भारत की प्रसिद्ध लोक-गाथाओं का परिचय - Introduction to famous folk tales of India
भारत की प्रसिद्ध लोक-गाथाओं का परिचय - Introduction to famous folk tales of India
लोक-गाथाओं की दृष्टि से भारत एक समृद्ध और सम्पन्न देश है। यहाँ के विविध प्रदेशों में विविध लोक गाथारूपी मणियाँ अपनी आभा बिखेर रही हैं। ये लोक-गाथाएँ भक्ति-नीति-शृंगार का अद्भुत महासागर है, जिसमें लोक समाज आनन्दमग्न हो गोते लगाता है। ये गाथाएँ भारतीय लोक संस्कृति और साहित्य की अनूठी निधि है। जो यहाँ की परम्परा, रीति-रिवाज, मान्यताओं और विश्वास को अपने विस्तृत कलेवर में समेटे हुए है। भारत में प्रचलित प्रसिद्ध प्रमुख लोक-गाथाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
01. ढोला-मारू रा दूहा
'ढोला-मारू रा दूहा राजस्थान का लोकप्रिय काव्य है। इसके सम्बन्ध में एक दोहा प्रचलित है-
सोरठ्यो दू हो भलो भली मरवण री बात । जोबन छाई धण भली, तारा छाई रात ॥
यह राजा नल के पुत्र ढोला और राजा पिंगल की पुत्री मारवणी की प्रेमगाथा है। पूंगल में अकाल पड़ने पर राजा पिंगल परिवार सहित नरवर प्रान्त में जाता है। जहाँ मारवणी और ढोला का बालविवाह कर दिया जाता है। सुकाल होने पर राजा पिंगल अपने प्रान्त लौट जाता है। वयस्क होने पर ढोला का विवाह मालवा की राजकुमारी मालवणी से हो जाता है। ढोला अपने बालविवाह की बात से अनभिज्ञ रहता है किन्तु मालवणी को इसका ज्ञान हो जाता है। उधर मारवणी युवा होती है और स्वप्न में अपने प्रिय की छवि देखती है तब विरहाकुल होकर ढोला के पास अपने प्रेम सन्देश भेजती है। उसके सन्देश वाहकों को मालवणी धोखे से मरवा देती है।
अन्ततः मारवणी ढाड़ियों (माँगणहार) के साथ अपना सन्देश भेजती है, जो सन्देश सम्प्रेषण करने में सफल होते हैं। मारवणी का प्रेम-सन्देश सुनकर ढोला तत्काल उससे मिलने पहुंचता है और उसे लेकर नरवर लौटता है। मार्ग में उसकी भेंट प्रतिनायक उमर सुमरा से होती है। मारवणी की सूझबूझ से वे वहाँ से बच निकलते हैं। नरवर पहुँचकर वे आनन्द से जीवन व्ययतीत करते हैं।
02. भरथरी की गाथा
भरथरी की गाथा भारत के प्रायः सभी प्रदेशों में प्रचलित है। भरथरी उज्जैन के राजा थे। इनके बारे में प्रचलित कहानियाँ अलग-अलग रूपों में मिलती है। एक कथा के अनुसार भरथरी की पत्नी पिंगला पर-पुरुष से प्रेम करती थी जिससे व्यथित होकर भरथरी वैरागी हो गए।
वहीं दूसरी कथा में भरथरी मृग्या के लिए वन में जाते हैं। और एक हिरण का शिकार करने पर मादा हिरण से शापित होते हैं। तब वे गुरु गोरखनाथ से हिरण को पुनर्जीवित करने की विनती करते हैं। गुरु के पुण्य प्रभाव से हिरण जीवित हो जाता है। तब वे गुरु गोरखनाथ के शिष्य बन जाते हैं। आगे की कथा में उनका गुरु आज्ञा से पिंगला से शिक्षा लेने जाना, उसे माता कह कर पुकारना और पिंगला के विलाप का वर्णन मिलता है।
इसी गाथा के एक अन्य रूप में भरथरी पिंगला के सत् की परीक्षा लेने के लिए अपनी मृत्यु का सन्देश भेजते हैं जिसे सुनकर पिंगला देह त्याग देती है। तब वे गुरु गोरखनाथ सेपिंगला के लिए जीवन-दान माँगते हैं और स्वयं राजपाठ छोड़कर उनके शिष्य बन जाते हैं।
03. लोरिकायन
लोरिकायन भोजपुरी की सर्वाधिक प्रसिद्ध लोक गाथा है। इसका नायक लोरिक है, उसी के नाम पर इस गाथा को 'लोरिकायन' कहा जाता है जिसमें वीर लोरिक के जीवन-प्रसंगों का चित्रण किया गया है। अगोरी नामक राज्य में मेहरा नाम का अहीर रहता था जिसकी सातवीं संतान मंजरी थी। मंजरी अत्यन्त रूपवती थी। अगोरी के राजा मोलागत की उस पर बुरी नजर पड़ती है। वह उसे अपने महल में ले जाने का दबाव डालता है। इस दौरान मेहरा मंजरी का विवाह लोरिक नामक बहादुर, बलशाली वीर अहीर के साथ तय कर देता है। लोरिक बरात लेकर आता है तब राजा मोलागत विशाल सेना के साथ उसे रोकने का प्रयास करता है। भयंकर युद्ध के बाद लोरिक विजयी होता है।
इस युद्ध के प्रतीक चिह्न आज भी अगोरी किले के आस-पास मौजूद हैं। विजयी लोरिक मंजरी को विदा कर ले जाता है तब मंजरी कहती है कि वह कुछ ऐसा करे कि लोग उनके प्यार को सदैव याद रखें। तब मंजरी के कहने पर ही लोरिक अपनी तलवार से विशाल शिलाखण्ड को एक बार में दो भागों में विभक्त कर देता है। उनके प्रेम का प्रतीक यह शिलाखण्ड आज भी राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर छह किलोमीटर की छूी पर स्थित है।
04. नल-दमयन्ती
नल-दमयन्ती की कथा सर्वप्रथम महाभारत में उपलब्ध होती है जो आगे चलकर लोकवाणी में अपना स्थान बनाकर अलग-अलग प्रदेशों में थोड़े-बहुत अन्तर के साथ मिलती है।
इसका कथानक इस प्रकार है- राजा नल एक सदाचारी और प्रतापी राजा थे। एक बार दुर्भाग्यवश कलि ने उनमें प्रवेश कर लिया परिणामस्वरूप उनकी मति भ्रष्ट हो गई। उन्होंने अपने भाई पुष्कर के साथ जुआ खेला और अपना राज-पाट हार गए। तब उन्होंने अपनी पत्नी के साथ वन की ओर प्रस्थान किया। एक रात आत्म-ग्लानि के कारण वे दमयन्ती को सोयी हुई छोड़कर चले जाते हैं। प्रातः नल को न पाकर दमयन्ती विलाप करती है और विकट परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने पिता विदर्भ-नरेश भीम के पास पहुँचती है। दूसरी तरफ नल अग्नि से घिरे नाग की रक्षा करता है जिससे नाग उसे इस कर अपने विष के प्रभाव से कलि का नाश कर देता है। विविध घटनाक्रमों के साथ कथा आगे बढ़ती है और नल-दमयन्ती का पुनर्मिलन होता है। नल अपने भाई के साथ पुनः जुआ खेलता है और विजयी हो अपना राज- पाट पुनः प्राप्त कर लेता है।
05. लैला-मझनूँ
फ़ारसी की अत्यन्त लोकप्रिय कथा को आधार बना कर रची गई यह गाथा फ़ारसी में दुखान्त रूप में मिलती है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित यह गाथा दुखान्त सुखान्त दोनों रूपों में उपलब्ध होती है। उनमें युग-परिवेश और धार्मिक मान्यताओं के प्रभावस्वरूप कतिपय परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
अरब के राजा का पुत्र कैस और नगर व्यापारी की पुत्री लैला एक ही मदरसे में पढ़ते हैं। साहचर्य से उन्हें परस्पर प्रेम हो जाता है। उनकी प्रेम कहानी पूरे नगर की चर्चा का विषय बन जाती है तब लैला की पढ़ाई बन्द करवा दी जाती है। विरह में व्याकुल कैस विक्षिप्त हो जाता है और लोग उसे मजनूँ कहकर चिढ़ाते हैं।
उसका पिता नगर सेठ के पास लैला के लिए विवाह प्रस्ताव भेजता है जिसे नगर सेठ ठुकरा देता है। एक दिन लैला स्वप्न में मजनूँ की मृत्यु देखकर अपनी माता से विनती करती है कि उसे एक बार मजनूं से मिलने दें। उसकी दारुण दशा से माँ का हृदय पसीज जाता है। वह मजनूं को बुलवाती है। उसके आने से पहले ही लैला काल का ग्रास बन जाती है। उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर मजनूँ भी प्राण त्याग देता है।
06. हीर राँझा
पंजाब की सुप्रसिद्धलोक गाथा 'हीर-रांझा' भारत के विभिन्न प्रदेशों में उतने ही चाव से कही सुनी जाती है जितनी कि पंजाब में । यह गाथा सुखान्त और दुखान्त दोनों रूपों में उपलब्ध होती है।
चिनाब नदी के किनारे बसे नगर के चौधरी मौजम के चार पुत्र थे जिनमें राँझा सबसे छोटा, तेजस्वी और रूपवान् था। वह अपने पिता का चहेता था किन्तु उनकी मृत्यु के बाद भाई-भाभी के दुर्व्यवहार से दुखी होकर वह घर छोड़कर चला जाता है। पंच पीरों के प्रभाव से वह हीर के घर पहुँचता है। वहाँ चरवाहे की नौकरी करता है। हीर राँझा परस्पर प्रेम करने लगते हैं तो हीर का पिता चूचक उसका विवाह शाहबाज खाँ से करवा देता है। विदाई के समय हीर की जिद मानकर दहेज के साथ राँझा को भी उसके साथ भेज देता है। जहाँ हीर की ननद के सहयोग से वह हीर को लेकर भाग जाता है किन्तु पकड़े जाने पर काजी उसे दण्डित करने के लिए कोड़े लगवाता है तभी वहाँ भीषण आग लग जाती है जिसे लोग सच्चे प्रेमियों पर किये गए अन्याय के कारण दैवीय प्रकोप मानते हैं।
तब राँझा प्रार्थना करता है। अग्नि शान्त होती है और काजी राँझा को हीर सौंप देता है। इस प्रकार दोनों प्रेमियों का मिलन होता है।
07. सोहनी-महीवाल
सिन्ध और पंजाब की अत्यन्त प्रसिद्ध दुखान्त लोक गाथा का कथानक इस प्रकार है- सिन्धु नदी के किनारे पर तुला नाम का एक कुम्हार रहता था जिसकी बेटी सोहनी बर्तनों पर सुन्दर चित्रकारी करती थी। एक दिन 'उजबेकिस्तान का धनी व्यापारी इज्जत बेग वहाँ आता है और सोहनी पर आसक्त हो जाता है। वह महीवाल नाम से उसके घर भैंस चराने की नौकरी करने लगता है। दोनों के प्रेम सम्बन्धों का पता चलने पर तुला सोहनी का विवाह कर देता है। सोहनी के विवाहोपरान्त भी महीवाल रोजाना नदी पार कर सोहनी से मिलने जाता है।
एक बार महीवाल के बीमार होने पर सोहनी पक्के घड़े की मदद से नदी पार कर उससे मिलने जाने लगती है। उसकी ननद पक्के घड़े के स्थान पर कच्चा घड़ा रख देती है जिससे सोहनी नदी में डूबने लगती है। महीवाल उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़ता है लेकिन वह उसे बचा नहीं पाता और दोनों प्रेमियों की डूबने से मृत्यु हो जाती है।
08. बगड़ावत
राजस्थान में प्रचलित लोक गाथाओं में बगड़ावत का विशिष्ट स्थान है। इसमें मूल कथानक के साथ अनेक चमत्कारी अलौकिक अन्तर्कथाओं का समावेश है जिससे गाथा का कलेवर बहुत बृहत् हो गया है। इसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- लीलाखेड़ी गाँव में नरभक्षी बाघ का आतंक था जिसे वीर क्षत्रिय हरिसिंह ने मार गिराया।
प्रमाणस्वरूप वह बाघ का सिर लेकर गाँव लौट रहा था तभी उसे प्यास लगती है। वह तालाब पर जाता है जहाँ उसकी नजर स्नान कर रही ब्राह्मण कन्या पर पड़ती है। उसकी दृष्टि के प्रभाव से वह गर्भवती हो जाती है और उचित समय आने पर पुत्र को जन्म देती है। नवजात शिशु का धड़ मनुष्य का और सिर बाघ का होता है अतः उसका नाम बाघा रखा जाता है। उसके विचित्र रूप के कारण परिवार के लोग उसे अशुभ मानकर वन में छोड़ आते हैं। एक बार गाँव की 24 कन्याएँ वहाँ झूला झूलने आती हैं, तब बाघा उन्हें अपनी परिक्रमा लगाने की शर्त पर झूला झूलने देता है। युवा होने पर उन कन्याओं का विवाह नहीं हो पाता तब उनके द्वारा ली गई बाघा की परिक्रमा का सच उजागर होता है। परिणामस्वरूप इन कन्याओं का विवाह बाघा से कर दिया जाता है और उन्हीं से 24 बगड़ावतों का जन्म होता है।
बगड़ावतों में प्रमुख भाइयों के नाम सवाई, भोज, तेजा आदि हैं। ये अपनी आजीविका के लिए गाय चराते हैं। एक दिन भोज ने देखा कि एक गाय रोजाना उसकी गायों के साथ चरने आ जाती है। तब वह चराई लेने के लिए उस गाय के पीछे जाता है। वह गाय एक योगी की होती है। योगी उसे उबलते तेल के कड़ाह के चक्कर लगाने को कहता है। भोज योगी की बुरी मंशा को जानकर चतुराई से योगी को ही कड़ाह में डाल देता है। उसके बुद्धिचातुर्य से प्रसन्न होकर शिवजी उसे 'बारह बरस काया, बारह बरस माया' का वर देते हैं। शिव कृपा से बगड़ावत श्रीसम्पन्न हो जाते हैं। यौवन, शक्ति और सम्पत्ति से सम्पन्न होने से वे विवेकहीन हो जाते हैं। उनके कुकृत्यों से देवता कुपित होते हैं और देवी उनके अन्त का बीड़ा उठाती है। विभिन्न नाटकीय प्रसंगों के बाद बगड़ावत युद्ध में शहीद हो जाते हैं।
09. आल्हा
मूलतः बुंदेली की वीरगाथा आल्हा सम्पूर्ण उत्तरभारत में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह 12वीं शती के चन्देल शासक परमाल के वीर सामन्त आल्हा ऊदल की कथा है। आल्हा ऊदल के पिता दसराज की वीरगति होने पर राजा परमाल और रानी मल्हना आल्हा ऊदल का पालन-पोषण करते हैं। दोनों भाई अपने शौर्य पराक्रम से परमाल के साम्राज्य विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं और अपनी वीरता से चर्चित हो जाते हैं। उनकी प्रशंसा से उरई नरेश माहिल को ईर्ष्या होती है। वह परमाल से झूठी शिकायत कर उन्हें देश निकाला दिलवा देता है। तब आल्हा-ऊदल गहरवार में जयचन्द के यहाँ आश्रय लेते हैं । इतने पर भी माहिल को संतुष्टि नहीं होती और वह दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को महोबा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करता है। पृथ्वीराज महोबा पर आक्रमण करता है तो रानी मल्हना कवि जगनिक को आल्हा को लौटने का सन्देश देकर भेजती है।
माँ देवल के दबाव और कवि जगनिक के वाक्चातुर्य से वे कन्नौज लौटते हैं जहाँ पृथ्वीराज से युद्ध करते हुए ऊदल की मृत्यु हो जाती है। आल्हा गुरु गोरखनाथ की प्रेरणा से पृथ्वीराज को प्राणदान देकर तपस्या के लिए वन को चला जाता है। बुंदेलखंड में घनघोर वर्षा के दिनों में आल्हा का गायन किया जाता है-
भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात आल्हा पवाड़ा वा दिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात ॥
10. हरदौल
हरदौल की गाथा एक ऐतिहासिक गाथा है। जिसमें देवर-भाभी के पवित्र प्रेम की अद्भुत झलक मिलती है । इस गाथा का सम्बन्ध मध्यप्रदेश के ओरछा राज्य से है किन्तु यह अन्य प्रदेशों में भी विशेषकर उत्तरप्रदेश में बड़े मान-सम्मान के साथ गायी जाती है।
ओरछा के राजा वीरसिंह की मृत्यु के बाद बड़ा बेटा जुझारसिंह राजा बना और उसका विवाह चम्पावती से हुआ। छोटे बेटे हरदौल ने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। उसका अपनी भाभी से विशेष लगाव था । वह उन्हें माँ के समान मानता था और भाभी भी उससे पुत्रवत् स्नेह करती थी। एक बार शाहजहाँ ने जुझारसिंह को दिल्ली आमन्त्रित किया और उसके दिल्ली आने पर मुगल सेना ने ओरछा पर आक्रमण कर दिया। हरदौल ने वीरता के साथ उसका सामना किया और विजयश्री प्राप्त की। हार से बौखलाया शाहजहाँ जुझारसिंह को रानी चम्पावती और हरदौल के स्नेह-सम्बन्धों के बारे में गलत ढंग से भड़काता है। जुझारसिंह रानी चम्पावती को अपने सत् की परीक्षा देने के लिए हरदौल के भोजन में विष मिलाने का आदेश देता है। रानी भोजन में विष मिलाती है और हरदौल को भी बताती है। भाभी का सत् रखने के लिए हरदौल विषयुक्त भोजन ग्रहण कर अपने प्राण त्याग देता है।
11. पाबूजी री पड़
'पाबूजी री पड़' वीर और धर्मरक्षक पाबूजी की गाथा है। राजस्थान में इनका बहुत आदर किया जाता है। इसका संक्षिप्त कथानक इस प्रकार है- पाबूजी राठौड़ कोल्हुगढ़ के रहने वाले थे। उनकी धर्मबहन देवल चारण के पास अत्यन्त सुन्दर और सर्वगुण सम्पन्न 'केसर कालवी' नाम की घोड़ी थी। देवल केसर की सहायता से अपने गौ धन की रक्षा करती थी। पाबूजी का विवाह अमरकोट की सोढ़ी राजकुमारी के साथ तय होता है तब वे वर- यात्रा के लिए देवल से केसर को माँगते हैं।
इस पर देवल चिन्तित हो जाती है कि केसर के बिना वह अपनी गायों की रक्षा कैसे करेगी ? इस पर पाबूजी उसे वचन देते हैं कि यदि तुम्हारी गायों पर संकट आया तो मैं स्वयं आकर उनकी रक्षा करूँगा । देवल अपनी घोड़ी पाबूजी को दे देती है। पाबूजी को फेरों के बीच सन्देश मिलता है कि देवल की गायों को जिंद राव खींची घेर कर ले जा रहा है। पाबूजी फेरे बीच में ही छोड़ जिंद राव खींची के समक्ष जा पहुँचते हैं और दोनों के मध्य भयंकर युद्ध होता है। गार्यो की रक्षा करते हुए पाबूजी शहीद हो जाते हैं और उनकी अर्द्धविवाहिता सोढ़ी भी उनके साथ सती हो जाती है।
12. वीर तेजा
वीर तेजाजी को राजस्थानी लोक समाज देवता रूप में स्वीकार करता है। आज भी भाद्रपद की शुक्ल दशमी को उनकी पूजा की जाती है। खरनाल गाँव में तेजा नाम का युवा जाट किसान रहता था जो कठोर परिश्रमी, उदारहृदय और धर्मपरायण था। तेजा का विवाह बाल्यकाल में हो जाता है किन्तु गौना नहीं होता।
युवा होने पर भाभी के तानों से व्यथित होकर वह अपनी पत्नी सुन्दर को लेने ससुराल जाता है। जहाँ अज्ञानतावश उनकी सास कटु शब्द कह देती है जिससे आहत होकर वह पुनः लौटने लगता है। जब ससुराल पक्ष को उनके जाने की सूचना मिलती है तो वे उन्हें मनाने जाते हैं। स्वाभिमानी तेजा ससुराल में रहने से मना कर देता है और लाछा गूजरी के यहाँ ठहरता है। रात्रि में कुछ डाकू लाँछा की गायों को घेर कर ले जाते हैं। गूजरी का करुण क्रन्दन सुनतेजाजी उन्हें वापस लाने जाते हैं। मार्ग में अग्नि में जलते साँप की रक्षा करते हैं किन्तु साँप उन्हें इसना चाहता है। वे उसे कहते हैं कि अभी मैं गायों की रक्षार्थ जा रहा हूँ, लौटने पर मुझे इस लेना। तेजाजी और डाकुओं में भयंकर मुठभेड़ होती है जिससे तेजाजी का शरीर लहूलुहान हो जाता है। गायें गूजरी को लौटाकर वे साँप के पास जाते हैं तो वह कहता है कि तुम्हारी सम्पूर्ण देह रक्त-रंजित है, मैं कहाँ डयूँ ? तेजाजी उसे अपनी जिह्वा पर डसने के लिए कहते हैं। साँप तेजाजी की जिह्वा पर इस लेता है और तेजाजी की मृत्यु हो जाती है। उनकी पत्नी भी उनके साथ सती हो जाती है।
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