नवीन भाषा एवं विविध काव्य-विधाओं का सूत्रपात - Initiation of new language and various poetic forms
नवीन भाषा एवं विविध काव्य-विधाओं का सूत्रपात - Initiation of new language and various poetic forms
भारतेन्दु के गद्य और काव्य दोनों की भाषाएँ अलग-अलग थीं । भारतेन्दु ने गद्य लेखन के लिए खड़ीबोली का चयन किया जबकि काव्य लेखन के लिए परम्परा से चली आ रही ब्रजभाषा का। हालाँकि भारतेन्दु ने खड़ीबोली में भी कुछ कविताओं का प्रणयन किया किन्तु उनका मत था कि ब्रजभाषा ही कविता के लिए अधिक अनुकूल है। वस्तुतः भारतेन्दु के काव्य-लोक में अन्तर्वस्तु और भाषा दोनों ही का समयानुरूप विकास दिखाई पड़ता है। उनकी कविताओं का बड़ा हिस्सा भक्ति और शृंगारपरक रचनाओं का है। ये रचनाएँ भक्तिकालीन और रीतिकालीन प्रवृत्तियों के अनुसरण पर ही लिखी गई हैं।
जो रचनाएँ पुनर्जागरणका सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों पर केन्द्रित हैं उनमें से अधिकांश इनके नाटकों और अन्य गद्य विधाओं का हिस्सा हैं, साथ ही इन्होंने इन विषयों पर स्वतन्त्र कविताओं का भी लेखन किया। इन कविताओं में ताज़गी, उमंग और युगबोध की सजीव अभिव्यक्ति है।
ब्रजभाषा में प्रेम और भक्ति की अनेक कविताएँ लिखने के साथ ही भारतेन्दुने खड़ीबोली में भी कविता लिखने का प्रयास किया ।
"सन् 1881 में भारतेन्दु ने अपनी खड़ीबोली की कविताएँ 'भारत मित्र' में प्रकाशनार्थ भेजी थीं। 1874 में हरिश्चन्द्र चन्द्रिका में भी उनकी एक प्रसिद्ध कविता 'मन्द मन्द आवे देखो प्रात समीरन' पयार छन्द में छपी थी। उनका एक निबन्ध है 'हिन्दी भाषा'। उसी का एक उपशीर्षक है 'नयी भाषा की कविता' । इसी के तहत अपना बनाया हुआ एक दोहा उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा है-
भजन करो श्रीकृष्ण का मिलकर के सबलोग । सिद्ध होयगा काम और छूटेगा सब रोग ॥ २३
इसी निबन्ध में भारतेन्दु ने माना कि खड़ीबोली में कविता लेखन उनके चित्तानुरूप नहीं है। 'दसरथ विलाप' जैसी कुछ कविताएँ ही खड़ीबोली में आयीं।
लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय का मत है कि "ब्रजभाषा में कविता लेखन के इतने दिनों की परम्परा से एकदम विमुख हो जाना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के लिए भी एकदम सरल नहीं था। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव भी इतना जबरदस्त था कि उनके जीवनकाल में किसी को भी ब्रजभाषा के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस नहीं हुआ। "24 यह सत्य है कि भारतेन्दु ने ब्रजभाषा को ही कविता की भाषा के रूप में अधिक उपयुक्त माना लेकिन उन्होंने खड़ीबोली में कुछ कविताएँ लिखकर और अपने नाटकों में अनेक लावनी और गीतों को खड़ीबोली में सृजित कर भविष्य की काव्य-भाषा का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 'अन्धेर नगरी' के चूरन और पाचक बेचने वालों के गीत और 'सती प्रताप' का 'तुम पर काल अचानक टूटेगा' पद्यगान इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।
भारतेन्दु ने अपने काव्य लेखन में जिस तरह ब्रज के साथ-साथ खड़ीबोली का प्रयोग किया उसी तरह प्राचीन के साथ-साथ नवीन काव्य-विधाओं का भी प्रणयन किया। एक ओर उन्होंने भक्ति और रीतिकाल की पद, दोहा और कवित्त सवैया जैसी पारम्परिक काव्य परिपाटी को अंगीकार किया तो दूसरी ओर निबन्ध काव्य, वर्णनात्मक काव्य और विवरणात्मक काव्य जैसी नवीन काव्य-विधाओं का सूत्रपात भी किया।
भारतेन्दु ने प्रबन्ध काव्य तो नहीं लिखे लेकिन उनकी 'बकरी विलाप', 'रिपुनष्टक', 'होली लीला', 'हिंडोला' और 'विजयिनी विजय वैजयन्ती' जैसी अनेक रचनाएँ प्रबन्ध और मुक्तकों के बीच की रचनाएँ हैं।
किशोरीलाल गुप्त ने इन नवीन काव्य-विधाओं को निबन्ध काव्य, वर्णनात्मक काव्य और विवरणात्मक काव्य नाम दिया है । निबन्ध काव्यों में कोई कथा-सूत्र नहीं होता है। इसमें किसी एक विषय पर सुसम्बद्ध और चिन्तन परम छन्द लिखे जाते हैं। इसे पद्यबद्ध लेख के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जैसे बकरी विलाप, हिन्दी की उन्नति पर व्याख्या । वर्णनात्मक काव्य में भी कथासूत्र का अभाव होता है। इसमें किसी दृश्य का काव्यात्मक वर्णन किया जाता है। जैसे- 'होली लीला', 'हिंडोला' आदि। विवरणात्मक काव्य में कथा का क्षीण सूत्र विद्यमान रहता है। इसमें किसी घटना का विवरण प्रस्तुत किया जाता है जैसे विजयिनी विजय वैजयन्ती' में मिश्र विजय की घटना का विवरण है। इस तरह ये काव्य-विधाएँ भारतेन्दु की मौलिक देन हैं।
भारतेन्दु ने पद, दोहा और कवित्त-सवैया जैसे पारम्परिक मुक्तक छन्दों के अतिरिक्त लोकगीतों की अनेक विधाओं में बहुत सरस काव्य लिखा। कजली, होली, चैता, ठुमरी, दादरा, लावनी और ग़ज़ल जैसी लोकगीतों की विधाओं का भारतेन्दु ने खूब प्रयोग किया है। इसके साथ ही पहेलियाँ, मुकरियाँ, सखून और समस्यापूर्तियों का भी भारतेन्दु ने सुन्दर प्रयोग किया है । भारतेन्दु के स्तोत्रकाव्य भी उल्लेखनीय हैं। उन्होंने श्रीनाथ स्तुति, श्रीसीता वल्लभ स्तोत्र और प्रातः स्मरण स्तोत्र सरीखे कई स्तोत्रकाव्यों का प्रणयन किया।
भारतेन्दु की कविता काव्यभाषा और काव्य-विधाओं दोनों ही दृष्टियों से एक ओर पूर्ववर्ती परम्परा बँधी हुई है तो दूसरी ओर भविष्य का नया मार्ग भी प्रशस्त करती है। कविता की नूतन भाषा और नित नये काव्य रूप भारतेन्दु की कविता के वितान को और विस्तृत स्वरूप देते हैं।
वार्तालाप में शामिल हों