्यकारों और कवियों ने इस भूमिका का बखूबी निर्वाह किया। उन्होंने कविता को जीवन, देश और समाज से जोड़ा। हिन्दी कविता के इतिहास में पहली बार कविता के आँगन में राजनैतिक और सामाजिक विषय-वस्तु का प्रवेश सामने के दरवाजे से हुआ।
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