भारत के प्रसिद्ध लोक नृत्यों का परिचय - Introduction to famous folk dances of India
भारत के प्रसिद्ध लोक नृत्यों का परिचय - Introduction to famous folk dances of India
घूमर
घूमर नृत्य भारत में प्रचलित कुछ प्रमुख लोक नृत्य शैलियों में से एक है। यह राजस्थान में प्रचलित अत्यन्त लोकप्रिय नृत्य है, जिसे केवल स्त्रियाँ ही करती हैं। इस नृत्य में महिलाएँ लम्बे, कलीदार घाघरे और रंग-बिरंगी चुनरी व काँचली पहनकर जिस पर सुनहरी गोटा, सलमा सितारा लगा होता है, नृत्य करती हैं। घूमर नृत्य तीज-त्योहारों, होली, दुर्गा पूजा, नवरात्रि, गणगौर तथा विभिन्न लोकोत्सव के अवसर पर आयोजित होता है। जब स्त्रियाँ एक गोल घेरे में चक्कर लगाते हुए नृत्य करती हैं तो उनके लहँगे का घेर व हाथों का संचालन अत्यन्त आकर्षक दृश्य उपस्थित करता है।
लहँगे के घेर को 'कुम्भ' कहते हैं इसीलिए इसको घूमर नृत्य कहा जाता है। यह घूमर गोलाकार सामूहिक रूप में प्रस्तुत की जाती है व साथ में ताल भी झुकते हुए लगती है।
अग्नि नृत्य
राजस्थान में अग्नि नृत्य का आरम्भ 'जसनाथी सम्प्रदाय' के सिद्धों द्वारा किया गया। इस नृत्य का उद्गम स्थल बीकानेर का 'कतरियासर ग्राम माना जाता है। इस अग्नि नृत्य में 6 फीट लम्बा, 4 फीट चौड़ा तथा 3-4 फीट ऊँचाई का अंगारों का ढेर लगाया जाता है। उसके चारों ओर पानी छिड़का जाता है। नर्तक पहले तेजी के साथ अंगारों से निर्मित इस 'धूण' की परिक्रमा करते हैं और फिर गुरु की आज्ञा लेकर 'फतह' - 'फतह' कहते हुए अंगारों पर प्रवेश करते हैं।
नृतक उच्च स्वर में ऊंकार की ध्वनि करते हुए अंगारों पर नृत्य करता है तथा इसके साथ-साथ आस-पास खड़े उसके सहयोगी जोर-जोर से नगाड़ों की ध्वनि से नृत्य के साथ संगत देते हैं। अग्नि-नृत्य करते समय इसके साथ-साथ लगातार नगाड़ों का बजना आवश्यक होता है। यह नृत्य एक विशेष लय, ताल तथा अभिनय मुद्राओं के साथ सम्पन्न होता है। अग्निनृत्य में केवल पुरुष भाग लेते हैं। उनके सिर पर पगड़ी होती है तथा वे धोती-कुर्ता और पाँव में कड़ा पहनते हैं। नृत्य के दौरान नर्तक अनेक प्रकार के करतब आदि भी करते हैं।
चरी नृत्य
राजस्थान के अजमेर-किशनगढ़ क्षेत्र में गुर्जर समुदाय की महिलाओं द्वारा चरी नृत्य किया जाता है।
'चरी' पीतल का बना, मटके की आकृति का एक पात्र होता है। चूँकि इस नृत्य में चरी का इस्तेमाल किया जाता है इसलिए इसे 'चरी नृत्य' के नाम से जाना जाता है। स्त्रियाँ अपने सिर पर चरियाँ रखकर नृत्य करती हैं। कभी- कभी नर्तकियाँ एक साथ सिर पर सात चरियाँ रखकर भी नृत्य करती हैं। विशेष बात यह है कि नृत्यांगनाएँ इन चरियों में आग जलाकर उन्हें सिर पर रखकर नृत्य करती हैं। इस नृत्य में पानी भरने जाते समय के आह्लाद का प्रदर्शन और घड़ों का सिर पर संतुलन बनाते हुए तथा पैरों से थिकते हुए हाथों से विभिन्न नृत्य मुद्राओं को प्रदर्शित किया जाता है । प्रायः यह नृत्य रात के समय बहुत खूबसूरत लगता है। चरी नृत्य में ढोल, थाली, बंकिया वाद्यों का इस्तेमाल किया जाता है।
पारम्परिक तौर पर यह नृत्य देवों के आह्वान के लिए किया जाता है इसलिए इसे 'स्वागत नृत्य' के रूप में भी जाना जाता है। नृत्य करते समय नर्तकियाँ नाक में बड़ी नथ, हाथों में चूड़े और कई पारम्परिक आभूषण, जैसे- हंसली, तिमणिया, मोगरी, पंछी, बंगड़ी, गजरा, कड़े, करली, धनका, तागड़ी आदि पहनती हैं। मूल पोशाक घाघरा चोली होती है। नृत्य करने वाली नर्तकियाँ पूर्ण रूप से सुसज्जित होती हैं, जिससे उनका सौन्दर्य देखते ही बनता है।
तेराताली नृत्य
तेराताली नृत्य राइजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है, जो बैठकर किया जाता है। यह कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है।
स अत्यन्त आकर्षक नृत्य में महिलाएँ अपने हाथ, पैरों व शरीर के 13 स्थानों पर मंजीर बाँध लेती हैं। तेरह ताली नृत्य करने वाली महिलाएँ दोनों हाथों में बँधे मंजीरों को गीत की ताल व लय के साथ तेज गति से शरीर पर बँधे अन्य मंजीरों पर प्रहार करती हुई विभिन्न भाव-भंगिमाएँ प्रदर्शित करती हैं। इस नृत्य के समय पुरुष 'तंदुरे' नामक लोकवाद्य की तान पर रामदेवजी के भजन गाते हैं।
डांडिया-गेर
यह नृत्य राजस्थान के मेवाड़ व बाड़मेर क्षेत्र में होली के दिनों में खेला जाता है। यह पुरुषों का नृत्य है। इसकी संरचना गोल घेरे में होने के कारण ही इसे गेर कहा जाता है। इसमें पुरुषों की टोली हाथों में लम्बी इंडियाँ लेकर ढोल थाली व मादळ वाद्यों की ताल पर वृत्ताकार घेरे में नृत्य करते हुए मण्डल बनाती है।
इस नृत्य में तेजी से पद संचालन और डांडियों की टकराहट से तलवारबाजी या पट्टयुद्ध का आभास होता है।
भांगड़ा
भांगड़ा पंजाब का प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यह एक जीवन्त लोकसंगीत व लोक नृत्य है। बैसाखी के समय फसल कटाई का अनुष्ठान करते समय लोग परम्परागत रूप से भांगड़ा लोक नृत्य करते हैं। भांगड़ा के दौरान लोग पंजाबी गीत गाते हैं। यह पुरुषों द्वारा किया जाने वालालोक नृत्य है। लुंगी कुरता पहने व पगड़ी बाँधे लोगों के घेरे में एक व्यक्ति ढोल बजाता है। भांगड़ा की शुरुआत हालाँकि फसल कटाई के उत्सव के रूप में हुई परन्तु आगे चलकर यह विवाह तथा नववर्ष आदि समारोहों का भी अंग बन गया। भांगड़ा भारत का विश्व स्तर पर प्रसिद्ध लोक नृत्य है।
गिद्दा
गिद्दा पंजाब में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक नृत्य है। यह एक खुशनुमा नृत्य है जिसमें एक गोले में बोलियाँ गायी जाती हैं तथा तालियाँ बजाई जाती हैं। दो प्रतिभागी घेरे से निकलकर सस्वर बोली सुनाती है व अभिनय करती हैं जबकि शेष समूह में गाती हैं। यह पुनरावृत्ति तीन-चार बार होती है। प्रत्येक बार दूसरी टोली होती है जो एक नई बोली में शुरुआत करती है।
बिहू
बिहू असम का सर्वाधिक प्रचलित लोक नृत्य है जो बिहू नामक लोकोत्सव के समय किया जाता है। युवा वृद्ध, अमीर-गरीब सभी मिलकर इसका आनन्द उठाते हैं।
बिहू नृत्य खुले मैदान में किया जाता है। पूरा गाँव इस नृत्य में हिस्सा लेता है। इस नृत्य में तेजी से कदम उठाते हुए हाथों को उछालते हुए व चुटकी बजाने तथा कुल्हे मटकाने जैसी क्रियाएं की जाती हैं। कलाकार कभी-कभी गीत गाते हैं। धीमी गति से नृत्य प्रारम्भ होता है। और जैसे-जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, इसकी गति तेज होती जाती हैं। 'ढोल' की सम्मोहक थाप और 'पेपा' (भैंसे के सींग से बनी तुरही इस नृत्य के मुख्य वाद्ययंत्र होते हैं।
बिहू नृत्य करते समय पारम्परिक वेशभूषा, जैसे धोती, गमछा और चादर व मैखला पहनना अनिवार्य - होता है । बिहू नृत्य, इसके विभिन्न रूपों में,
फसल कटाई के विभिन्न स्तरों पर तथा नए मौसम के आगमन पर भी किया जाता है। इसकी सबसे सामान्य रचना गोलाकार अथवा समानान्तर पंक्तियों में होती है। बिहू नृत्य व संगीत द्वारा असमवासियों की जीवनशक्ति के सर्वश्रेष्ठ रूप का दिग्दर्शन होता है।
पिंडवानी नृत्य
पिंडवानी नृत्य भारत में प्रचलित प्रमुख लोकनृत्यों में से एक है। यह नृत्य छत्तीसगढ़ क्षेत्र में प्रचलित एकल लोक नृत्य है, जिसका प्रस्तुतीकरण समवेत स्वरों में होता है। इसमें एक ही व्यक्ति द्वारा आंगिक क्रियाओं के साथ-साथ 'एकतारा' वाद्ययंत्र को बजाते हुए गायन भी किया जाता है। इसमें नर्तक पाण्डवों की कथा को वाद्ययंत्रों की धुन पर गाता जाता है तथा उनका अभिनय भी करता जाता है।
इस लोकप्रिय लोक नृत्य के प्रमुख कलाकार तीजन बाई, झाडूराम देवांगन, तथा ऋतु वर्मा आदि हैं।
गरबा नृत्य
यह गुजरात राज्य का एक लोकप्रिय लोक नृत्य है जो गीत, नृत्य और नाटक की समृद्ध परम्परा का निरूपण करता है। यह पानी से भरे हुए मिट्टी के मटके, जिसे 'गरबो' कहते हैं, के चारों ओर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है। मटका, जिसे कुम्भ कहते हैं, के भीतर एक सुपारी और एक चाँदी का सिक्का रखा जाता है। इसके ऊपर एक नारियल रखा जाता है। नृत्य करने वाली महिलाएँ मटके के चारों ओर गोल घूमती हैं। एक-दूसरे की तालियों से नृत्य को गति व ताल मिलती है। गायक तथा ढोलक या तबला बजाने वाले व्यक्ति संगीत-संयोजन करते हैं।
गरबा नृत्य गुजराती महिलाओं द्वारा किया जाने वाला गोलाकार नृत्य है । यह नृत्य नवरात्रि, शरद पूर्णिमा, बसन्त पंचमी, होली और अन्य उत्सवों में किया जाता है।
गवल - सींग
मध्यप्रदेश में मुरिया जनजाति का गवल-सींग (पहाड़ी भैंसा) नृत्य पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा किया जाता है। पुरुष सींग से जड़े शिरोवस्त्र गुच्छेदार पंख के साथ पहनते हैं और उनके चेहरों पर कोड़ी की झालर लटकती है। उनके गले में लकड़ी के लट्ट जैसा ढोल लटकता है। महिलाओं के मस्तक चौड़ी ठोस पीतल की माला से और छातियाँ धातु के भारी गहनों से ढकी होती हैं।
उनके हाथों में ढोल जैसे मंजीरे होते हैं। 50 से 100 की संख्या में स्त्री व पुरुष मिलकर यह नृत्य करते हैं। गवल के वेश में पुरुष एक-दूसरे पर हमला करते व लड़ते हैं और सींगों से पत्तों को उड़ाते हुए वे प्रकृति के मिलन के मौसम की गतिशील अभिव्यक्ति करते हुए नृत्यांगनाओं का पीछा करते हैं।
डिंडी और काला
महाराष्ट्र के डिंडी और काला नृत्य धार्मिक उल्लास की अभिव्यक्ति करते हैं। नर्तक गोल चक्कर में घूमते हैं और छोटी लाठियाँ (डिंडी) जमीन पर मारते हुए समूहगान के मुख्य गायक बीचोंबीच खड़े ढोल वादक का साथ देते हैं।
लय में तेजी आते ही नर्तक दो पंक्तियाँ बना लेते हैं और दाहिने पाँव को झुकाकर बाएँ पाँव के साथ आगे बढ़ते हैं और इस प्रकार ज्यामिति के आकार बनाते हैं। काला नृत्य में एक बर्तन में दही होना जरूरी है, जो उर्वरता का प्रतीक है। नर्तकों का समूह दो वृत्त बनाता है जिसमें एक नर्तक के ऊपर दूसरा नर्तक होता है। एक पुरुष इन दोनों वृत्तों के ऊपर चढ़कर ऊपर लगी दही की मटकी फोड़ता है, जिससे दही नर्तकों के शरीर पर फैल जाता है। इस आनुष्ठानिक शुरुआत के बाद नर्तक जबर्दस्त रण- नृत्य की मुद्रा में अपनी लाठियाँ और तलवारें भाँजते हैं।
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