भारतीय डायस्पोरा नीति के उद्भव से संबंधित महत्वपूर्ण लोग एवं संस्थाएँ - Important people and institutions related to the evolution of Indian Diaspora Policy

भारतीय डायस्पोरा नीति के उद्भव से संबंधित महत्वपूर्ण लोग एवं संस्थाएँ - Important people and institutions related to the evolution of Indian Diaspora Policy


महात्मा गांधी


एम. के. गांधी को दादा अब्दुल्लाह की तरफ से एक वर्ष के करार पर अप्रैल 1893 ई. में दक्षिण अफ्रीका के डरबन गए। केस के सिलसिले में रेल मार्ग से डरबन से प्रिटोरिया जाते समय कड़ाके की ठंढ में आधी रात को मैरिसबर्ग स्टेशन पर गोरे रेलवे पुलिस के द्वारा नस्ल और रंगभेद की मानसिकता के कारण प्रथम श्रेणी की टिकट के बावजूद गांधी को अपमानित करके और धक्के मारकर उनके समान को बाहर फेंक दिया गया। इस घटना से उनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। गांधी ने उस दिन से दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार के दमन एवं भेदभाव का विरोध प्रारंभ कर दिया। प्रवासी भारतीयों को संगठित कर उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ दिया।


नेटाल सरकार हिंदुस्तानियों को मताधिकार से वंचित करने वाली एक कानून पास करने वाली थी। जून 1894 ई. में नेटाल में भारतीयों को संगठित करने, अपने अधिकार के प्रति सचेत रखने के लिए नेटाल के सभी भारतीय वर्गों के सहमति और सहयोग से नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की, जिसके मंत्री एम. के. गांधी को बनाया गया। भारत आकर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के आंदोलन के लिए भारतीय नेताओं से समर्थन माँगा। इसी उद्देश्य से वे बंबई में फिरोज शाह मेहता, बदरूद्दीन तैयबजी, महादेव गोविन्द रणाडे, पूना में लोकमान्य तिलक, प्रो. भांडारकर, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे बड़े नेताओं से मिलकर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति से परिचय कराया।


गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के मानवाधिकारों के लिए ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध निरंतर संघर्षरत रहे। उन्होंने अनिवार्य पंजीकरण तथा हस्त मुद्रण, अंतःप्रांतीय अप्रवासन पर प्रतिबंध, बंधक मज़दूरों पर लगाए गए कर तथा ईसाई विवाहों के अतिरिक्त अन्य सभी विवाहों को अमान्य ठहराने वाले कानूनों आदि का डटकर विरोध किया। 1901 ई. में गांधी समुद्र मार्ग से भारत लौटते हुए 29 अक्टूबर को मॉरीशस गए। वहाँ के भारतीय गिरमिटिया मजबूों और व्यापारियों को संबोधित करते हुए उन लोगों को अपने जीवन को उच्च बनाने के लिए सलाहें दी जैसे :- अपने बच्चों को शिक्षित करो और स्वस्थ्य रखो, उन्हें मॉरीशस की राजनीति में आने के लिए प्रेरित करो और प्रेरणा के लिए भारत पर निगाह रखो।


सन् 1879 से लेकर सन 1916 तक हजारों भारतीय गिरमिट की प्रथा के तहत फिजी द्वीप में गए। तोताराम सनाढ्य इन्हीं गिरमिटिया में से थे, जिन्हें भारत के फिरोजाबाद से फुसलाकर फिजी ले जाया गया। इन्होंने फिज़ी में दयनीय स्थिति में रहने वाले भारतीयों की मदद के लिए एम. के. गांधी को पत्र लिखा। इसी पत्र से प्रेरित होकर गांधी जी ने मणिलाल डॉक्टर (1912-20), सी. एफ. एंड्रयूज (1916) को फिजी में काम रहे भारतीय गिरमिटिया मजदूरों एवं अन्य भारतीयों की मदद के लिए फिजी भेजा। मणिलाल डॉक्टर ने फिजी में रहकर भारतीय के विरुद्ध चल रहे अदालती मुकदमें में भारतीयों के पक्ष को रखा।

फिजी में बसे भारतीय गिरमिटिया मजदूरों और अन्य भारतीयों को संगठित करने के लिए द्विभाषीय अखबार 'इंडियन सेटेलर' निकाला तथा इंडियन इम्पीरियल एसोसिएशन' नामक संगठन बनाया। (लाल ब्रिज. वी. 2007 370-382) इन्हीं संघर्षों और प्रेरणाओं के कारण महेंद्र चौधरी को फिजी का प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला जो भारतीय मूल के थे।


1902 ई. में गांधी जी को प्रवासी भारतीयों के निमंत्रण पर पुनः दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वे ट्रांसवाल के सर्वोच्य न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए और ट्रांसवाल ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन' की उन्होंने स्थापना की।

1904 ई. में फीनिक्स फार्म' की स्थापना हुई।" फिनिक्स फार्म से 'इंडियन ओपीनियन' नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया, पत्र का मुख्य उद्देश्य था पूरे विश्व में जहाँ कहीं भी भारतीय रहते हों उन तक सत्याग्रह से संबंधित घटनाओं को पहुँचाना, दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले 'भारतीय को सत्याग्रह की तालीम देना।


जोहान्सबर्ग में ट्रांसवाल एशियाटिक ला अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस के विरोध में भारतीयों की विशाल सभा आयोजित कर गांधी ने उनसे इस काले कानून के विरुद्ध निष्क्रिय प्रतिरोध (बाद में सत्याग्रह) करने की शपथ दिलवाई।

1907 ई. में उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध आंदोलन चलाया और सार्वजनिक सेवा के लिए अपना जीवन अर्पित करते हुए वकालत छोड़ दी। सत्याग्रह आंदोलन के कारण उन्हें 10 जनवरी, 1908 को दो महीने के कारावास की सजा दी गई। जनरल स्मट्स को सरकार द्वारा समझौता वार्ता के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया तथा समझौता होने पर गांधी को जेल से मुक्त कर दिया गया।


गांधी जी के नेतृत्व में भारतीयों द्वारा चलाए जा रहे सत्याग्रह को अपना नैतिक समर्थन देने के लिए गोपाल कृष्ण गोखले 22 अक्टूबर, 1912 ई. को दक्षिण अफ्रीका के नेटाल आए।

नवंबर 1913 ई. में दक्षिण अफ्रीका की संघीय सरकार द्वारा तीन पौंड के पोल टैक्स को निरस्त न करने के विरोध में सत्याग्रह किया। गांधी ने 2023 पुरूषों, 127 स्त्रियों तथा 57 बालकों के जुलूस का नेतृत्व करते हुए ट्रांसवाल में प्रवेश किया। उन्हें गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा किया गया। सरकार ने समझौता वार्ता के लिए उन्हें 18 दिसंबर को बिना शर्त रिहा कर दिया। जनरल स्मट्स के साथ हुए समझौते के कारण गांधी ने सत्याग्रह आंदोलन समाप्त कर दिया। इसी के तहत भारतीयों को राहत देने वाले कानून (इंडियन्स रिलीफ बिल) को पारित किया जाता है।


9 जनवरी, 1915 ई. को गांधी सपरिवार एवं कुछ सत्याग्रहियों के साथ दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।

गांधी जी के स्वदेश लौटने की याद में ही भारत सरकार ने 2003 से प्रतिवर्ष प्रवासी भारतीय दिवस मनाना प्रारंभ किया है।


मणिलाल डॉक्टर


मॉरीशस के भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की बदहाली से चिंतित होकर महात्मा गांधी ने मणिलाल डॉक्टर को 1907 ई. में मॉरीशस भेजा। वे अदालतों में गिरमिटिया असहाय मजदूरों की निःशुल्क पैरवी करते, कोठी-मालिकों की शोषण प्रवृति का अपने लेखों द्वारा पर्दाफाश करते, धार्मिक विषयों पर चर्चा कर विभिन्न धर्मावलंबियों का मतभेद दू करते, अंग्रेजी, गुजराती और हिंदी में "हिंदुस्तानी' दैनिक पत्र को निकालकर भारतीय गिरमिटिया मजदूरों से संबंधित समाचारों को सरकार तक पहुँचाते और अपने लेखों द्वारा भारतीय गिरमिटिया मजदूरों और भारतीय लोगों के आत्मसम्मान को बढ़ाते थे। भारतीयों में आत्मगौरव बढ़ाने के लिए 'योग मेंस हिंदू एसोसिएशन' तथा 'आर्य समाज' जैसी संस्थाओं की स्थापना की।

1910 और 1911 ई. के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में मॉरीशस के भारतवंशियों का प्रतिनिधित्व किया। साथ ही, मणिलाल डॉक्टर दक्षिण अफ्रीका जाकर गांधी जी को मॉरीशस के भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के उत्थान के लिए किए गए कार्यों का विवरण दिया करते थे। मणिलाल डॉक्टर के मॉरीशस में सत्याग्रह सुधार आंदोलन से प्रभावित होकर दो भारतीयों ने सन् 1911 ईसवी में चुनाव लड़े, पंडित काशीनाथ और पं. रामावद्य उच्च शिक्षा के लिए भारत गए जबकि रामखेलावन बुधन बैरिस्टरी शिक्षा के लिए विलायत पहुँचे। गांधीजी, मणिलाल डॉक्टर जैसे भारतीयों की प्रेरणा के कारण मॉरीशस के राजनैतिक संघर्ष में भारतीय मूल के लोग आगे रहते हुए सत्ता तक पहुँच सके जैसे :- सर शिव सागर राम गुलाम मॉरीशस के प्रथम राष्ट्रपति और राष्ट्रपिता हुए। 


तोताराम सनाढ्य


तोताराम सनाढ्य जी फिजी के बंधुआ मजदू थे। उनको भारत से अरकाटी लोग बहला फुसलाकर फिजी में गन्ने के बागानों में काम करने के लिए ले गए। उन्होंने फिजी में रहते हुए कई प्रकार के कष्ट सहे। इसके अलावा उनका अनुबंध समाप्त होने के बाद भी उन्होंने प्रवासी भारतवासियों की अनेक प्रकार से मदद भी की और उनके मुक्ति के लिए प्रयत्न भी किए। उन्होंने बेगुनाह भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों से रक्षा करने के लिए किसी बैरिस्टर को भेजने की प्रार्थना करते हुए गांधी जी को पत्र लिखा। उन्होंने अपने अनुभवों को 'फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष पुस्तक में लिखा और वे महात्मा गांधी के संपर्क में भी बने रहे। इस पुस्तक का गिरमिटिया प्रथा के उन्मूलन में बहुत बड़ा योगदान है।


गोपालकृष्ण गोखले


गांधी जी के कहने पर दक्षिण अफ्रीका में गोखले 1911 ई. में आए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका आकर नेटाल, जोहान्सबर्ग, डरबन तथा ट्रांसवाल की यात्रा की। इस यात्रा में उन्होंने भारतीयों की दुर्गति को अपनी आँखों से देखा। राजर्षि गोखले ने इस प्रथा के विरुद्ध प्रस्ताव रखते हुए इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में कहा था:


"सरकार कुछ भी कहे, इस देश में सब यह समझते हैं कि यह प्रथा सरकार की सहमति और भागीदारी के बिना कभी की समाप्त हो गई होती।

इस समय भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ से गिरमिट मजदूर जाते हैं, भारत को इस अपमान का भागीदार क्यों बनाया जा रहा है ? भारत की अंतरात्मा दुर्भाग्य से बहुत दिनों से सो रही थी। अब उसे इस समस्या की विराटता का अनुभव हुआ है और मुझे कोई संदेह नहीं है कि वह अपने को अभिव्यक्त किए बिना चैन नहीं लेगी। मैं सरकार से कहूँगा कि हमारी भावनाओं की अवहेलना न करे। " (गोपालकृष्ण गोखले, 4 मार्च, 1912 भारत की इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में भाषण )


गोखले का यह प्रस्ताव ऐतिहासिक माना जाता है और इसे गोपाल कृष्ण गोखले की भारतीय राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण देन माना जाता है। 


प्रवासी भारतीयों की समस्या और कमीशन की नियुक्ति


1913 ई. में भारतवर्ष से एक कमीशन नियुक्त हुआ, सरकार ने इस कमीशन में दो आदमी नियुक्त किए थे, एक मकनील साहब और दूसरे श्रीयुत चिम्मनलाल जी। जिन-जिन कोठियों में कमीशन गया वहाँ बागान मालिकों के सामने ही भारतीय श्रमिकों से प्रश्न किए गए। अत्याचारी के सामने उसके विरुद्ध गवाही देना बहुत ही कठिन काम है। यह काम और भी कठिन हो जाता है, जब पाँच वर्ष उस अत्याचारी के नीचे और काम करना हो। कमीशन के सदस्य नोकोमोदी भी गए थे, जहाँ से कि वाइनी वकासी नामक कोठी एक मील थी। इसी कोठी में कुंती नामक चमारिन रहती है। कमीशन के सदस्यों ने कुती से पूछताछ करने का कष्ट ही नहीं उठाया।


सी. एफ. एंड्रयूज


महात्मा गांधी की सलाह पर एंड्रयूज 1915 1917 ई. में फिज़ी की परिस्थितियों का विश्लेषण करने फिजी गए थे। 1936 ई. में जब वे आस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड की यात्रा पर थे तब उन्हें फिजी आमंत्रित किया गया और वे पुन: फिजी गए। एंड्रयूज ने शोषित भारतीय अनुबंधित / गिरमिटिया श्रमिकों की मुक्ति के लिए संघर्ष किया और अंतत उन्हें सफलता मिली। फिजी में ही उन्हें सबसे पहले दीनबंधु के संबोधन से अलंकृत किया गया था। वहाँ से भारत लौटकर दीनबंधु एंड्रयूज ने अपना संपूर्ण जीवन श्रमिकों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। फिजी के बंधुआ मज़दूरों को मुक्ति दिलाने व उनका जीवन बेहतर बनाने के प्रयास के लिए 'एंड्रयूज' की भूमिका सदैव याद की जाएगी।


फरवरी 1916 ई. को सी. एफ. एंड्रयूज व पियरसन की 'फिजी गिरमिटिया श्रम रिपोर्टी (Indentured Labour In Fiji) जारी की गई थी। इस रिपोर्ट के पश्चात् ही गिरमिटियों की ओर अनेक संस्थाओं और सरकार का ध्यान आकृष्ट हुआ व गिरमिटिया श्रमिकों को मुक्ति मिल पाई थी। इस संदर्भ में एंड्रयूज के व्यक्तिगत प्रयास सराहनीय रहे।


पंडित मदनमोहन मालवीय


पं. मदन मोहन मालवीय ने 20 मार्च, 1916 ई. में गिरमिट प्रथा समाप्त करने से संबंधित प्रस्ताव इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में रखा।

उन्होंने अरकाटियों द्वारा भोले-भाले भारतीयों को धोखा से फसाने के साथ अन्यायपूर्ण अनुबंध / एग्रीमेंट होने की बात की। मालवीय जी ने 23 सितंबर, 1916 ई. को पत्र के माध्यम से अपनी माँग को दोहराया। इस बीच गिरमिटिया प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए संपूर्ण भारत में प्रचार अभियान की शुरुआत की गई तथा प्रवासन की खामियों को जनता के सामने लाया गया। 15 नवंबर, 1916 ई. को भारी जनदबावों के मध्य प्रस्ताव को प्रकाशित करने का आदेश दिया गया, जो 18 नवंबर, 1916 ई. को प्रकाशित हुआ। 16 जनवरी, 1917 ई. को ब्रिटिश सरकार ने चेम्सफोर्ड को पत्र के माध्यम से आदेश दिया कि नए विकल्प की खोज न होने तक बागान मालिकों को परेशान न किया जाए।

17 जनवरी को चेम्सफोर्ड ने मालवीय जी के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया तथा 7 फरवरी, 1917 ई. को सदन में मालवीय जी को संतुष्ट करते हुए भाषण दिया कि सरकार को उपयुक्त निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए पर्याप्त समय चाहिए। सदन में नए विकल्प के परामर्श स्वरूप अधिकतर प्रांतीय सरकारों द्वारा गिरमिटिया प्रवासन को पूर्णतया बंद करने की बात सामने आई। 1917 ई. के शुरुआती महीनों में प्रस्ताव को ख़ारिज करने के विरोध में प्रमुख स्थानों पर जन सभाएँ हुई तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं (भारत-मित्र, अभ्युदय, स्वराज्य, भारतीय लोग, एडवोकेड आदि) में लेख लिखे गए इस समय गांधी जी ने संपूर्ण भारत में आंदोलन करने का विचार दिया।

09 फरवरी, 1917 को एक आम जनसभा में 31 मई, 1917 ई. तक इस प्रथा को पूर्ण प्रतिबंध करने का प्रस्ताव पास कर लिया गया तथा इसके विरुद्ध आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार कर ली गई। मार्च, 1917 ई. को सदन की बैठक में असंतुष्ट भारतीयों संतोष देते हुए चेम्सफोर्ड ने प्रवासन के प्रति असंतोष को बताया तथा बिना विकल्प के तत्काल गिरमिटिया-प्रवासन को प्रतिबंधित कर लार्ड हार्डिंग के अधूरे कार्य को पूरा किया। 12 अप्रैल, 1917 ई. को गिरमिटिया प्रवासन को प्रतिबंधित नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। 1 जनवरी, 1920 ई. तक भारत से पूर्णतया प्रवासन- प्रक्रिया को रोक दिया गया।


जवाहरलाल नेहरु


भारत की विदेश नीति को आकार देने वाले जवाहरलाल नेहरु 1930 ई. तक कांग्रेस में इस मुददे पर अलग राय रखते थे।

नेहरू इस बात से परिचित थे कि विदेशों में रह रहे भारतीय और वहाँ के स्थानीय लोगों के हितों में टकराव की स्थिति बन सकती है। 1927 ई. में उन्होंने 'भारत की विदेश नीति' (A foreign Policy of India) नामक शीर्षक से नीति पत्र तैयार किया, जिसमें उन्होंने पहली बार विदेशों में रह रहे भारतीयों के प्रति कांग्रेस की नीति को स्पष्ट किया। इसमें उन्होंने यह भी उदधृत किया कि भारत अपने डायस्पोरा से किस प्रकार की भूमिका की अपेक्षा करता है और भारतीय डायस्पोरा को किस प्रकार की अपेक्षा भारत से करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका के लोगों की मदद करनी चाहिए और अपने लिए किसी विशेष स्थान, स्तर और सहूलियतों की माँग नहीं करनी चाहिए। इसी बीच 1929 ई. में कांग्रेस ने एक विदेशी विभाग स्थापित किया जिसका उद्देश्य था भारत का विदेश तथा वहाँ बसे लोगों के बीच संवाद स्थापित करना। जवारलाल नेहरू इसके प्रभारी बनाए गए।


इसके साथ ही भारत की आम पहचान की भावना से अलग पहचान बनाने के लिए 1940 और 1950 ई. के दशक में उन्होंने एशियाई मामलों में भारत की भागीदारी को प्रेरित किया। भारत अपने आप को विदेश नीति में बाहरी हस्तक्षेप से दूर रखना चाहता था। एशियाई सम्मेलन की शिखर बैठक जो इंडोनेशिया और बांडुंग में हुई, जिसमें उन्होने अफ्रीका और एशिया के नव स्वतंत्र राष्ट्रों के बीच क्षेत्रीय सहयोग के साथ अफ्रीका और एशिया में रह रहे प्रवासी भारतीयों और स्थानीय निवासियों के बीच टकराव न हो सके, ऐसी इच्छा जाहिर की।


1939 ई. में अपने संदेश में नेहरु ने कहा “ आज भारत कमजोर है और इसलिए वह विदेश में रह रहे भारतीयों के लिए अधिक कुछ नहीं कर पा रहा है,

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उन्हें भूल गया है। विदेशों में रह रहे भारतीयों की बेइज्जती, भारत की बेइज्जती और दुःख है। एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब भारत ऐसे लोगों को संरक्षण और न्याय दे पाएगा। नेहरु की नीतियों की यह द्वंद्वात्मकता और कांग्रेस में मौजूद दो धाराएँ (संरक्षणवादी और प्रगतिशील) हमें भारत की भारतीय डायस्पोरा के प्रति नीतियों में आ रहे बदलाव और निरंतरता को समझने में मदद करती है।


18 मार्च, 1946 ई. में नेहरु ने सिंगापुर की ऐतिहासिक यात्रा की। वहाँ उन्होंने 10,000 से अधिक भारतीयों की भीड़ को संबोधित करते हुए वादा किया था कि भारत को जब स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है

तो वह तुरंत ही फैसला करेगा कि जो भारतीय नागरिक हैं यदि वे विदेशों में बसना चाहते हैं या वापस आना चाहते हैं, ये उन्हें ही फैसला करना होगा। उनके लिए भारत में हमेशा द्वार खुला होगा। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के भेदभाव के मुद्दे को 2 सितंबर, 1946 ई. में संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्र मंडल के समक्ष उन्होंने एक प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया। 4.1.4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रवासी भारतीयों के लिए प्रयास


औपनिवेशिक काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद से ही महात्मा गांधी ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों की समस्याओं के प्रति अपनी संवेदना और चिंता व्यक्त की। कांग्रेस के नेताओं के कार्यों एवं प्रयासों से ही प्रवासी भारतीयों के प्रति प्रवासी नीतियों का उद्भव की पृष्ठभूमि तैयार


कांग्रेस के सदस्य विभिन्न उपनिवेशों में जाकर प्रवासी भारतीयों के लिए कार्य किया और विश्व मंच के साथ-साथ कांग्रेस के वार्षिक सत्रों में प्रवासी भारतीयों के समस्या से जुड़े मुद्दे को उठाया।