भारत की प्रसिद्ध लोक-कलाओं का परिचय - Introduction to famous folk arts of India

भारत की प्रसिद्ध लोक-कलाओं का परिचय - Introduction to famous folk arts of India


लोक-कलाएँ लोक समाज की सहज अभिव्यक्ति का सुन्दर स्वरूप हैं। ये कलाएँ युगों से चली आ रही वह परम्परा है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होती है। ये कलाएँ लोक समाज की धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं, आस्थाओं और विश्वास के साथ पली-बढ़ी हैं। इनमें सौन्दर्य तत्त्व ही नहीं वरन् जन समाज में प्रचलित धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक तत्त्व भी निहित होते हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों में प्रसिद्ध और प्रचलित लोक- कलाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-


1. मॉंडणा


लोक कलाओं में भूमि अलंकरण का विशेष महत्त्व है। विभिन्न मांगलिक अवसरों पर विविध प्रकार के सुन्दर चित्र भूमि पर बनाए जाते हैं

जिसके लिए सहज उपलब्ध वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। अलग-अलग प्रदेशों में भूमि अलंकरण के लिए अलग-अलग शैलियों का प्रयोग किया जाता है। जैसे दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में रंगोली, बिहार में अरिचन, बंगाल में अल्पना, राजस्थान में मांडणा आदि ।


भूमि अलंकरण कलाओं में मांडणा की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। मांडणा शब्द मंडन से बना है, जिसका अर्थ है, 'सजाना', 'सज्जा' गैरिक पृष्ठभूमि पर बनाए जाने वाले मांडणों का राजस्थानी लोक समाज में विशेष महत्त्व है। मांडणे मन के उत्साह, प्रसन्नता और माँगलिक भावनाओं को व्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम हैं।

इन्हें शुभ-मंगल का प्रतीक माना जाता है। विविध उत्सवों, त्योहारों, जन्मोत्सव, विवाह, यज्ञ-हवन आदि मांगलिक अनुष्ठानों पर मांडणे बनाए जाते हैं। इन्हें बनाने के लिए गेरू मिट्टी, सफेद खड़िया और पांडु (पीली मिट्टी) का प्रयोग किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ कच्चे घर होते हैं, वहाँ गोबर से आँगन को लीपा जाता है जबकि पक्के घरों में फर्श को गेरू मिट्टी से लीपा जाता है। ये मांडणे की पृष्ठभूमि होती है और इसके सूखने पर खड़िया तथा पांडु का प्रयोग करते हुए विविध आकृतियाँ बनाई जाती हैं।


मांडणे की पारम्परिक आकृतियों में चतुर्भुज, त्रिभुज, षट्कोण, अष्टकोण, वृत्त आदि ज्यामितीय आकृतियाँ मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त कमल, सूर्य, चाँद, सितारे, स्वास्तिक,

कलश, पगलिया, शतरंज पट का आधार, आडी-सीधी रेखाएँ, तरंग की आकृति आदि का भी अंकन किया जाता है। ये आकृतियाँ सामाजिक तथा धार्मिक परम्पाराओं पर आधारित होती हैं जो वर्षों पुराने रीति-रिवाज और विभिन्न पर्वो पर लोक समाज विशेषकर नारी के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती हैं। इन आकृतियों में स्वास्तिक का चिह्न सर्वाधिक मांगलिक माना जाता है, यह विष्णु का प्रतीक है। इसी प्रकार दो त्रिभुजों को जोड़कर बनाया गया षट्कोण लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। चतुष्कोण चारों दिशाओं का प्रतीक है तो त्रिकोण त्रिदेव ( ब्रह्मा-विष्णु-महेश) का त्रिगुण सात्त्विक राजसिक- तामसिक भावों का तथा त्रिशक्ति ज्ञान- इच्छा-क्रिया का प्रतीक है। सूर्य अग्नि का तो कुम्भ जल का प्रतीक है।


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है कि 'आँगन कभी कुँवारा नहीं रहना चाहिए' अर्थात् आँगन में विविध प्रकार के मांडणे बनाकर उसे सुसज्जित करना चाहिए। विविध उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर विविध प्रकार के मांडणे जहाँ घर आँगन के सौन्दर्य में श्रीवृद्धि करते हैं वहीं मांगलिक भावनाओं और कामनाओं की भी अभिव्यक्ति करते हैं। दीपावली के अवसर पर तो यह कला लोकप्रथा का रूप धारण कर लेती है। घर के मुख्य द्वार, अतिथि कक्ष, पूजा स्थल पर सुन्दर मनोहारी मांडणों का अंकन किया जाता है तथा उन्हें दीपों से सजाया जाता है। दीयों के प्रकाश में मांडणे का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है। इसी प्रकार होली पर चंग बाजोट, चौपड़ का मंडन किया जाता है।

विवाह अवसर पर स्वास्तिक, कलश, चौक आदि माँडे जाते हैं। धन-धान्य से सम्पन्न रहने की कामना के साथ इन माँडणों पर मूँग, चावल, गेहूँ अत्यल्प मात्रा में रखे जाते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मांडणा चित्र मात्र नहीं है वरन् ये तो लोक समाज की आस्था, विश्वास और मंगलकामना का वह प्रतीक है जो युगों-युगों से परम्परा पोषित लोक मानस को आत्मिक आनन्द और संतुष्टि प्रदान करता आ रहा है।


2. मेहँदी


लोक कलाओं में विविध माध्यमों से अलंकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है। अलंकरण की इसी भावना का प्रभाव देह-सौन्दर्य के लिए भी दृष्टिगोचर होता है।

जन समाज भूमि और भित्ति अलंकरण के साथ देह अलंकरण के लिए भी विविध साधनों का प्रयोग करता है। शारीरिक सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आकर्षक वस्त्र और आभूषणों के साथ ही देहांगों पर बनाए जाने वाले कलात्मक चित्रों का भी पर्याप्त महत्त्व होता है। शरीर के विविध अंगों पर गुदना, महावर और मेहँदी के द्वारा सुन्दर कलाकृतियाँ बनाई जाती हैं। गुदना स्थायी तौर पर रहता है, वहीं महावर कुछ सीमित समय तक ही अपना प्रभाव दिखाता है जबकि मेहँदी अपेक्षाकृत अधिक समय (पाँच से सात दिन ) तक बनी रहती है। अतः मेहँदी के प्रति जन समाज में विशेष आकर्षण का भाव बना रहता है। मेहँदी शब्द संस्कृत के मेंधिका का अपभ्रंश है।

इसके लिए हिना शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। वैदिक काल में मेहँदी का • उल्लेख सूर्य के आन्तरिक और हल्दी का उल्लेख सूर्य के बाह्य भाग के प्रतीक के रूप में मिलता है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में मेहंदी को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। मेहंदी को स्त्रियों के सोलह शृंगार और चौंसठ कलाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। विभिन्न त्योहारों, मांगलिक अवसरों पर स्त्रियाँ स्वयं को सँवारने और अपने उत्साह और उल्लास को प्रकट करने के लिए हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं।



मेहंदी लगाने की तीन परम्परागत विधियाँ हैं एक, मेहँदी के ताजा पत्तों को पीसकर उनका लेप हाथ-पैरों - पर लगा लिया जाता है।

दूसरा, मेहँदी के पत्तों को सुखाकर बारीक चूर्ण बनाकर उसमें पानी मिलाकर गाढ़ा घोल बना लिया जाता है और तूलिका या सौंक से उठाकर हाथों-पैरों पर मनचाही आकृतियाँ बनाई जाती हैं। राजस्थानी समाज में एक और विधि का प्रयोग किया जाता है जिसमें मेहँदी के घोल में भिंडी का रस मिलाकर उसे चिपचिपा बना लिया जाता है और तर्जनी और अँगूठे के बीच थोड़ी-थोड़ी मेहँदी लेकर चेप बनाते हुए सुन्दर आकृतियाँ बनाई जाती हैं।


विवाहित स्त्रियाँ हाथ-पैरों पर मेहंदी लगाती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएँ केवल अपने हाथों पर मेहँदी लगाती हैं। परम्परागत रूप में चाँद, सूरज, फूल-पत्ती, चक्र,

लहतरिया, घेवर, पान, कैरी, कलश, मोर आदि आकृतियों का चित्रण किया जाता है, वहीं मांडणे में प्रयुक्त आकृतियों को भी बारीकी से बनाया जाता है। विवाह अवसर पर मेहंदी की रस्म भी निभाई जाती है और मेहँदी से सम्बद्ध गीत गाये जाते हैं। अतः कहा जा सकता है कि मेहेंदी माँडने की परम्परा सौभाग्य और मंगल की प्रतीक है। भारत के लोक समाज में सभी मांगलिक अवसरों और त्योहारों पर इसे लगाया जाता है। मेहँदी के बिना नारी का शृंगार अधूरा है।


3. पट चित्र


भारतीय लोक समाज में चित्रकला की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। आदिकाल में गुफाओं की कठोर चट्टानों पर की जाने वाली चित्रकारी निरन्तर विकसित होती रही और आज इसकी अनेक शैलियाँ और उपशैलियाँ विकसित हो चुकी हैं।

इन्हीं शैलियों में एक प्रमुख और प्रसिद्ध शैली है, 'पट चित्र'। पट चित्र कैनवास (चित्र फलक) पर बनाई जाने वाली चित्रकारी है। प्रायः चित्रकारी के लिए तीन प्रकार के चित्र फलकों का प्रयोग किया जाता है-


1. ताड़ के पत्तों से निर्मित चित्रफलक इस शैली का प्रयोग उड़ीसा में अधिक लोकप्रिय है। 2. कपड़े से निर्मित चित्रफलक इस शैली का प्रयोग राजस्थान में अधिक किया जाता है।



3. कागज द्वारा निर्मित चित्रफलक कागज के चित्रफलक पर बनाए गए चित्रों का प्रयोग पोथियों में किया जाता है।


ताड़ के पत्तों से चित्रफलक बनाने के लिए ताड़ के पत्तों को जोड़कर चौकोर आकार दिया जाता है और फिर उस पर चित्रकारी की जाती है।

कपड़े का चित्रफलक बनाने के लिए खादी के वस्त्र पर आटे या चावल का माँड लगाकर कपड़े की घुटाई की जाती है। इससे कपड़े की चमक और चिकनाई बढ़ जाती है और वह इतना सख्त हो जाता है कि चित्रकारी के दौरान रंगों के बहने का भय नहीं रहता। कपड़े का कैनवास बनाने के लिए उड़ीसा में अलग विधि का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए शिल्पकार इमली के बीजों को भिगोकर पीस लेता है और उसे गर्म कर गाढ़ा घोल बनाता है। इस घोल से दो कपड़ों को चिपका दिया जाता है और उस पर मिट्टी का लेप किया जाता है। कपड़ा सूखने पर पक्का हो जाता है तब उस पर पॉलिश की जाती है। इस प्रक्रिया में कपड़ा चमड़े की तरह मजबूत और उसकी सतह नरम हो जाती है। इस प्रकार तैयार कैनवास पर विविध भाँति की चित्रकारी की जाती है।


पट चित्रों में प्रायः राजा-महाराजाओं के चित्र, देवी-देवताओं के चित्र, रामायण और भागवत कथा से सम्बद्ध चित्र, लोकप्रसिद्ध नायकों की कथा के चित्र आदि बनाए जाते हैं। इन पट चित्रों में सौन्दर्य की सृष्टि के लिए प्राकृतिक तत्त्वों यथा पशु-पक्षियों, फूलों-फलों, पेड़ों-लताओं का चित्रण भी किया जाता है। इसमें सौन्दर्य वृद्धि के लिए प्रायः बॉर्डर बनाए जाते हैं। इनमें चित्रित नायक-नायिका के नेत्रों का चित्रण विशिष्ट प्रकार से किया जाता है। नेत्र उठे हुए और कानों तक खिंचे हुए होते हैं। भौहों का फैलाव भी नेत्रों के समान ही होता है। नाक अनुपात से अधिक लम्बी और ठोड़ी बाहर की ओर उभरी हुई होती है। पट चित्रों में रंग-संयोजन का विशेष महत्त्व होता है।

चित्रों में प्रयुक्त रंग प्राकृतिक होते हैं जो वर्षों तक फीके नहीं पड़ते । लोक चित्र शैलियों में चित्रित आकृतियों के भावों का प्रदर्शन ही इनका मूल उद्देश्य होता है किन्तु पट चित्र में भाव अंकन के साथ ही सुघड़ता को पर्याप्त महत्त्व दिया जाता है जिससे यह शास्त्रीय शैली के समीप दिखाई देती है।



भित्ति चित्र


मनुष्य में सौन्दर्य के प्रति आकर्षण की स्वाभाविक प्रवृत्ति पाई जाती है। इसी प्रवृत्ति के कारण वह अपने आस-पास के वातावरण और स्वयं को सुन्दर बनाने, अलंकृत करने के लिए विशेष प्रयास करता है।

लोक समाज में अलंकरण के तीन रूप प्रचलित हैं- भूमि अलंकरण, भित्ति अलंकरण, देह अलंकरण देह अलंकरण के द्वारा स्वयं के शरीर को सुसज्जित करने की भावना होती है वहीं भूमि और भित्ति अलंकरण अपने घर को अलंकृत करने की कलाएँ हैं। भूमि अलंकरण के अन्तर्गत मांडणा और देह अलंकरण के अन्तर्गत मेहँदी का वर्णन किया जा चुका है। भित्ति अलंकरण कला में दीवारों पर सुन्दर चित्र बनाकर उन्हें सौन्दर्य से युक्त बनाया जाता है वहीं इसके अन्तर्गत लोक समाज की धार्मिक भावनाओं को भी प्रश्रय मिला है।


भित्ति चित्र बनाने की परम्परा आदिम काल से चली आ रही है। भीमबेटका की गुफाओं में प्राप्त भित्ति चित्र प्राचीनकाल के हैं। यही कला धीरे-धीरे विकसित होती गई और आज भित्ति चित्रण के लिए विविध शैलियों का प्रयोग किया जाता है। जैसे-


1. भूमि अलंकरण के लिए बनाए जाने वाले मांडणों का अंकन दीवारों को सुन्दर बनाने के लिए भी किया जाता है। इनकी रचना के लिए भूमि पर बनाए जाने वाली रचना-प्रक्रिया का ही निर्वाह किया जाता है। दीवारों पर बनाए जाने वाले मांडणों में धार्मिक आस्था के चिह्न, देवी-देवताओं के प्रतीक, स्वास्तिक आदि को प्राथमिकता दी जाती है। विभिन्न धार्मिक पर्वों, जैसे दीपावली, नागपंचमी, गणगौर पर अपने आराध्य के प्रतीकस्वरूप मांडणे दीवारों पर चित्रित किए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। घर के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ आकर्षक बेल-बूटे, कलश, स्वास्तिक आदि बनाकर उसे सुन्दर और आकर्षक बनाया जाता है।


2. भित्ति चित्र के लिए दीवार पर विविध रंगों का प्रयोग कर आकर्षक चित्र बनाने की परम्परा भी विद्यमान है। इसके अन्तर्गत प्रायः पशु-पक्षियों, लोक समाज की झाँकी, देवी-देवताओं सम्बन्धी प्रसंगों के चित्र बनाकर दीवारों को सजाया जाता है। विवाह तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर प्रवेश द्वार के दोनों तरफ बनाए जाने वाले हाथी का चित्र वैभव का प्रतीक है तो मोर का चित्र सौन्दर्य का, वहीं कलश लिये महिला का चित्र शुभता का सूचक माना जाता है। इन चित्रों को बनाने के लिए प्रायः चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है।


3. भित्ति चित्र मात्र दीवारों के अलंकरण की कला ही नहीं है वरन् ये लोक समाज की आस्था, विश्वास का भी प्रतीक है। पारम्परिक भित्ति चित्र की एक शैली है, 'संजा'। इसमें दीवारों पर मिट्टी और गोबर को मिलाकर बनाए गए मिश्रण से कलात्मक दैवीय आकृतियाँ उकेरी जाती हैं और उन्हें फूलों- रंगों इत्यादि से सजाया जाता है। परम्परागत विधि-विधान से इनकी पूजा की जाती है। यह कला धार्मिक विश्वासों और सामाजिक मान्यताओं का सुन्दर संयोजन है।