लोक कला का महत्त्व - importance of folk art
लोक कला का महत्त्व - importance of folk art
कला मानव जीवन की चिरसंगिनी है। आदिम काल से वर्तमान वैज्ञानिक युग तक मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में कला के योगदान और महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। कला के महत्त्व को दर्शाते हुए भर्तृहरि ने 'हुए' अपने 'नीतिशतक' में लिखा है-
साहित्य संगीत कला विहीनः । साक्षात् पशु पुच्छ विषाण हीनः ॥
अर्थात् साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य पूँछ और सींग रहित साक्षात् पशु के समान है।
अपने व्यापक स्वरूप में लोक कला के अन्तर्गत लोक नृत्य, लोक गीत, लोक कथा, लोक गाथा तथा लोक नाट्य समाहित हैं जिनका विश्लेषण विगत इकाइयों में किया जा चुका है। लोक कला के व्यापक स्वरूप को स्वीकारते हुए इसके महत्त्व को प्रस्तुत विवरण के आधार पर समझा जा सकता है. -
1. लोक-कलाएँ ऐतिहासिक कलेवर को आत्मसात् करते हुए निरन्तर गतिमान रहती हैं अतः इनके माध्यम से अतीत में घटित घटनाओं पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। अधिकांशतः इतिहास-लेखन के दौरान बड़े घटनाक्रमों में स्थानीय तथा छोटी घटनाएँ महत्त्व प्राप्त नहीं कर पाती है तब लोक कलाकार इन घटनाओं को अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत कर उन घटनाओं को प्रकाश में लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
2. लोक-कलाएँ लोक संस्कृति के चित्रण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। जन जीवन का जितना सच्चा, सरल चित्रण इन कलाओं में प्राप्त होता है वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता है। लोक कलाकार समाज में वर्तमान रीति-रिवाज, परम्पराओं, क्रिया-कलापों को उसी प्रकार चित्रित करता है, जैसा कि वह अनुभूत करता है।
इससे लोक कला देश-प्रदेश की संस्कृति का दर्पण बन सांस्कृतिक दशा और विकास को प्रकट करने में सक्षम हो जाती है।
3. मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठतम कृति है। उसके जीवन में प्रकृति का अन्यतम स्थान है। लोक कलाओं में प्रकृति के विविध चित्र उपलब्ध होते हैं। पशु-पक्षी, नदी-तालाब,
पेड़-पौधों के सुन्दर चित्र और उनके महत्त्व को लोक कला के विविध रूपों में पर्याप्त स्थान प्राप्त हुआ है, जो पाठक और श्रोता के मानस में प्रकृति के प्रति लगाव को जाग्रत् कर, प्रकृति संरक्षण का सन्देश देने में पूर्णतया सक्षम जान पड़ते हैं।
4. लोक-कलाएँ नीरसता में सरसता का संचार करती हैं। जीवन के कठोर संघर्ष से तप्त लोक जब निराशा के गर्त की ओर उन्मुख हो जाता है तब ये कलाएँ विभिन्न प्रकार से उसका अनुरंजन कर नई चेतना का संचार करती हैं। कल्पना के विविध रंगों में रंगी लोक कलाएँ हृदय में नए रंग, नए स्वप्न को जगाती हैं और नव संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं।
5. लोक कलाकार को आर्थिक सम्बल प्रदान करने में भी लोक-कलाओं के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में विविध लोक कलाओं के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है। परिणामस्वरूप लोक कलाकारों को आजीविका के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। वे अपनी कला के बल पर न सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम हो रहे हैं वरन् अपनी क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघकर विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाने में भी समर्थ हो गए हैं।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लोक-कलाएँ 'सत्यं शिवं सुन्दरम् के मूल मंत्र से युक्तहोकर जन-समाज के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं।
ये मनुष्य के आन्तरिक भावों को उद्धृत कर उसे नई चेतना शक्ति से युक्त करती हैं जिससे वह अपने लक्ष्य की ओर निर्बाध गति से बढ़ पाता है। ये नीरसता में सरसता का संचार कर जीवन को रस आनन्द से परिपूर्ण बनाती हैं। लोक-कलाओं को व्यक्तिगत कृति नहीं वरन् सामाजिक कृति के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस प्रकार समाज का प्रत्येक सदस्य उसमें अपने अस्तित्व को अनुभूत करता है परिणामस्वरूप लोक कलाएँ मनुष्य को पशुत्व से ऊपर उठने और सामाजिकता का पाठ पढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं।
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